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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1167, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1167

निर्वाण प्रकरण३५६

उठती। वह केवल शान्तरूप, आकाशरूप और निराकाररूप है। उसमें कुछ भी द्वैत नहीं—केवल अपने रूप में स्थित है। जैसे बालक मृत्तिका के हाथी, घोड़े और मनुष्य बनाकर उनके नाम रखता है कि यह राजा है, यह हाथी है, यह घोड़ा है, सो वे सब मृत्तिका से भिन्न नहीं हैं, पर बालक के मन में उनके नाम भिन्न-भिन्न दृढ़ होते हैं; वैसे ही मनरूपी बालक नाना प्रकार की संज्ञाओं की कल्पना करता है, पर आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है। इससे हे राम ! तुम किसका भय करते हो ? निर्भय रहो। तुम्हारा स्वरूप शुद्ध, निर्भय और अविद्या के कारण-कार्य से रहित है। उसी में स्थित रहो। यह संसार तुम्हारे स्फुरण में हुआ है। आत्मा न सत्य है, न असत्य, न जड़ है, न चेतन; न प्रकाश है न तम; न शून्य है, न अशून्य। शास्त्र ने जो विभाग कहे हैं कि यह जड़ है, यह चेतन है, सो इस जीव के जगाने के निमित्त कहे हैं। आत्मा में कोई वास्तव संज्ञा नहीं, केवल आत्मत्वमात्र है। इससे दृश्य की कलना त्यागकर आत्मा में स्थित हो। ब्रह्मा से स्थावर तक सब कल्पनामात्र हैं, इसमें क्या आस्था करना है ? संसार के दोनों भाव तुल्य हैं। स्फुरण जैसा भाव का है, वैसा ही अभाव का—स्वरूप में दोनों की तुल्यता है; और व्यवहारकाल में जैसा है; वैसा ही है।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे विश्वप्रमाणवर्णनं नामाष्टदशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११८ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! भूमिका प्रसङ्ग यहाँ चला था। उसमें जो सार आपने कहा, वह मैं समझ गया। अब भूमिकाओं का विस्तार कहिये। योगी का शरीर जब छूटता है और स्वर्ग के भोगों को भोगकर वह नीचे गिरता है तब फिर उसको क्या अवस्था होती है, यह भी कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस योगी को भोग की वाञ्छा होती है, वह स्वर्ग में जाकर भोग भोगता है। पर यदि उसको और भी भोगने की इच्छा होती है तो वह मध्यममण्डल मनुष्यलोक में पवित्रस्थान और धनवानों के गृह में जन्म लेता है। और जो उसको भोग की वाञ्छा और नहीं होती तो ज्ञानवानों के गृह में जन्म लेता