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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1165, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1165

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ३५७

पर्वत, नदियाँ, देश और काल सब भ्रम से सिद्ध होते हैं। जैसे निद्रादोष से स्वप्न में पर्वत, नदियाँ, देश, काल भासित होते हैं, वैसे ही अज्ञाननिद्रा में यह संसार दिखता है। हे राम! जागकर देखो तो संसार है ही नहीं। इसका तरना महासुगम है। और सुमेरु पर्वतादिक जो भासित होते हैं, वे कमल की तरह कोमल हैं। जैसे कमल के मँदने में कुछ यत्न नहीं होता वैसे ही ये निवृत्त होते हैं। अज्ञानियों की दृष्टि स्थूल है और उससे आकार को सब देख रहे हैं। जैसे पवन का चलना जाना जाता है, और जब वह नहीं चलता तब मूर्ख उसके अस्तित्व को नहीं जानता, वैसे ही ये प्राणी आकार को जानते हैं, और इसमें जो निराकार स्थित है, उसको नहीं जानते। जैसे पवन चलता है तो भी पवन है और ठहरता है तो भी पवन है, वैसे ही विश्व प्रकट होने पर भी आत्मा है और न फुरने में भी वही है। इससे विश्व भी आत्मरूप है, कुछ भिन्न नहीं। जो सम्यक्दर्शी हैं, उनको विश्व के फुरने न फुरने में आत्मा ही भासित होता है। जैसे स्पन्द व निःस्पन्दरूप पवन ही है, वैसे ही ज्ञानी को सर्वदा सब एकरस है, और अज्ञानी को द्वैत दिखता है। जैसे ठूँठ में बालक पिशाचबुद्धि करता है, वैसे ही अज्ञानी आत्मा में जगद्बुद्धि करता है। जैसे नेत्रदोष से आकाश में वृक्ष दिखते हैं, वैसे ही मन के स्फुरण में जगत् भासित होता है।

हे राम! जैसे वायु का रूप कभी नहीं होता, वैसे ही जगत् का अत्यन्त अभाव है। जैसे मरुस्थल में जल का अभाव है, वैसे ही आत्मा में जगत् का अभाव है। हे राम! सुमेरु पर्वत, आकाश, पाताल, देवता, यक्ष, राक्षस इत्यादि सहित ऐसे अनेक ब्रह्माण्ड इकट्ठे करके विचार-रूपी काँटे में रक्खे और पीछे आधी रत्ती डालें तो भी वे बराबर नहीं होते; क्योंकि हैं ही नहीं, अविचारसिद्ध हैं। स्वप्न के पर्वत जागने पर चावल भर भी नहीं रहते, क्योंकि हैं नहीं, भ्रममात्र हैं। हे राम! इस संसार की भावना मूर्ख करते हैं। ऐसे जो अनात्मदर्शी पुरुष हैं, उनको ऐसे जानो, जैसे लुहार की धौंकनी से हवा निकलती है, वैसे ही उन पुरुषों की साँसें वृथा आती जाती हैं। जैसे आकाश में अँधेरा