योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
३४८ * योगवाशिष्ठ *
इच्छा करता है । ज्ञानी को कोई वासना नहीं होती कि यह विशेषता मुझे प्राप्त हो, इसी से वह फिर जन्म नहीं पाता । जैसे भुना बीज नहीं उगता, वैसे ही वासना से रहित ज्ञानी जन्म नहीं पाता ।
हे राम ! जन्म का कारण वासना है । जैसी-जैसी वासना होती है, वैसी-वैसी अवस्था को जीव प्राप्त होता है । वासना नाना प्रकार की हैं । जब शरीर छूटने का समय आता है, तब जो वासना प्रबल दृढ़ होती है और जिसका सर्वदा अभ्यास होता है, वही अन्तकाल में दिखाई देती है, चाहे वह पाठ की, तप की, कर्म की, देवता इत्यादिक की हो, सबको दबाकर वही उस समय उठती है । हे राम ! उस समय जो सामने पदार्थ होते हैं, वे भी नहीं भासित होते; पाँचों इन्द्रियों के विषय विद्यमान हों तो भी नहीं भासित होते; वही पदार्थ भासित होता है, जिसका दृढ़ अभ्यास किया हुआ होता है । वासनाएँ तो अनेक होती हैं, परन्तु जैसी वासना दृढ़ होती है, उसी के अनुसार शरीर धारण करता है । जब देह छूटती है, तब मुहूर्तपर्यन्त सुषुप्ति की नाईं जड़ता रहती है, उसके उपरान्त चेतनता होती है । तब जीव वासना के अनुसार शरीर देखता है और जानता है कि यह मेरा शरीर है; मैं उत्पन्न हुआ हूँ । कोई ऐसे होते हैं कि उसी क्षण में युग का अनुभव करते हैं । कोई ऐसे होते हैं कि चिरकाल पर्यन्त जड़ रहते हैं, तब उनको चेतनता फुरती है, और उसके अनुसार संसार भ्रम देखते हैं । और कोई, जो संस्कारवान् होते हैं, उनको शीघ्र ही एक क्षण में चेतनता होती है और वे जानते हैं कि हम उस जगह मरे थे और इस जगह जन्मे हैं; यह हमारी माता है, यह पिता है और यह कुल है ।
इस प्रकार एक मुहूर्त में जागकर वे देखते हैं और बड़े कुल को देखते हैं । इसी प्रकार वे परलोक और यमराज के दूतों को देखते हैं और जानते हैं कि ये हमें लिये जाते हैं और हमारे पुत्रों ने पिण्ड दिये हैं, उन पिण्डों से हमारा शरीर बना है और दूत ले चले हैं । तब आगे ये धर्मराज को देखते हैं और उनके निकट जाके खड़े होते हैं । पुण्य और पाप दोनों मूर्ति धारण कर उनके आगे स्थित
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होते हैं । तब धर्मराज अन्तर्यामी से एक-एक का हाल पूछते हैं कि इसने क्या कर्म किये हैं ? यदि पुण्यवान् होता है तो स्वर्गभोग भोगा-कर फिर योनि में डाला जाता है और जो पापी होता है तो नरक में डाल देते हैं । निदान सब प्रकार के जन्म लेने पड़ते हैं । सर्प की योनि में कहता है कि मैं सर्प हूँ । ऐसे ही जब जीव बैल, वानर, तीतर, मछली, बगला, गर्दभ, बेलि, वृक्ष इत्यादि की योनि पाता है, तो जानता है कि मैं यही हूँ । अकस्मात् काकतालीय न्याय से कभी मनुष्यशरीर पाता है तो माता के गर्भ में जानता है कि यहाँ मैंने जन्म लिया है; यह मेरी माता है, मैं पिता से उत्पन्न हुआ हूँ और यह मेरा कुल है । फिर बाहर निकलता है और बालक होता है तब जानता है कि मैं बालक हूँ । यौवन अवस्था होती है तब जानता है कि मैं जवान हूँ । फिर वृद्ध होता है तब जानता है कि मैं वृद्ध हूँ ।
इस प्रकार काल बिताकर जब मरता है तो सर्प, तोता, तीतर, वानर, मच्छ, कच्छ, वृक्ष, पशु, पक्षी, देवता इत्यादिक जन्म धारण करता है । हे राम ! संसार में वह घटीयन्त्र की तरह फिरता है । कभी ऊपर और कभी नीचे को जाता है । इसी प्रकार स्वरूप के प्रमाद से जीव दुःख पाता है । हे राम ! इतना विस्तार जो तुमसे कहा है, सो बना कुछ नहीं, केवल अद्वैत आत्मा है; पर चित्त के संयोग से इतना भ्रम देखता है । वासना द्वारा विमानों को देखता है और आकाश में जाता है । जैसे पवन गन्ध को ले जाता है, वैसे ही पुर्यष्टका को साथ ले जाता है और शरीर देखता है । हे राम ! आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । परन्तु चित्त के संयोग से जीव इतने भ्रम देखता है । इससे चित्त को स्थिर करो तो भ्रम मिट जायगा और आत्मतत्त्वमात्र ही शेष रहेगा । जो शुद्ध और आनन्दरूप है, उसी में स्थित हो रहो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्ववासनारूपवर्णनं नाम चतुर्दशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह तो प्रवृत्तिवाले का क्रम कहा । अब निवृत्ति का क्रम सुनो । जिसको भूमिका प्राप्त हुई है और आत्मपद
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- योगवासिष्ठ *
नहीं प्राप्त हुआ, उसके सब पाप भस्म हो जाते हैं। जब उसका शरीर छूटता है; तब वह वासना के अनुसार शून्याकार हुआ। फिर अपने साथ शरीर देखता है और फिर बड़े परलोक को देखता है, जहाँ स्वर्ग के सुख भोगता है। फिर विमान पर चढ़कर लोकपालों के पुरों में विचरता है, जहाँ मन्द मन्द पवन चलता है, सुन्दर वृक्षों की सुगन्ध है और पाँचों इन्द्रियों के रमणीय विषय हैं। देवताओं में क्रीड़ा करता है और भोगों को भोगकर संसार में उपजता है। फिर भूमिका क्रम को प्राप्त होता है। जैसे मार्ग चलता कोई सो जाय तो वह जागकर फिर चलता है, वैसे ही शरीर पाकर वह फिर भूमिका के क्रम को प्राप्त होता है और जैसी जैसी भावना दृढ़ होती है, वैसे ही वैसे भाषित होता है। यह सब जगत् संकल्पमात्र है। संकल्प के अनुसार ही यह भाषित होता है और वासना के अनुसार परलोक के भ्रम जन्य सुख-दुःख देखता है। वहाँ से उन्हें भोगकर फिर संसार में आ पड़ता है। इसी प्रकार संकल्प से भटकता है। फिर जब कभी आत्मा की ओर उन्मुख होता है, तब संसार का भ्रम मिट जाता है। जब तक आत्मा की ओर नहीं आता, तब तक अपने संकल्प से संसार को देखता है। प्रति जीव को अपनी अपनी सृष्टि भाषित होती है। देवता, दैत्य, भूमिलोक, स्वर्ग, सब संकल्प के रचे हुए हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र से लेकर तृण तक, जो कुछ संसार दिखता है, वह सब मनोमात्र है, मन के संकल्प से उदय हुआ है और असद्रूप है। जैसे मनोराज्य, गन्धर्वनगर और स्वप्नसृष्टि भ्रम है, वैसे ही यह जगत् भ्रम है। सब सृष्टि परस्पर अदृष्ट है; कहीं उदय होती दिखती है और कहीं लय हो जाती है।
