योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३७१
महापुरुष जानो । उसके मान और मोह निवृत्त हो जाते हैं, उसे संग दोष नहीं लगता । विचार-स्थिति से उसकी कामना नष्ट हो जाती है, राग-द्वेष नहीं रहता और वह सुख-दुःख में सम रहता है । ऐसा अमूढ़ पुरुष अव्ययपद को प्राप्त होता है । तीसरी भूमिका में इतने गुण प्राप्त होते हैं और चित्त नष्ट हो जाता है । तब संसार नहीं देख पड़ता, जैसे दीपक लेकर देखिये तो अन्धकार नहीं मिलता ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्ताभावप्रतिपादनं नाम शताधिकत्रयोविंशतितमसर्गः ॥ १२३ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब तृतीय भूमिका पूर्ण दृढ़ होकर दृढ़ अभ्यास से चौथी भूमिका उदय होती है, तब अज्ञान नष्ट हो जाता है और चित्त में सम्यक् ज्ञान उदय होता है । तब वह पूर्णमासी के चन्द्रमा की तरह शोभा पाता है । उस योगी का चित्त आदि-अन्त से रहित, निर्विभाग, चैतन्य तत्त्व में स्थित होता है और वह सबको सम देखता है । जिस योगी को चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है, उसके नाना प्रकार के भेदभाव निवृत्त हो जाते हैं और अभेद सर्व-आत्मभाव उदय होता है । उसको जगत् स्वप्न सा भासित होता है और इन्द्रियों का व्यवहार स्वप्नवत् हो जाता है । जैसे जिसको सुषुप्ति होती है, उसे उस काल में खाना-पीना रस से रहित हो जाता है, वैसे ही चतुर्थ भूमिकावाले का व्यवहार रस से रहित होता है । जैसे सूर्य अपने प्रकाश से प्रकाशित होता है, वैसे ही उसको आत्मा का प्रकाश उदय होता है और उसकी सब कल्पना नष्ट हो जाती है; न किसी पदार्थ में राग रहता है, न किसी में द्वेष । राग और द्वेष संसार समुद्र में डुबानेवाले हैं । इष्ट पदार्थ में न राग होता है और न अनिष्ट में द्वेष । इससे वह संसार समुद्र में गोते नहीं खाता, उसके चित्त को कोई मोहित नहीं कर सकता । हे राम ! जब तक तृतीय भूमिका होती है, तब तक उसकी जाग्रत अवस्था होती है । जब चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है, तब जगत् स्वप्न हो जाता है । तब वह सारे जगत् को क्षणभंगुर और नाशवान् देखता है और द्रष्टा, दर्शन, दृश्य की भावना का अभाव हो जाता है ।
३०२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
राम ने पूछा, हे भगवन् ! जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति का लक्षण कहिये। तुरीयावस्था और तुरीयातीत पद मुझमे कहिये। गुरु शिष्य को उपदेश करने नहीं ऊबते। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तत्त्व का विस्मरण, पदार्थों की भावना और नाशवान् पदार्थों को सत की तरह जानना ही जाग्रत है। पदार्थों में भाव-अभाव की सत्यता और जगत् को मिथ्या भावनामात्र जानना स्वप्न कहाता है और जाग्रत और स्वप्न जिसमें लय हो जावें, वह सुषुप्ति है। जब ज्ञान में भेद की शान्ति हो जाय और जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति तीनों का अभाव हो, ऐसी निर्मल स्थिति तुरीयावस्था है। हे राम ! अज्ञानी जीव संसार को वर्षाकाल के मेघ की तरह देखते हैं; क्योंकि संसार उनको दृढ़ होकर भासित होता है। पर जिसको चतुर्थ भूमिका प्राप्त हुई है, वह संसार को शरत्काल के मेघ की तरह क्षणभंगुर देखता है। जिसको पञ्चम भूमिका प्राप्त हुई है, वह शरत्काल के मेघ नष्ट हुए की तरह देखता है। जैसे शरत् में निर्मल आकाश होता है, वैसे ही उसको निर्मल दीखता है। इन तीनों का वृत्तान्त सुनो। अज्ञानी जगत् को जाग्रत की तरह देखता है और उसको जगत् की दृढ़ सत्यता भासित होती है, इससे उसे रागद्वेष उपजता है। चतुर्थ भूमिकावाला जगत् को ऐसे देखता है, जैसे शरत्काल का मेघ वर्षा से रहित होता है। जैसे स्वप्न की सृष्टि होती है, वैसे ही उसको जगत् की सत्यता नहीं भासित होती; क्योंकि उसकी स्मृति स्वप्न की होती है। वह जगत् को स्वप्नवत् देखता है, इससे उसको राग, द्वेष नहीं उपजता।
पञ्चम भूमिका पर पहुँचनेवाला जगत् को सुषुप्ति की तरह देखता है। जैसे शरत्काल का मेघ नष्ट होकर फिर नहीं देख पड़ता, वैसे ही उसको संसार का भान नहीं होता, और उसकी चेष्टा स्वाभाविक होती है जैसे कमल स्वाभाविक ही खुलता और मुँद जाता है, वैसे ही वह कुछ यत्न नहीं करता—चेष्टा में जैसा प्रतियोगी स्वाभाविक प्राप्त होता है, वही करता है। जैसे कमल के खुलने का प्रतियोगी सूर्य जब उदय हुआ, तब कमल खुल गया, और जब मुँदने की प्रतियोगी
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३७३
रात्रि हुई, तब मुँद जाता है—उसको कोई खेद नहीं, वैसे ही उस पुरुष की अहंममता से रहित स्वाभाविक चेष्टा होती है। हे राम! अहंता-ममतारूप जाग्रत् से वह पुरुष सुषुप्त हो जाता है, और सम्पूर्ण भावरूप जो शब्द और अर्थ है, उनका उसको अभाव हो जाता है। उसका अशेष-शेष का मनन नष्ट हो जाता है। उसको पशु, पक्षी, मनुष्य, देवता, भला, बुरा इत्यादि भिन्न-भिन्न पदार्थों की भावना नहीं रहती। उसकी द्वैतकलना नष्ट हो जाती है। उसे एक ब्रह्मसत्ता ही भासित होती है—संसार नहीं भासित होता।
हे राम! अहंतारूपी तिल से संसाररूपी तेल उपजता है और अहंतारूपी फूल से संसाररूपी गन्ध उपजती है। संसार का कारण अहंता ही है। जिस पुरुष की अहंता नष्ट हो जाती है, वह इन्द्रियों के इष्ट को पाकर हर्षित नहीं होता और अनिष्ट के प्राप्त होने पर द्वेष नहीं करता। वह ऐसे अपने को नहीं जानता कि मैं खड़ा हूँ बैठा हूँ अथवा चलता हूँ; वह अपने को सर्वदा आकाशरूप जानता है। वह न भीतर देखता है, न बाहर देखता है; न आकाश को देखता है और न पृथ्वी को देखता है, सर्वत्र ब्रह्म ही देखता है। उसको भिन्न कुछ नहीं दीखता। वह द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, तीनों का साक्षी रहता है। वह अहंकार का भी साक्षी, इन्द्रियों का भी साक्षी और विश्व का भी साक्षी है। इनके साथ उसका स्पर्श कभी नहीं होता। जैसे ब्राह्मण चाण्डाल को स्पर्श नहीं करता। जैसे बीज से अंकुर होता है और फिर अंकुर से डालें होती हैं, इसी प्रकार सब पदार्थों का परिणाम है। पर उनमें आकाश ज्यों का त्यों रहता है; क्योंकि उनके साथ उसका स्पर्श नहीं होता। वैसे ही वह पुरुष द्रष्टा, दर्शन, दृश्य से अतीत रहता है। जैसे मरुस्थल में जल असत् है, वैसे ही उस पुरुष की दृष्टि में त्रिपुटी असत्य है। उस पुरुष की त्रिपुटी और अहंता नष्ट हो जाती है, इससे भेदबुद्धि भी नहीं रहती। इसी से वह शान्त, निर्मल संसार से सुषुप्त, चैतन्य-घनता से पूर्ण और सर्वदा शान्तरूप रहता है। जिन नेत्रों से लोग संसार देखते हैं, उनसे वह अन्धा हुआ है—अर्थ यह कि जिस मन में फुरना होता
