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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1179, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1179

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३७१

महापुरुष जानो । उसके मान और मोह निवृत्त हो जाते हैं, उसे संग दोष नहीं लगता । विचार-स्थिति से उसकी कामना नष्ट हो जाती है, राग-द्वेष नहीं रहता और वह सुख-दुःख में सम रहता है । ऐसा अमूढ़ पुरुष अव्ययपद को प्राप्त होता है । तीसरी भूमिका में इतने गुण प्राप्त होते हैं और चित्त नष्ट हो जाता है । तब संसार नहीं देख पड़ता, जैसे दीपक लेकर देखिये तो अन्धकार नहीं मिलता ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्ताभावप्रतिपादनं नाम शताधिकत्रयोविंशतितमसर्गः ॥ १२३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब तृतीय भूमिका पूर्ण दृढ़ होकर दृढ़ अभ्यास से चौथी भूमिका उदय होती है, तब अज्ञान नष्ट हो जाता है और चित्त में सम्यक् ज्ञान उदय होता है । तब वह पूर्णमासी के चन्द्रमा की तरह शोभा पाता है । उस योगी का चित्त आदि-अन्त से रहित, निर्विभाग, चैतन्य तत्त्व में स्थित होता है और वह सबको सम देखता है । जिस योगी को चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है, उसके नाना प्रकार के भेदभाव निवृत्त हो जाते हैं और अभेद सर्व-आत्मभाव उदय होता है । उसको जगत् स्वप्न सा भासित होता है और इन्द्रियों का व्यवहार स्वप्नवत् हो जाता है । जैसे जिसको सुषुप्ति होती है, उसे उस काल में खाना-पीना रस से रहित हो जाता है, वैसे ही चतुर्थ भूमिकावाले का व्यवहार रस से रहित होता है । जैसे सूर्य अपने प्रकाश से प्रकाशित होता है, वैसे ही उसको आत्मा का प्रकाश उदय होता है और उसकी सब कल्पना नष्ट हो जाती है; न किसी पदार्थ में राग रहता है, न किसी में द्वेष । राग और द्वेष संसार समुद्र में डुबानेवाले हैं । इष्ट पदार्थ में न राग होता है और न अनिष्ट में द्वेष । इससे वह संसार समुद्र में गोते नहीं खाता, उसके चित्त को कोई मोहित नहीं कर सकता । हे राम ! जब तक तृतीय भूमिका होती है, तब तक उसकी जाग्रत अवस्था होती है । जब चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है, तब जगत् स्वप्न हो जाता है । तब वह सारे जगत् को क्षणभंगुर और नाशवान् देखता है और द्रष्टा, दर्शन, दृश्य की भावना का अभाव हो जाता है ।