जैसे मूर्च्छ और देश को जाता है, वैसे ही देह को त्यागकर जीव परलोक को जाता है। पर स्वरूप की स्थिति में आना जाना, अहं त्व की कोई कल्पना नहीं है—केवल सत्तामात्र अपने आपमें स्थित है। और जगत् भी वही है। हे राम! यह विश्व आत्मस्वरूप है। जैसे मणि में चमक का चमत्कार होता है, वैसे ही विश्व-आत्मा का चमत्कार है। जो कुछ तुमको दिखता है, सो आत्मा ही है। आत्मा के
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विना आभास नहीं होता । जैसे ईख मधुरता और मिरचों में कड़वाहट होती है, वैसे ही आत्मा में विश्व है । जो कुछ भी देखो, सुनो, स्पर्श करो और सुगन्ध लो, उसे सब आत्मा ही जानो । अथवा जो इनको जाननेवाला अनुभवरूप है, उसमें स्थित हो इन्द्रियों को जीत-कर और उनके विषयों को त्यागकर अनुभवरूप में स्थित होओ । हे राम ! यह विश्व संवित्रूप है और संवित् ही विश्वरूप है । जब संवित् बहिर्मुख होकर रस लेती है, तब जाग्रत् को देखती है । जब अन्तर्मुख होकर रस लेती है, तब स्वप्न होता है और जब शान्त हो जाती है तब सुषुप्ति होती । संसार को सत्य जानकर जब रस लेती है, तब जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था होती है और जब संवित् में रस की सत्यता जाती रहती है, तब तुरीयपद होता है । यह पदार्थ है, या नहीं; जब यह भावना नष्ट हो, तब तुरीयपद समझो । हे राम ! यह विश्व स्फुरणमात्र है; जब स्फुरण नष्ट हो जाता है, तब विश्व देखने में नहीं आता । जैसे स्वप्न के देश, काल, पदार्थ जागने से मिथ्या होते हैं, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी मिथ्या है । जीव-जीव प्रति जो अपनी-अपनी सृष्टि होती है, उसमें आप भी कुछ बन जाता है, इससे दुःखी होता है । जब इस अहंकार को त्याग कर अपने स्वरूप में स्थित हो, तब विश्व कहीं नहीं है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सृष्टिनिर्वाणैकताप्रति- पादनं नाम पञ्चदशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस सृष्टि का स्वरूप संकल्पमात्र है, और संकल्प भी आकाशरूप है । आकाश और स्वर्ग में कुछ भेद नहीं; जैसे पवन और स्पन्दन में भेद नहीं होता । सृष्टि में अनेक पदार्थ हैं, परन्तु परस्पर नहीं बाधा डालते । वास्तव में विश्व भी आत्मा का चमत्कार और आत्मरूप है । जो आत्मरूप है तो राग और द्वेष किसमें कीजिये । चेतन धातु में कोटि ब्रह्माण्ड स्थित हैं, और यह आश्चर्य है कि आत्मा में कुछ नहीं हुआ । भिन्न-भिन्न संवेदन दृष्टि आती है, और नाना प्रकार के पदार्थ भासित होते हैं । हे राम ! जीव-जीव प्रति
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अपनी-अपनी सृष्टि है। एक सृष्टि ऐसी है कि उसका रूप एक-सा देख पड़ता है, परन्तु सृष्टि अपनी-अपनी है। और कई सृष्टियाँ ऐसी हैं कि भिन्न-भिन्न हैं, पर समानता से एक ही दिखती हैं। जैसे जल की बूँदें इकट्ठी होती हैं और धूल के कण भिन्न-भिन्न होते हैं, परन्तु एक ही धूल प्रतीत होती है। जैसे नदी में नदी पड़ती है तो एक ही जल हो जाता है, वैसे ही समान अधिकरण में सब संकल्प एक ही भासित होते हैं; एक एक के साथ मिलते हैं और नहीं भी मिलते। जैसे क्षीर-समुद्र में घृत डालिये तो नहीं मिलता, वैसे ही कुछ संकल्प ऐसे हैं कि और में नहीं मिलते—जैसे सूर्य, दीपक और मणि का प्रकाश भिन्न-भिन्न दिखता है पर एक-सा होता है, वैसे ही कई सृष्टियाँ एक-सी भासित होती हैं और भिन्न-भिन्न भी होती हैं। हे राम! इतनी सृष्टियाँ जो मैंने तुमसे कही हैं सो सब अधिष्ठान में फुरने से कई कोटि उत्पन्न होती हैं और कई कोटि लीन हो जाती हैं। जैसे जल में तरङ्ग और बुलबुले उठकर लीन हो जाते हैं, वैसे ही सृष्टियाँ उत्पन्न और लीन होती हैं। पर अधिष्ठान ज्यों का त्यों है; क्योंकि उसमें कुछ भिन्न नहीं। ब्रह्म, आत्मा आदिक जो सब हैं, सो भी स्फुरण में हुए हैं। जब तक शब्द-अर्थ की भावना है, तबतक वे भासित होते हैं। जब भावना निवृत्त हो जायगी, तब शब्द या अर्थ कुछ न भासित होगा; केवल शुद्ध चैतन्यमात्र ही शेष रहेगा और संसार का भाव किसी जगह न होगा। जैसे पवन जब तक चलता है; तब तक जाना जाता है कि पवन है और गन्ध भी पवन ही से जानी जाती है कि सुगन्ध आई अथवा दुर्गन्ध आई, और जब पवन नहीं चलता तब उसका वेग नहीं मालूम होना और गन्ध भी नहीं ज्ञात होती, वैसे ही जब स्फुरण निवृत्त होता है, तब संसार और संसार का अर्थ, दोनों नहीं भासित होते। फुरने में जीव जीव प्रति सृष्टि है, उस सृष्टि में सत्तासमान ब्रह्म स्थित है। वही सबका अपना रूप है—वह द्वैत भाव को कभी नहीं प्राप्त हुआ।
हे राम! इस कारण ऐसा जानो कि आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि आदि सब पदार्थ आत्मा ही हैं, अथवा ऐसे जानो कि सब मिथ्या हैं,
