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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1166, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1166

३५ = * योगवाशिष्ठ *

व्यर्थ उठती है वैसे ही उन पुरुषों का जीना और अब सब चेष्टाएँ व्यर्थ हैं। ये आत्मघाती हैं अर्थात् अपना नाश आप करते हैं। उनकी चेष्टाएँ दुःख का निमित्त हैं। हे राम! यह मन अपने अधीन है। जो दृश्य की ओर होता है तो संसार होता है और जो अन्तर्मुख होता है तो सब आत्मा ही होता है। यह संसार मिथ्या है। न सत् कहिये, न असत् कहिये। यह संसार भ्रम से हुआ है। ये जीव भूत, भविष्य और वर्तमान काल में विपरीत देखते हैं। जैसे अग्नि शीतल होती है, आकाश पाताल में पाताल आकाश में तारे पृथ्वी पर पृथ्वी आकाश के ऊपर भी होती है; बादल बिना वर्षा होती है और आकाश में हल फिरते हैं—ऐसे कौतुक में देखता हूँ।

हे राम! इसमें कुछ आश्चर्य नहीं; मन ही में सब कुछ होता है। जैसे मनोराज्य में होता है, वैसा ही आगे स्थित होता है और उसकी सिद्धि होती है। पर्वत पुर में भिक्षुक के समान भिक्षा माँगने फिरते हैं, ब्रह्माण्ड उड़ते फिरते हैं, बालू से तेल निकलता है, मृतक युद्ध करते हैं, मृग गाते हैं और वन नृत्य करते हैं। हे राम! मनोराज्य में सब कुछ बनता है। चन्द्रमा की किरणों में पर्वत भस्म होते हैं, इसमें क्या आश्चर्य है? ऐसे ही यह संसार भी मनोराज्य है और शीघ्र संवेग है। इस कारण जीव उसको सत् मानता है, और आगे जो बालू में तेल आदि का निकलना कहा है उसको सत् नहीं जानता; क्योंकि उसमें मृदु संवेग है; पर हैं दोनों तुल्य। हे राम! जिनको सत् और असत् कहते हो, आत्मा में वे दोनों नहीं हैं। ये जो तुमको सत् पदार्थ भासित होते हैं तो अग्नि आदिक शीतल भी सत् हैं और जो ये मिथ्या भासित होते हैं तो वे भी मिथ्या हैं, केवल तीव्र और मृदु संवेग है। जब तीव्र संवेग दूर होता है, तब सब मिथ्या माने जाते हैं। जैसे स्वप्ने से जागा हुआ स्वप्न को मिथ्या और जाग्रत् को सत्य कहता है, पर दोनों मनोराज्य हैं। हे राम! जितने आकार देख पड़ते हैं, उन सबको मिथ्या जानो। न तुम हो, न मैं हूँ और न यह जगत् है। परमार्थ सत्ता ज्यों की त्यों है, उसमें अहं-त्व की भावना नहीं