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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1175, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1175

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३६७

न भस्म होता है, न दुःखी होता है। यह सदा अच्युतरूप है। पर स्वरूप के प्रमाद से अपने को दुःखी जानता है कि मैं दुःख भोगता हूँ और जन्मा हूँ; इतना काल हुआ है; यह मेरी माता है; यह पिता है; मैं इनसे उपजा हूँ। फिर अपने को मृतक हुआ जानता है। हे राजन्! भ्रम से ऐसे देखता है, जैसे निद्राभ्रम में स्वप्न में देखता है, वैसे ही अज्ञान में जीव आपको मानता है। जब मृतक होता है, तब जानता है कि मेरा शरीर पिण्ड में हुआ है और अब मैं दुःख-सुख भोगूँगा। जैसे स्वप्न में आकाश होता है और वहाँ वासना से अपने साथ शरीर देखता है और सुख-दुःख भोगता है, वैसे ही मरकर जीव अपने साथ शरीर देखता है और दुःख-सुख का भागी होता है। परमार्थ से इसके साथ शरीर ही नहीं तो जन्म-मरण कैसे हों? स्वरूप में प्रमाद करके देहधारी की तरह स्थित हुआ है और उस देह में मिलकर जैसी-जैसी भावना करता है, वैसा ही फल भोगता है और वासना के अनुसार जैसी भावना होती है, वैसे ही आगे शरीर देखता है और पञ्चभौतिक संसार को देखता है, इस प्रकार भ्रमता है और अपने को जन्मता-मरता देखता है। जैसे समुद्र से तरङ्ग उठता और मिट जाता है, वैसे ही शरीर उपजता और नष्ट होता है। शरीर के सम्बन्ध से ही उपजता और नष्ट होता जान पड़ता है। वह आश्चर्य है कि आत्मा ज्यों का त्यों स्वाभाविक स्थित है, उसमें वासना के अनुसार विश्व देखता है।

हे राजन्! विश्व इसके हृदय में स्थित है और यह भावना के अनुसार आगे देखता है। इस जीव में विश्व है, पर विश्व में जीव नहीं। जैसे तिल में तेल है पर तेल में तिल नहीं; सुवर्ण में भूषण कल्पित है, भूषण में सुवर्ण कल्पित नहीं, वैसे ही विश्व सत् भी नहीं और असत् भी नहीं। सत् इस कारण नहीं कि चलरूप है स्थिर नहीं और असत् इस कारण नहीं कि विद्यमान लगता है। इससे इसकी भावना त्यागो। यह दृश्य मिथ्या है, इसका अनुभव मिथ्या है और इसका जाननेवाला अहंकारी जीव भी मिथ्या है। जैसे मरुस्थल में जल मिथ्या है, वैसे ही आत्मा में अहंकार और जीव भी मिथ्या है। हे राजन्! जबतक शास्त्रों