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इनका साक्षी ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है। उससे कुछ भिन्न नहीं और उसी ब्रह्म के अंश में अनेक सुमेरु और मन्दराचल आदिक स्थित हैं। आत्मा में अंशांशीव भी स्थूलता के निमित्त कहे हैं, वास्तव नहीं हैं-समझाने के लिए कहे हैं। आत्मा एकरस है। हे राम! ऐसा कोई पदार्थ नहीं, जो आत्मसत्ता बिना हो। जिसको सत्य जानते हो, वह भी आत्मा है और जिसको असत्य जानते हो वह भी आत्मा है। आत्मा में जैसे सत्य फुरता है, वैसे ही असत्य भी फुरता है-फुरना दोनों का तुल्य है। जैसे मनुष्य स्वप्न में एक को सत्य और दूसरे को असत्य जानता है, वैसे ही जो इन्द्रियों के विषय होते हैं, उनको सत्य जानता है, और आकाश के फूल और शश के सींग को असत्य कहता है। ये सब अनुभव से जागे हैं, इससे अनुभवरूप हैं। ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो आत्मा में असत् नहीं। जो कुछ पदार्थ भासित होते हैं, सो सब फुरने से हुए हैं। क्या सत्य और क्या असत्य, सब मिथ्या और स्वप्न के सत् और असत् की तरह हैं। जो अनुभव से सिद्ध है सो सब सत्य है और अनुभव से भिन्न असत्य है। हे राम! तुम गुणातीत परमात्मस्वरूप में स्थित होओ। हे राम! ज्ञानवान् पुरुष भूत, भविष्य, वर्तमान, तीनों काल में सम रहता है। दसो दिशा, आकाश, जल, अग्नि आदिक सब पदार्थ उसको आत्मा ही देख पड़ते हैं-आत्मा से भिन्न कुछ नहीं जान पड़ता। ये सूर्य, चन्द्रमा और तारे, सब आत्मा हैं। यह विश्व आकाशरूप, शुद्ध और निर्मल है। आकाश में आकाश स्थित है, कुछ भिन्न नहीं। जो तुम्हें भिन्न लगे, उन्हें मिथ्या जानो। वे भ्रम से सिद्ध हुए हैं, कोई सत् नहीं। पर परमार्थ से देखो तो सब आत्मा ही है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्वाकाशैकताप्रतिपादनं नाम षोडशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह विश्व स्वप्न के समान है। जैसे स्वप्न की सेना नाना प्रकार की दीखती है और शस्त्र चलते देख पड़ते हैं, पर आत्मा में इनका रूप देखना और मानना मिथ्या है। शब्द और अर्थ
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कोई आत्मा में नहीं है। आत्मा जगत् में रहित है। पर जगतरूप में उसका भान होता है। अहं-त्वं जो कुछ भासित होता है सो सब स्वप्नवत् है और भ्रम से सिद्ध हुआ है। जो सब का अधिष्ठान है, वह सत्य है और सब उसी में कल्पित हैं। जो अनुभव में देखिये तो सब आत्मस्वरूप हैं, और भिन्न देखिये तो कुछ नहीं। जैसे स्वप्न के देश, काल, पदार्थ सब अर्थाकार भासित होने पर भी मिथ्या हैं, वैसे ही यह विश्व भ्रम में प्रकट होता है। शब्द-अर्थ की अपेक्षा से वह ओर त् है और उनकी अपेक्षा से वह अहं है, वास्तव में दोनों नहीं—जो है सो आत्मा ही है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि त्वं से अहं तक और अहं से त्वं तक सब स्वप्न की सेना की तरह मिथ्या हैं और अनुभव से देखिये तो आत्मरूप है, तो बताइए हम स्वप्न सेना में हैं अथवा हमारा अहं आत्मा है? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अनात्म देहादिक में यह अहं-भावना करना कि मैं हूँ, स्वप्न-सेना के तुल्य है, और अधिष्ठान चिन्मात्र दृश्य और अहंकार से रहित अहंभावना करना आत्मरूप है। हे राम ! तुम आत्मरूप हो। यह विश्व सत् भी नहीं और असत् भी नहीं। जो अधिष्ठानरूप से देखिये तो आत्मरूप है और जो अधिष्ठान से रहित देखिये तो मिथ्या है। वह अधिष्ठान शुद्ध, आनन्दरूप, चित्त से रहित चिन्मात्र परब्रह्म है। उसमें अज्ञान से दृश्य देख पड़ता है। जैसे असम्यक् दृष्टि से सीपी में रूपा भासित होता है, वैसे ही आत्मा में अज्ञानी दृश्य की कल्पना करते हैं।
हे राम ! दृश्य अविचार से सिद्ध है। विचार करने से कुछ वस्तु नहीं होती। पर जिसके आश्रय में वह कल्पित है वह अधिष्ठान सत्य है। जैसे सीपी के हट जाने से रूपे की बुद्धि जाती रहती है, वैसे ही आत्मविचार से विश्वबुद्धि जाती रहती है। जैसे समुद्र में पवन से तरङ्ग-चक्र उठते और प्रत्यक्ष होते हैं, पर विचार करने से तरङ्ग-चक्र में भी जलबुद्धि होती है, वैसे ही आत्मरूपी समुद्र में मन के उठने से विश्वरूपी तरंग चक्र उठते हैं और विचार करने से तुमको मन के उठने में भी आत्मरूप भासित होगा, विश्वरूपी तरंग-चक्र न भासित
* निर्वाण प्रकरण * [३५५]
होंगे और भ्रम निवृत्त हो जायगा। जो वस्तु स्फुरण में उपजी है वह स्फुरण न होने पर निवृत्त हो जाती है। यह विश्व अज्ञान मे उपजा है और ज्ञान से लीन हो जायगा। इससे विश्व को भ्रममात्र जानो। राम ने पूछा, हे भगवन्! आपने कहा कि ब्रह्मा, रुद्र आदि और उत्पत्ति संहार करने तक सब विश्व भ्रममात्र है। इस ज्ञान से क्या सिद्ध होता है? यह तो प्रत्यक्ष दुःखदायक लगता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो कुछ देखते हो सो सम्यक् दृष्टि से सब आत्मरूप है—कुछ भिन्न नहीं—और असम्यक् दृष्टि से विश्व है। यह दृष्टि का भेद है। सम्यक्-असम्यक् देखने में भी अधिष्ठान ज्यों का त्यों है। जैसे अन्धकार में रस्सी सर्प जान पड़ती है और भयदायक होती है, और जो प्रकाश में देखिये तो रस्सी ही देख पड़ती है, वैसे ही जिसने आत्मा को जाना है, उसको दृश्य संसार भी आत्मरूप है। अज्ञानी को विश्व प्रतीत होता है और दुःखदायी होता है। जैसे मूर्ख बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना कर डरता है, और अपने अज्ञान से दुःख पाता है। तो अगर यथार्थ ज्ञान हो तो भय क्यों पावे?
