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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1177, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1177

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ३६६

पृथ्वी में बोया जाता है, वैसा ही फल होता है। यहाँ अहंरूप अपना होना ही पृथ्वी है। जीव जैसी-जैसी भावना से कर्म करता है, वैसा-वैसा चित्तरूपी शरीर पृथ्वी पर उत्पन्न होता है और फिर उसमें फल होता है। उन कर्मों के अनुसार देह रख वह सुख-दुःख भोगता है। ज्ञानवान् आकाशरूप है। आकाश में बीज कैसे उपजे ? बीज भावना से अज्ञानरूपी पृथ्वी में उगता है। बलि ने पूछा, हे देवगुरु ! आपने कहा कि जीव जीता हो अथवा मृतक, इसे अपनी भावना ही से अनुभव होता है, तो जब यह मृतक हुआ और इसकी पिण्डादिक में भावना न हुई तब फिर इसका शरीर कैसे होता है ?

बृहस्पति बोले, हे राजन् ! पिण्डदान आदिक क्रिया न हों, पर इसके हृदय में भावना हो और उसी समय किसी ने पिण्डदान किया तो भी वह जो हृदय में भावना है वही कर्मरूप है और उसी से देह भासित होती है। और जो इसके हृदय में भावना नहीं और किसी बान्धव ने इसके निमित्त पिण्डदान किया तो भी इसको देह भासित होती है, क्योंकि वह भी इसकी वासना में स्पन्दन है। हे राजन् ! जो अज्ञानी जीव हैं और जिनको अनात्म में आत्मबुद्धि है, उनके कर्म कहाँ गये ? वे जो कर्म करते हैं; वे ही उनके चित्तरूपी भूमि में उगते हैं। उनके शरीरों की क्या संख्या है ? वे वासनारूपी अनेक शरीर ज्ञान बिना स्वप्नवत् रचते हैं। बलि बोले, हे देवगुरु ! यह निश्चय करके मैंने जाना है कि जिसको निष्किंचन की भावना होती है, वह निष्किंचन पद को प्राप्त है और संसार की ओर से शिला की नाईं हो जाता है। जिसकी जैसी भावना होती है, वैसा ही स्वरूप हो जाता है। जब संसार से पत्थर सा संवेदनरहित हो, तब मुक्त हो। बृहस्पति बोले, हे राजन् ! निष्किंचन को जब जानता है, तब जीव संसार की ओर से जड़ हो जाता है। संसार के न फुरने ही का नाम जड़त्व है। ऐसा जीव केवल सारपद में स्थित होता है। जिसे गुण डिगा न सकें, उसे जानिये कि निष्किंचन पद को प्राप्त हुआ है। वही निःसंदेह मुक्त है। हे राजन् ! जब तक संसार की सत्यता चित्त में है तब तक वासना है