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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1168, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1168

३६० ✻ योगवाशिष्ठ ✻

है। थोड़े काल के उपरान्त उसका पिछला संस्कार उदय होता है। उसे स्मरण कर वह आत्मा की ओर उन्मुख होता जाता है। जैसे कोई पुरुष लिखता हुआ सो जाता है, पर जब जागता है तब उस लिखे को देखकर फिर आगे लिखता है, वैसे ही वह योगी पहले के अभ्यास को दिन-दिन बढ़ाता जाता है। वह अज्ञानी का संग नहीं करता; क्योंकि अज्ञानी भोगों की ओर उन्मुख और आत्ममार्ग से बहिर्मुख हैं। वह जो चुगली करनेवाले हैं, उनका संग नहीं करता। उसके सब अवगुण नष्ट हो जाते हैं और दम्भ, गर्व, राग, द्वेष, भोग की तृष्णा आदि स्वाभाविक रूप में छूट जाते हैं। वह शान्ति को प्राप्त होता है। उसे कोमलता, दया आदि शुभ गुण स्वाभाविक रूप में प्राप्त होते हैं।

हे राम ! इस निश्चय को पाकर वह वर्णाश्रम के धर्म यथाशास्त्र करता हुआ संसारसमुद्र के पार के निकट प्राप्त होता है, पर पार नहीं होता, यह भेद है। यह तीसरी भूमिका है—इसके बाद फिर मोह को नहीं प्राप्त होता, जैसे चन्द्रमा की किरणें भी ताप को नहीं प्राप्त होतीं, वैसे ही तीसरी भूमिकावाला संसाररूपी गड्ढे में नहीं गिरता। हे राम ! ये सप्तभूमिका ब्रह्मरूप हैं। पर इतना ही भेद है कि तीन भूमिका जाग्रत् रूप हैं; चतुर्थ स्वप्न है; पंचम सुषुप्ति है; छठी तुरीय है ओर सप्तम तुरीयातीत है। हे राम ! प्रथम तीन भूमिकाओं में संसार की सत्यता जान पड़ती है, इससे इन्हें जाग्रत् कहा है और पिछली चारों में संसार का अभाव है इससे ये जाग्रत् से विलक्षण हैं। जाग्रत् में घट, पट आदिक पदार्थ सत् लगते हैं कि घट घट ही है और पट पट ही है, अन्यथा नहीं; ये अपना ही अपना कार्य करते हैं, इससे अपने काल में ज्यों के त्यों हैं। इसी प्रकार सब पदार्थ हैं। तीसरी भूमिकावाला स्थावर-जङ्गम को जानता है, उन्हें नाम और रूप में ग्रहण करता है; पर हृदय में रागद्वेष नहीं रखता, क्योंकि विचार करके उसने इन्हें तुच्छ जाना है; पर संसार का अत्यन्त अभाव नहीं जाना, और ब्रह्मस्वरूप को भी वह नहीं जानता, क्योंकि उसको स्वरूप का साक्षात्कार नहीं हुआ। जब स्वरूप को जानेगा, तब संसार का अत्यन्त अभाव हो जायगा। इन तीनों भूमि-