हे राम! जीव अपने ही संकल्प से आप बँधता है। जैसे कुमवारी नाम का कीड़ा अपने बैठने का स्थान बनाकर आपही उसमें कैद होकर मरता है, वैसे ही अनात्मा में अहं प्रतीत करके जीव आप ही दुःख पाता है। हे राम! जीव आप ही संसारी और आप ही ब्रह्म होता है। जब दृश्य की ओर जाता है, तब संसारी होता है और जब स्वरूप की ओर जाता है तब ब्रह्म आत्मा होता है। इसमें जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो। जो संसारी होने की इच्छा हो तो संसारी बनो और जो ब्रह्म होने की इच्छा हो तो ब्रह्म हो जाओ। मुझसे पूछो तो दृश्य अहंकार को त्यागकर आत्मा में स्थित हो रहो। यह विश्व भ्रममात्र है, वास्तव नहीं। यही पुरुषार्थ है कि संकल्प से संकल्प को काटो। जब बाहर से अन्तर्मुख होगे, तब ब्रह्म ही भासित होगा और दृश्य की कल्पना मिट जावेगी; क्योंकि यह दृश्य आगे भी नहीं था। हे राम! जो सत् वस्तु आत्मा है, उसका अनेक यत्नों से भी नाश नहीं होता, और जो असत्य
३५६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
अनात्मा है, उसके निमित यत्न कीजिये तो मन नहीं होता। जो सत्य वस्तु है, उसका कदापि अभाव नहीं, और जो असत है, उसका भाव नहीं होता। असत वस्तु तबतक भासित होती है, जबतक उसको भली प्रकार नहीं जाना जाता। जब विचार में देखिये, तब नष्ट हो जाती है। अविद्या के पदार्थ विद्या में नष्ट हो जाते हैं—जैसे स्वप्न का सुमेरु पर्वत सत्य हो तो जाग्रत में भी दिखे—इसमें वास्तव में वह है ही नहीं। यह संसार जो तुमको दिखता है, सो स्वरूप के ज्ञान से नष्ट हो जावेगा। इसमें पूछो तो हमको आत्मा से भिन्न कुछ नहीं दिखता, सब आत्मा ही है। यह भाव भी हममें नहीं कि यह जीव अज्ञानी है, किसी प्रकार मोक्ष हो। न हमको ज्ञान से प्रयोजन है, न मोक्ष होने से प्रयोजन है, क्योंकि हमको सब आत्मा ही दिखता है।
हे राम! जबतक चेतन है तबतक मरना और जन्म भी पाता है। जब जड़ या निर्वाण होता है, तब शान्ति को पाकर मुक्त होता है। चेतन दृश्य की ओर वासना को कहते हैं, इसी से जीव जन्म-मरण के बन्धन में पड़ता है। जब दृश्य के स्फुरण की ओर से जड़ सा हो जाता है, तब मुक्त होता है। इसका होना ही दुःख और न होना ही मुक्ति है। अहंकार का होना बन्धन है और अहंकार का न होना मुक्ति। इसमें पुरुष-प्रयत्न यही है कि अहंकार का त्याग करे और चैतन्य ब्रह्मघन अपने रूप में स्थित होओ। जिनको संसार के सत होने की भावना है, उनको संसार ही होता है, ब्रह्म नहीं मिलता और जिनको ब्रह्मभावना हुई है, उनको ब्रह्म ही भासित होता है। हे राम! चाहे पाताल में जाय अथवा सम्पूर्ण पृथ्वी दसों दिशा, आकाश, देवताओं के स्थान में फिरे तो भी सुख न पावेगा और आत्मा का दर्शन न होगा; क्योंकि अनात्म का अहंकार करने से सुख नहीं मिलता। जब आत्मदर्शी होकर देखोगे तो सब आत्मा ही भासित होगा।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्वविजयो नाम सप्तदशाधिकशततमसर्गः ॥ ११७ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह संसार संकल्पमात्र और तुच्छ है।
✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ३५७
पर्वत, नदियाँ, देश और काल सब भ्रम से सिद्ध होते हैं। जैसे निद्रादोष से स्वप्न में पर्वत, नदियाँ, देश, काल भासित होते हैं, वैसे ही अज्ञाननिद्रा में यह संसार दिखता है। हे राम! जागकर देखो तो संसार है ही नहीं। इसका तरना महासुगम है। और सुमेरु पर्वतादिक जो भासित होते हैं, वे कमल की तरह कोमल हैं। जैसे कमल के मँदने में कुछ यत्न नहीं होता वैसे ही ये निवृत्त होते हैं। अज्ञानियों की दृष्टि स्थूल है और उससे आकार को सब देख रहे हैं। जैसे पवन का चलना जाना जाता है, और जब वह नहीं चलता तब मूर्ख उसके अस्तित्व को नहीं जानता, वैसे ही ये प्राणी आकार को जानते हैं, और इसमें जो निराकार स्थित है, उसको नहीं जानते। जैसे पवन चलता है तो भी पवन है और ठहरता है तो भी पवन है, वैसे ही विश्व प्रकट होने पर भी आत्मा है और न फुरने में भी वही है। इससे विश्व भी आत्मरूप है, कुछ भिन्न नहीं। जो सम्यक्दर्शी हैं, उनको विश्व के फुरने न फुरने में आत्मा ही भासित होता है। जैसे स्पन्द व निःस्पन्दरूप पवन ही है, वैसे ही ज्ञानी को सर्वदा सब एकरस है, और अज्ञानी को द्वैत दिखता है। जैसे ठूँठ में बालक पिशाचबुद्धि करता है, वैसे ही अज्ञानी आत्मा में जगद्बुद्धि करता है। जैसे नेत्रदोष से आकाश में वृक्ष दिखते हैं, वैसे ही मन के स्फुरण में जगत् भासित होता है।
हे राम! जैसे वायु का रूप कभी नहीं होता, वैसे ही जगत् का अत्यन्त अभाव है। जैसे मरुस्थल में जल का अभाव है, वैसे ही आत्मा में जगत् का अभाव है। हे राम! सुमेरु पर्वत, आकाश, पाताल, देवता, यक्ष, राक्षस इत्यादि सहित ऐसे अनेक ब्रह्माण्ड इकट्ठे करके विचार-रूपी काँटे में रक्खे और पीछे आधी रत्ती डालें तो भी वे बराबर नहीं होते; क्योंकि हैं ही नहीं, अविचारसिद्ध हैं। स्वप्न के पर्वत जागने पर चावल भर भी नहीं रहते, क्योंकि हैं नहीं, भ्रममात्र हैं। हे राम! इस संसार की भावना मूर्ख करते हैं। ऐसे जो अनात्मदर्शी पुरुष हैं, उनको ऐसे जानो, जैसे लुहार की धौंकनी से हवा निकलती है, वैसे ही उन पुरुषों की साँसें वृथा आती जाती हैं। जैसे आकाश में अँधेरा
३५ = * योगवाशिष्ठ *
