योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1169, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३६१
काओं से संसार तुच्छ लगता है पर नष्ट नहीं होता । इनको पाकर जब शरीर छूटता है, तब और जन्म में उसको ज्ञान प्राप्त होता है, और वह दिन-दिन ज्ञानपरायण होता है ।
जब बुद्धि शुद्ध होती है, तब ज्ञान उपजता है । जैसे बीज में प्रथम अंकुर होता है और फिर डाल, फूल, फल निकलते हैं, वैसे ही प्रथम भूमिका ज्ञान का बीज है, दूसरी अंकुर है, तीसरी डाल है और चतुर्थ में जो ज्ञान की प्राप्ति होती है वही फल है । प्रथम तीन भूमिकाओं वाला धर्मात्मा और पुरुषों में श्रेष्ठ होता है । उसका लक्षण यह है कि वह निरहंकार, असंग और धीर होता है । उसकी बुद्धि में विषयों की तृष्णा निवृत्त हो जाती है और वह आत्मपद की इच्छा रखता है । यह पुरुष श्रेष्ठ कहाता है; यथार्थ आचरण यथाशास्त्र करता है, शास्त्रमार्ग को कभी नहीं छोड़ता । जो शास्त्रमार्ग में मर्यादा के साथ अपने प्रकृत आचरण से विचरता है, वह पुरुष श्रेष्ठ है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! पीछे आप कह आये हैं कि जब मनुष्य शरीर छोड़ता है तब एक मुहूर्त में उसको युग व्यतीत होता है, और जन्म से मरणपर्यन्त जैसे कर्मों की भावना होती है वैसा आगे भासित होता है । सो एक मुहूर्त में युग कैसे भासित होता है, यह कहिये ।
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह जगत् जो नाना कालों सहित भासित होता है, वह ब्रह्मस्वरूप ही है भिन्न कुछ नहीं-समान ही है । जैसे ईख में मिठास है, वैसे ही ब्रह्म में जगत् है । जैसे तिलों में तेल और मिरचों में तीक्ष्णता है, वैसे ही आत्मा में जगत् है । जैसे तिलों में तेल होता है वैसे ही ब्रह्म में जगत् है । कहीं सत्, कहीं असत्, कहीं जड़, कहीं चेतन, कहीं शुभ, कहीं अशुभ, कहीं नरक, कहीं मृतक, कहीं जीवित, ब्रह्मा से काष्ठपर्यन्त भाव-अभाव होता है । वह सत्-असत् में विलक्षण है । आत्मसत्ता में सब सत्य है और भिन्न देखिये तो असत्य है । हे राम ! जिनको सत्य या असत्य जानते हो, यथा पृथ्वी आदि पदार्थ सत्य और आकाश के फूल आदि असत्य हैं, ये दोनों तुल्य हैं । जो विद्यमान पदार्थ सत्य मानिये तो आकाश के फूल भी सत् मानिये । जैसे स्वप्न में