योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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और जब तक वासना है, तब तक संसार है। संसार के अभाव बिना शान्ति नहीं होती। स्वरूप के प्रमाद से चित्त हुआ है, चित्त में वासना हुई है और वासना से संसार हुआ है। इससे वासना का त्याग करो। जब कोई वासना न उठे, तब निष्किञ्चनभाव हो और शान्ति मिले। हे राजन् । जिस युक्ति और क्रम से यह निष्किञ्चनरूप हो, वही करना चाहिए। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार से सुरपुर में असुर-नायक को सुरगुरु ने जो पिण्डदानादि क्रिया बनाई, वह मैंने तुमको सुनाई।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे बृहस्पतिबलिसंवादो नाम शताधिकद्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ १२२ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! चाहे जीता हो, चाहे मृतक, जो कुछ इसके चित्त के साथ रह जायगा, उसका अनुभव यह अवश्य करेगा। जैसे बाँस के अगड़े में रस होता है तो वह समय पाकर विस्तार पाता है, वैसे ही इसके भीतर जो वासना का बीज है, वह चाहे प्रकट नहीं भासित होता तो भी समय पाकर विस्तृत होता है। जब तक चित्त है, तब तक संसार है और जब चित्त नष्ट होता है, तब सब भ्रम मिट जाता है। हे राम ! चित्त असत् है तो विश्व भी असत् है। जैसे आकाश में नीलापन भ्रम से दीखता है, वैसे ही आत्मा में विश्व का भ्रम है। हे राम ! हमको न चित्त भासित होता है, न विश्व भासित होता है। मैं भी आकाश हूँ और तुम भी आकाशरूप हो। यह चित्त स्वरूप के प्रमाद से उपजता है। जैसे जहाँ काजल होता है, वहाँ श्यामता भी होती है। वैसे ही जहाँ चित्त होता है, वहाँ वासना भी होती है। जब ज्ञानरूपा अग्नि से वासना दग्ध हो तब चित्त सत्यपद को प्राप्त होता है और जीवितसंज्ञा निवृत्त होती है। हे राम ! चित्त के उपशम का उपाय मुझसे सुनो। उससे चित्त का निर्वाण हो जायगा। ज्ञान की जो सात भूमिकाएँ हैं, उनसे चित्त नष्ट हो जायगा। उनमें से तीन भूमिकाएँ तो मैंने तुमसे क्रम से कही हैं, और चार कहने को बाकी हैं। हे राम ! प्रथम तीन भूमिकाओं में से एक भी जिसको प्राप्त होती है, उसको