व्यर्थ उठती है वैसे ही उन पुरुषों का जीना और अब सब चेष्टाएँ व्यर्थ हैं। ये आत्मघाती हैं अर्थात् अपना नाश आप करते हैं। उनकी चेष्टाएँ दुःख का निमित्त हैं। हे राम! यह मन अपने अधीन है। जो दृश्य की ओर होता है तो संसार होता है और जो अन्तर्मुख होता है तो सब आत्मा ही होता है। यह संसार मिथ्या है। न सत् कहिये, न असत् कहिये। यह संसार भ्रम से हुआ है। ये जीव भूत, भविष्य और वर्तमान काल में विपरीत देखते हैं। जैसे अग्नि शीतल होती है, आकाश पाताल में पाताल आकाश में तारे पृथ्वी पर पृथ्वी आकाश के ऊपर भी होती है; बादल बिना वर्षा होती है और आकाश में हल फिरते हैं—ऐसे कौतुक में देखता हूँ।
हे राम! इसमें कुछ आश्चर्य नहीं; मन ही में सब कुछ होता है। जैसे मनोराज्य में होता है, वैसा ही आगे स्थित होता है और उसकी सिद्धि होती है। पर्वत पुर में भिक्षुक के समान भिक्षा माँगने फिरते हैं, ब्रह्माण्ड उड़ते फिरते हैं, बालू से तेल निकलता है, मृतक युद्ध करते हैं, मृग गाते हैं और वन नृत्य करते हैं। हे राम! मनोराज्य में सब कुछ बनता है। चन्द्रमा की किरणों में पर्वत भस्म होते हैं, इसमें क्या आश्चर्य है? ऐसे ही यह संसार भी मनोराज्य है और शीघ्र संवेग है। इस कारण जीव उसको सत् मानता है, और आगे जो बालू में तेल आदि का निकलना कहा है उसको सत् नहीं जानता; क्योंकि उसमें मृदु संवेग है; पर हैं दोनों तुल्य। हे राम! जिनको सत् और असत् कहते हो, आत्मा में वे दोनों नहीं हैं। ये जो तुमको सत् पदार्थ भासित होते हैं तो अग्नि आदिक शीतल भी सत् हैं और जो ये मिथ्या भासित होते हैं तो वे भी मिथ्या हैं, केवल तीव्र और मृदु संवेग है। जब तीव्र संवेग दूर होता है, तब सब मिथ्या माने जाते हैं। जैसे स्वप्ने से जागा हुआ स्वप्न को मिथ्या और जाग्रत् को सत्य कहता है, पर दोनों मनोराज्य हैं। हे राम! जितने आकार देख पड़ते हैं, उन सबको मिथ्या जानो। न तुम हो, न मैं हूँ और न यह जगत् है। परमार्थ सत्ता ज्यों की त्यों है, उसमें अहं-त्व की भावना नहीं
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३५६
उठती। वह केवल शान्तरूप, आकाशरूप और निराकाररूप है। उसमें कुछ भी द्वैत नहीं—केवल अपने रूप में स्थित है। जैसे बालक मृत्तिका के हाथी, घोड़े और मनुष्य बनाकर उनके नाम रखता है कि यह राजा है, यह हाथी है, यह घोड़ा है, सो वे सब मृत्तिका से भिन्न नहीं हैं, पर बालक के मन में उनके नाम भिन्न-भिन्न दृढ़ होते हैं; वैसे ही मनरूपी बालक नाना प्रकार की संज्ञाओं की कल्पना करता है, पर आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है। इससे हे राम ! तुम किसका भय करते हो ? निर्भय रहो। तुम्हारा स्वरूप शुद्ध, निर्भय और अविद्या के कारण-कार्य से रहित है। उसी में स्थित रहो। यह संसार तुम्हारे स्फुरण में हुआ है। आत्मा न सत्य है, न असत्य, न जड़ है, न चेतन; न प्रकाश है न तम; न शून्य है, न अशून्य। शास्त्र ने जो विभाग कहे हैं कि यह जड़ है, यह चेतन है, सो इस जीव के जगाने के निमित्त कहे हैं। आत्मा में कोई वास्तव संज्ञा नहीं, केवल आत्मत्वमात्र है। इससे दृश्य की कलना त्यागकर आत्मा में स्थित हो। ब्रह्मा से स्थावर तक सब कल्पनामात्र हैं, इसमें क्या आस्था करना है ? संसार के दोनों भाव तुल्य हैं। स्फुरण जैसा भाव का है, वैसा ही अभाव का—स्वरूप में दोनों की तुल्यता है; और व्यवहारकाल में जैसा है; वैसा ही है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे विश्वप्रमाणवर्णनं नामाष्टदशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११८ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! भूमिका प्रसङ्ग यहाँ चला था। उसमें जो सार आपने कहा, वह मैं समझ गया। अब भूमिकाओं का विस्तार कहिये। योगी का शरीर जब छूटता है और स्वर्ग के भोगों को भोगकर वह नीचे गिरता है तब फिर उसको क्या अवस्था होती है, यह भी कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस योगी को भोग की वाञ्छा होती है, वह स्वर्ग में जाकर भोग भोगता है। पर यदि उसको और भी भोगने की इच्छा होती है तो वह मध्यममण्डल मनुष्यलोक में पवित्रस्थान और धनवानों के गृह में जन्म लेता है। और जो उसको भोग की वाञ्छा और नहीं होती तो ज्ञानवानों के गृह में जन्म लेता
३६० ✻ योगवाशिष्ठ ✻
है। थोड़े काल के उपरान्त उसका पिछला संस्कार उदय होता है। उसे स्मरण कर वह आत्मा की ओर उन्मुख होता जाता है। जैसे कोई पुरुष लिखता हुआ सो जाता है, पर जब जागता है तब उस लिखे को देखकर फिर आगे लिखता है, वैसे ही वह योगी पहले के अभ्यास को दिन-दिन बढ़ाता जाता है। वह अज्ञानी का संग नहीं करता; क्योंकि अज्ञानी भोगों की ओर उन्मुख और आत्ममार्ग से बहिर्मुख हैं। वह जो चुगली करनेवाले हैं, उनका संग नहीं करता। उसके सब अवगुण नष्ट हो जाते हैं और दम्भ, गर्व, राग, द्वेष, भोग की तृष्णा आदि स्वाभाविक रूप में छूट जाते हैं। वह शान्ति को प्राप्त होता है। उसे कोमलता, दया आदि शुभ गुण स्वाभाविक रूप में प्राप्त होते हैं।
