योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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के अर्थ में चपलता है और वह स्थित में गहित है, तबतक संसार की निवृत्ति नहीं होती। जब दृश्य के फुरने में अहंकार में यह जड़ सा हो जाय, तब इसको आत्मपद की प्राप्ति हो। जबतक यह जीव दृश्य की ओर फुरता है और चेतन सावधान है, तबतक यह संसार में भ्रमता है।
हे राजन् ! आत्मा न कहीं जाता है, न आता है; न जन्मता है, न मरता है। जब चैत्य और चित्त का सम्बन्ध मिट जाय तब यह आनन्द-रूप ही है। चैत्य दृश्य को कहते हैं और चित्त अहंकारसंवित् का नाम है। जब दोनों का सम्बन्ध आपस में मिट जायगा, तब शेष आत्मा ही रहेगा। वह ब्रह्म आत्मा और शिवपद है, जिसमें वाणी की गति नहीं। यह अनुभव-निर्वाच्य पद है, इसी में स्थित होओ। हे राम ! जिस युक्ति में इसकी इच्छा-अनिच्छा निवृत्त हो, वही युक्ति श्रेष्ठ है। जबतक यह स्फुरण होता है कि, यह भाव है यह अभाव है, तबतक इसको जीव कहते हैं; और जब भाव-अभाव का स्फुरण मिट जाता है, तब जीवसंज्ञा भी जाती रहती है। और वह शिवपद आत्मा को प्राप्त होता है, जहाँ वाणी की गति नहीं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे बृहस्पतिबलिसंवादवर्णनं नाम शताधिकेकविंशतितमस्सर्गः ॥ १२१ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार बृहस्पति ने राजा बलि से कहा था, वह तेरे प्रश्न के उत्तर निमित्त मैंने कहा है। जबतक हृदय में संसार की सत्यता है, तबतक जैसे कर्म करेगा वैसा ही शरीर धरेगा। हे राम ! जिस वस्तु को चित्त देखता है, उसकी ओर अवश्य जाता है, उसका संस्कार उसके हृदय में होता है। और जिस पदार्थ को सत जानता है, उस पदार्थ का संस्कार स्थिर हो जाता है जैसे मोर के अण्डे में शक्ति होती है और जब समय आता है तब नाना प्रकार के रङ्ग उसमें प्रकट होते हैं, वैसे ही चित्त का संस्कार भी समय पाकर जगता है। हे राम ! चित्त अज्ञान में उपजता है। फिर बृहस्पति ने कहा, हे राजन् ! बीज पृथ्वी पर उगता है, आकाश में नहीं। जैसा बीज