हे राम ! इस निश्चय को पाकर वह वर्णाश्रम के धर्म यथाशास्त्र करता हुआ संसारसमुद्र के पार के निकट प्राप्त होता है, पर पार नहीं होता, यह भेद है। यह तीसरी भूमिका है—इसके बाद फिर मोह को नहीं प्राप्त होता, जैसे चन्द्रमा की किरणें भी ताप को नहीं प्राप्त होतीं, वैसे ही तीसरी भूमिकावाला संसाररूपी गड्ढे में नहीं गिरता। हे राम ! ये सप्तभूमिका ब्रह्मरूप हैं। पर इतना ही भेद है कि तीन भूमिका जाग्रत् रूप हैं; चतुर्थ स्वप्न है; पंचम सुषुप्ति है; छठी तुरीय है ओर सप्तम तुरीयातीत है। हे राम ! प्रथम तीन भूमिकाओं में संसार की सत्यता जान पड़ती है, इससे इन्हें जाग्रत् कहा है और पिछली चारों में संसार का अभाव है इससे ये जाग्रत् से विलक्षण हैं। जाग्रत् में घट, पट आदिक पदार्थ सत् लगते हैं कि घट घट ही है और पट पट ही है, अन्यथा नहीं; ये अपना ही अपना कार्य करते हैं, इससे अपने काल में ज्यों के त्यों हैं। इसी प्रकार सब पदार्थ हैं। तीसरी भूमिकावाला स्थावर-जङ्गम को जानता है, उन्हें नाम और रूप में ग्रहण करता है; पर हृदय में रागद्वेष नहीं रखता, क्योंकि विचार करके उसने इन्हें तुच्छ जाना है; पर संसार का अत्यन्त अभाव नहीं जाना, और ब्रह्मस्वरूप को भी वह नहीं जानता, क्योंकि उसको स्वरूप का साक्षात्कार नहीं हुआ। जब स्वरूप को जानेगा, तब संसार का अत्यन्त अभाव हो जायगा। इन तीनों भूमि-
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३६१
काओं से संसार तुच्छ लगता है पर नष्ट नहीं होता । इनको पाकर जब शरीर छूटता है, तब और जन्म में उसको ज्ञान प्राप्त होता है, और वह दिन-दिन ज्ञानपरायण होता है ।
जब बुद्धि शुद्ध होती है, तब ज्ञान उपजता है । जैसे बीज में प्रथम अंकुर होता है और फिर डाल, फूल, फल निकलते हैं, वैसे ही प्रथम भूमिका ज्ञान का बीज है, दूसरी अंकुर है, तीसरी डाल है और चतुर्थ में जो ज्ञान की प्राप्ति होती है वही फल है । प्रथम तीन भूमिकाओं वाला धर्मात्मा और पुरुषों में श्रेष्ठ होता है । उसका लक्षण यह है कि वह निरहंकार, असंग और धीर होता है । उसकी बुद्धि में विषयों की तृष्णा निवृत्त हो जाती है और वह आत्मपद की इच्छा रखता है । यह पुरुष श्रेष्ठ कहाता है; यथार्थ आचरण यथाशास्त्र करता है, शास्त्रमार्ग को कभी नहीं छोड़ता । जो शास्त्रमार्ग में मर्यादा के साथ अपने प्रकृत आचरण से विचरता है, वह पुरुष श्रेष्ठ है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! पीछे आप कह आये हैं कि जब मनुष्य शरीर छोड़ता है तब एक मुहूर्त में उसको युग व्यतीत होता है, और जन्म से मरणपर्यन्त जैसे कर्मों की भावना होती है वैसा आगे भासित होता है । सो एक मुहूर्त में युग कैसे भासित होता है, यह कहिये ।
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह जगत् जो नाना कालों सहित भासित होता है, वह ब्रह्मस्वरूप ही है भिन्न कुछ नहीं-समान ही है । जैसे ईख में मिठास है, वैसे ही ब्रह्म में जगत् है । जैसे तिलों में तेल और मिरचों में तीक्ष्णता है, वैसे ही आत्मा में जगत् है । जैसे तिलों में तेल होता है वैसे ही ब्रह्म में जगत् है । कहीं सत्, कहीं असत्, कहीं जड़, कहीं चेतन, कहीं शुभ, कहीं अशुभ, कहीं नरक, कहीं मृतक, कहीं जीवित, ब्रह्मा से काष्ठपर्यन्त भाव-अभाव होता है । वह सत्-असत् में विलक्षण है । आत्मसत्ता में सब सत्य है और भिन्न देखिये तो असत्य है । हे राम ! जिनको सत्य या असत्य जानते हो, यथा पृथ्वी आदि पदार्थ सत्य और आकाश के फूल आदि असत्य हैं, ये दोनों तुल्य हैं । जो विद्यमान पदार्थ सत्य मानिये तो आकाश के फूल भी सत् मानिये । जैसे स्वप्न में
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कई पदार्थ सत् और असत् भासित होते हैं, वैसे ही जाग्रत् में भासित होते हैं; पर फुरना दोनों का समान है। जैसे सत्य पदार्थों का स्फुरण हुआ है, वैसे ही असत् का भी हुआ है; स्फुरण से रहित सत्-असत् दोनों का अभाव हो जाता है। इसलिए यह विश्व भ्रम से सिद्ध हुआ है। जैसे जल में पवन से भँवर उठते हैं, वैसे ही आत्मा में स्फुरण होने से यह संसार भासित होता है, इसकी भावना त्यागकर स्वरूप में स्थित हो रहो।
तुमने जो प्रश्न किया कि एक मुहूर्त में युग कैसे भासित होता है, उसका उत्तर सुनो। जैसे किमी पुरुष को स्वप्न देख पड़ता है तो एक क्षण में बड़ा काल बीता जान पड़ता है तथा और का और भासित होता है सो आश्चर्य तो कुछ नहीं मोह से सब कुछ उत्पन्न होता है और भ्रम से देख पड़ता है। हे राम ! जैसे पुरुष सोते में तो एक आप ही होता है, पर उसमें नाना प्रकार का जगत् भ्रम से भासित होता है, वैसे ही स्वरूप के प्रमाद से जीव कई भ्रम देखता है। स्वरूप के जाने बिना भ्रम का अन्त नहीं होता। इससे तुम और प्रश्न किस निमित्त करते हो ? एक चित्त को स्थिर करके देखो तो न कोई संसार प्रतीत होगा; न कोई जन्म-मरण होंगे; न कोई बन्धन है, न मोक्ष है, केवल आत्मा ही भासित होगा। जब संकल्प उठता है, तब अविद्या से अपने को बँधा जानता है, संकल्प से रहित होने पर मुक्त और विद्या से मुक्त जानता है, पर आत्मस्वरूप ज्यों का त्यों है। उसे न बन्धन है, न छुटकारा है, न विद्या है और न अविद्या—वह केवल शान्तरूप है। इससे सर्वदा सब प्रकार, सब ओर से ब्रह्म ही है, दूसरा कुछ नहीं। हे राम ! जब स्वरूप की भावना होती है, तब संसार की भावना जाती रहती है। ये सब शब्द कल्पना में हैं कि यह पदार्थ है, यह नहीं है; आत्मा में यह कोई नहीं। जैसे पवन चलने और ठहरने पर एक ही है, वैसे ही विश्व चित्त का चमत्कार है। ब्रह्मा से चींटी तक ब्रह्मसत्ता ही अपने आपमें स्थित है और आत्मा ही के आश्रय से शब्द फुरते हैं। पर आत्मा फुरने और न फुरने में सम है; क्योंकि उससे भिन्न दूसरा कोई नहीं है।
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३६३
हे राम ! जो ब्रह्मसत्ता ही है तो आकाश क्या है, पृथ्वी क्या है, मैं क्या हूँ, यह जगत् क्या है, ये प्रश्न उठते नहीं। एक मन को स्थिर करके देखो कि ब्रह्मा से चींटी तक जो कुछ भी पदार्थ हैं वे सब सत् भासित हों तो प्रश्न कीजिये। इसलिए जैसे भ्रम से दूसरा चन्द्रमा दिखता है, वैसे ही जगत् भी भ्रम से भासित होता है। रूप अर्थात् दृश्य, अवलोक अर्थात् इन्द्रियाँ, मनस्कार अर्थात् मन की स्फूर्ति ये शब्द कल्पना में फुरे हैं। ये सब मिथ्या हैं—आत्मा में इनका अस्तित्व नहीं है। हे राम ! आकाश आदि पदार्थ भावना में स्थित हैं। जीव जैसी भावना करता है, वैसे पदार्थ सिद्ध और भासित होते हैं। जब संसार की भावना उठ जाय, तब कोई पदार्थ न भासित हो। हे राम ! सुषुप्ति में ही जब इसका अभाव हो जाता है, तो तुरीयावस्था में कैसे भान हो ? जब जीव अपने स्वरूप से गिरता है, तब उसको संसार भासित होता है और वह संसार में वासना और प्रमाद से घटीयन्त्र की तरह घूमता फिरता है। स्वरूप से उतरकर अनात्म में अभिमान करने को—मैं हूँ, मैं ही करता हूँ, इस भावना को प्रमाद कहते हैं। यही अज्ञान है जिससे दुःख मिलता है। जब अज्ञान नष्ट होगा तब संसार के शब्द-अर्थ का अभाव हो जायगा। अहंकार से संसार होता है। संसार का बीज अहंकार ही है। अहंकार अनात्मा देह में आत्म अभिमान करने को कहते हैं।
हे राम ! शुद्ध आत्मा अहंकार के उत्थान से रहित केवल शान्त-रूप है। विश्व का भी वही रूप है, इस भावना में दुःख है। यह संवित् शक्ति आत्मा के आश्रय से फुरती है। जैसे तेल की बूँद जल में डालिये तो चक्र की नाईं फिरती है, वैसे ही संवेदनशक्ति आत्मा के आश्रित फुरती है। ब्रह्म एक स्वरूप है। उसका स्वभाव ऐसा है जैसे मोर का अण्डा और उसका वीर्य एकरूप है। अपने स्वभाव से वीर्य ही नाना प्रकार के रङ्ग रखता है, तो भी मोर से कुछ भिन्न नहीं; वैसे ही आत्मा के संवेदन स्वभाव से नाना प्रकार का विश्व भासित होता है, परन्तु आत्मा से कुछ भिन्न नहीं—सब आत्मरूप ही है। सम्यक्दर्शी को
३६४ * योगवाशिष्ठ *
नाना प्रकारों में एक आत्मा ही दीखता है और अज्ञानी को नाना प्रकार का जगत् दीखता है । हे राम ! ब्रह्मरूपी एक शिला है, उसमें त्रिलोकीरूपी अनेक पुतलियाँ कल्पित हैं। जैसे एक शिला में शिल्पी जब पुतलियों की कल्पना करता है कि इसमें इतनी पुतलियाँ होंगी, तब वे पुतलियाँ उसके चित्त में हैं, और शिला में कुछ नहीं हुआ, तैसे ही आत्मरूपी शिला में चित्तरूपी शिल्पी जो नाना प्रकार के पदार्थ-रूपी पुतलियों की कल्पना करता है सो सब आत्मरूप हैं। इसमें पदार्थों की भावना त्यागकर आत्मा में स्थित हो । यह संसार भी निर्वाच्य है; क्योंकि यह ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न नहीं । न कोई उपजता है, न कोई नष्ट होता है, ज्यों का त्यों आत्मा ही स्थित है ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगदभावप्रतिपादनं नाम शताधिकैकोनविंशतितमस्सर्गः ॥ ११९ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो इस संसार का बीज अहंकार हुआ । उसका पिता अहंकार है तो मिथ्या संसार जो अविद्यमान ही विद्यमान लगता है सो भी भ्रमरूप हुआ ? और जो संसार भ्रमरूप है तो लोग और शास्त्र, श्रुतियाँ और स्मृतियाँ क्यों कहती हैं कि इसका शरीर पिण्ड में होता है ? और जो पिण्ड में होता है तो आप कैसे उसे भ्रम कहते हैं ? जो भ्रम है तो लोक, शास्त्र, श्रुतियाँ और स्मृतियाँ क्यों उसे पिण्ड में कहती हैं ? इस मेरे संशय को निवृत्त कीजिये । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मेरा कहना सत्य है । ब्रह्म में ब्रह्मत्व स्वभाव है और जगत् का स्वरूप भी वही है । हे राम ! आदि जो किञ्चित् हुआ और चित्तशक्ति फुरी, वही ब्रह्मरूप हुआ और उसको पदार्थों का मनोराज्य हुआ । यह आकाश है, यह पवन है, यह कर्तव्य है, यह अकर्तव्य है, यह सत्य है, यह झूठ है इत्यादि मनोराज्य जब तक है तब तक सब मर्यादा ऐसी ही है । फिर ब्रह्मा ने यह सोचा कि जगत् की मर्यादा के निमित्त वेद में कहूँ कि यह पदार्थ शुभ है और यह अशुभ है । हे राम ! आत्मा में कुछ द्वैत नहीं । मायारूप जगत् में मर्यादा है, तो अधः, ऊर्ध्व, नीच, ऊँच कौन कहे ? यह मर्यादा भी वेद में नीति निश्चय हुई है कि ये
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३६५
शुभ कर्म हैं, इनके करने से स्वर्ग-सुख ही भोगते हैं और ये अशुभ कर्म हैं, इनके करने से नरकदुःख भोगते हैं। हे राम! जैसे वेद में निश्चय किया है, वैसे ही जीव अपनी वासना के अनुसार भोगता है। हे राम! यह रचित शक्ति नीति होकर ब्रह्मादिक में फुरी है। परन्तु उन देवों को सदा स्वरूप में निश्चय है, इससे वे संसार में नहीं बँधते। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र ने यह वेद रचा है कि जैसा कोई कर्म करे, वैसा ही फल वे देते हैं। यह वेद सबकी नीति है।
हे राम! जिन पुरुषों को संसार की सत्यता दृढ हुई है, वे शुभ अथवा अशुभ जैसे कर्म करते हैं, वैसे ही शरीर को धारण करते हैं। इसमें संशय नहीं कि जो शास्त्रमर्यादा का अपनी इच्छा से उल्लंघन करते हैं, वे शरीर त्यागकर कुछ काल तक मूर्च्छित हो जाते हैं और आत्मज्ञान बिना एक मुहूर्त में जागकर बड़े नरकों को चले जाते हैं। जिनको शून्यभावना हुई है कि आगे नरक-स्वर्ग कोई नहीं, और जो लोक-परलोक के भय को त्यागकर शास्त्र बाह्य आचरण करते हैं, वे मरकर पत्थर, वृक्षादिक की जड़योनि पाते हैं। चिरकाल से वासना बलवती होने के कारण वे फिर दुःख के भागी होते हैं। और जिनको आत्मभावना हुई है और संसार की भावना निवृत्त हुई है, वे शास्त्र-विहित करें, अथवा शास्त्रविरुद्ध करें, उनका कोई बन्धन नहीं होता। हे राम! मनुष्य चित्तरूपी भूमि में निश्चयरूपी जैसा बीज बोता है, वैसा ही काल पाकर उगता है—यह निःसंशय है। इससे तुम आत्म-भावणारूप बीज बोओ, समझो कि सब आत्मा ही है। ऐसी भावना करो, तब शुद्ध आत्मा ही भासित होगा और जिनका संसार का निश्चय हुआ है, उनको संसार है। हे राम! जो पुरुष धर्मात्मा हैं, उनको उसी वासना के अनुसार भासित होता है। धर्मात्मा भी दो प्रकार के हैं—एक सकाम और दूसरे निष्काम। जो धर्म करते हैं और पापरूपी कामना सहित हैं, वे स्वर्गभोग भोगकर फिर गिरते हैं। और जो निष्काम ईश्वरार्पण कर्म करते हैं, उनका अन्तःकरण शुद्ध होकर ज्ञान की प्राप्ति होती है।
३६६ ❇ योगवाशिष्ट ❇
यह भी संसार में मर्यादा है कि जैसा किमी को निश्चय होता है, वैसा ही वह संसार को देखता है। पिण्ड में भी शरीर होता है, क्योंकि यह भी आदि-नीति में निश्चय हुआ है। जैसे आदि-नीति में निश्चय हुआ है, वैसे ही होता है। जो पवन है सो पवन ही है और जो अग्नि है सो अग्नि ही है। इसी प्रकार कल्पपर्यन्त जैसे मनोराज्य हुआ है; वैसे ही स्थित है। जैसे जल नीचे ही को जाता है, ऊपर नहीं जाता, वैसे ही जो आदि में निश्चय हुआ है वही कल्पभर रहता है। हे राम! जगत् व्यवहार में तो ऐसे हैं और परमार्थ में दूसरा कुछ हुआ नहीं। इस जीव ने आकाश में मिथ्या देह रची है। परमार्थ दृष्टि से केवल निराकार अद्वैत आत्मा है, शरीर इसके साथ नहीं है। इससे जगत् कैसे हो?
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे पिण्डनिर्णयो नाम शताधिकविंशतितमस्सर्गः ॥ १२० ॥
वशिष्टजी बोले, हे राम! अपने प्रश्न पर बृहस्पति और राजा बलि का एक इतिहास सुनो। जब छः कल्प व्यतीत हुए तो दूसरे परार्द्ध में राजा बलि हुआ। वह महापराक्रमी था। उस राजा बलि ने सम्पूर्ण दैत्यों और राक्षसों को जीतकर अपने वश में किया और उन पर अपनी आज्ञा चलाई। इन्द्र को भी जीतकर अपने वश में किया और उसका सम्पूर्ण ऐश्वर्य ले लिया। देवताओं और किन्नरों पर उसकी आज्ञा चली और भूलोक भी उसने ले लिया। जब वह सब ले चुका, तब उसने धर्म-आचार को ग्रहण किया। एक समय सब सभा जुड़ी थी, उसमें यह चर्चा चली कि जन्म कैसे होता है और मरण कैसे होता है? तब राजा बलि ने देवगुरु बृहस्पति से प्रश्न किया कि हे ब्राह्मण! यह पुरुष जब मृतक होता है, तब शरीर तो भस्म हो जाता है, फिर कर्मों के फल यह कैसे भोगता है और शरीर बिना कैसे आता-जाता है, सो कहिये?
बृहस्पति बोले, हे राजन! जीव के देह नहीं है। जैसे मरुस्थल में जल भासित होता है पर वास्तव में होता नहीं, वैसे ही जीव के साथ शरीर भासित होता है, पर है नहीं। जीव न जन्मता है, न मरता है,
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३६७
न भस्म होता है, न दुःखी होता है। यह सदा अच्युतरूप है। पर स्वरूप के प्रमाद से अपने को दुःखी जानता है कि मैं दुःख भोगता हूँ और जन्मा हूँ; इतना काल हुआ है; यह मेरी माता है; यह पिता है; मैं इनसे उपजा हूँ। फिर अपने को मृतक हुआ जानता है। हे राजन्! भ्रम से ऐसे देखता है, जैसे निद्राभ्रम में स्वप्न में देखता है, वैसे ही अज्ञान में जीव आपको मानता है। जब मृतक होता है, तब जानता है कि मेरा शरीर पिण्ड में हुआ है और अब मैं दुःख-सुख भोगूँगा। जैसे स्वप्न में आकाश होता है और वहाँ वासना से अपने साथ शरीर देखता है और सुख-दुःख भोगता है, वैसे ही मरकर जीव अपने साथ शरीर देखता है और दुःख-सुख का भागी होता है। परमार्थ से इसके साथ शरीर ही नहीं तो जन्म-मरण कैसे हों? स्वरूप में प्रमाद करके देहधारी की तरह स्थित हुआ है और उस देह में मिलकर जैसी-जैसी भावना करता है, वैसा ही फल भोगता है और वासना के अनुसार जैसी भावना होती है, वैसे ही आगे शरीर देखता है और पञ्चभौतिक संसार को देखता है, इस प्रकार भ्रमता है और अपने को जन्मता-मरता देखता है। जैसे समुद्र से तरङ्ग उठता और मिट जाता है, वैसे ही शरीर उपजता और नष्ट होता है। शरीर के सम्बन्ध से ही उपजता और नष्ट होता जान पड़ता है। वह आश्चर्य है कि आत्मा ज्यों का त्यों स्वाभाविक स्थित है, उसमें वासना के अनुसार विश्व देखता है।
हे राजन्! विश्व इसके हृदय में स्थित है और यह भावना के अनुसार आगे देखता है। इस जीव में विश्व है, पर विश्व में जीव नहीं। जैसे तिल में तेल है पर तेल में तिल नहीं; सुवर्ण में भूषण कल्पित है, भूषण में सुवर्ण कल्पित नहीं, वैसे ही विश्व सत् भी नहीं और असत् भी नहीं। सत् इस कारण नहीं कि चलरूप है स्थिर नहीं और असत् इस कारण नहीं कि विद्यमान लगता है। इससे इसकी भावना त्यागो। यह दृश्य मिथ्या है, इसका अनुभव मिथ्या है और इसका जाननेवाला अहंकारी जीव भी मिथ्या है। जैसे मरुस्थल में जल मिथ्या है, वैसे ही आत्मा में अहंकार और जीव भी मिथ्या है। हे राजन्! जबतक शास्त्रों