३७४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
है, उसका उसने नाश किया है । और यदि भय, क्रोध, अहंकार, मोह इत्यादि विकार उस पुरुष में दीखते भी हैं, तो उसके हृदय को वे स्पर्श नहीं करते । जैसे पक्षी आकाश में उड़ता है, परन्तु आकाश को स्पर्श नहीं कर सकता, वैसे ही उस पुरुष को कोई विकार स्पर्श नहीं करता । हे राम ! उस पुरुष के सब संशय नष्ट हो गये हैं और वह सर्वदा स्वरूप में स्थित और शान्तरूप है, आत्मा से भिन्न वह किसी सुख की वाञ्छा नहीं करता और उसके सब संकल्प मिट चुके हैं । उसे आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होता । वह जाग्रत की तरह देख पड़ता है, पर सर्वदा जाग्रत से सुपुप्त है ।
इति० नि० पञ्चमभूमिकावर्णनंनामचतुर्विंशताधिकतमस्सर्गः ॥ १२४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तीसरी भूमिका पर्यन्त वह जाग्रत है और चतुर्थ भूमिका में जाग्रत् अवस्था को स्वप्नवत् देखता है । पञ्चम भूमिका-वाला संसार में सुपुप्त होता है और छठी भूमिकावाला तुरीयपद में स्थित होता है और सर्वदा अक्रिय है, अर्थात् किसी क्रिया में नहीं बंधता । वह सर्वदा आनन्दरूप है । भिन्न होकर आनन्द को नहीं भोगता, आप ही आनन्दरूप है । केवल अपने आप स्वतः अपने में ही स्थित है और सर्वदा निर्वाणरूप है । हे राम ! सब कर्म वह यथाशास्त्र करता देख पड़ता है, परन्तु हृदय में शून्य है—उसका किसी में लगाव नहीं । जैसे आकाश में सब पदार्थ हैं, पर आकाश का स्पर्श किसी में नहीं, वैसे ही सब क्रिया उसमें विद्यमान देख पड़ती हैं, तो भी वह हृदय में किसी का स्पर्श नहीं करता; क्योंकि उसको कर्मबन्धन में डालनेवाला अहंकार नष्ट हो गया है—वह केवल शान्तरूप है । चिन्मात्र में अहंभाव का उत्थान ही अज्ञान है, और वही दुःखदायी है । जब अहंभाव निवृत्त होता है, तब कोई कर्म स्पर्श नहीं करता । यद्यपि उसको विश्व देख पड़ता है, तो भी वास्तव में वह नहीं देखता; क्योंकि उसको सर्वत्र ब्रह्म ही भासित होता है । वह खाता है, पर नहीं खाता; देता भी है, पर कभी नहीं देता । लेता है तो भी कभी किसी से कुछ नहीं लेता । चलता है, परन्तु कभी नहीं चला ।
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३७५
हे राम ! जो देश-काल वस्तु पदार्थ है, उन सबमें वह आत्मभाव रखता है। यद्यपि उसमें प्रत्यक्ष चेष्टा दीखती है, तो भी उसमें हृदय में कुछ नहीं। जैसे सपने में खाता, पीता, लेता, देता अपने को देखता है और जागे पर सबका अभाव हो जाता है, वैसे ही जो पुरुष परमार्थ-सत्ता में जागा है, उसको गुण व क्रिया अपने में नहीं भासित होती । वह जो करता है, उसमें अभिलाषा नहीं रखता । उसकी सब चेष्टा स्वाभाविक होती है । अपने निमित्त उसे कुछ कर्तव्य नहीं । ऐसे भगवान् ने भी कहा है कि वह सर्वत्र आत्मा को ही देखता है। आकाश, पृथ्वी, सूर्य, ब्राह्मण, हाथी, श्वान, चाण्डाल आदिक सबमें वह आत्मभाव देखता है, सब आकारों को मृगतृष्णा के जलवत् देखता है कि इनका अत्यन्त अभाव है। द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, भी उसको आकाशवत् भासित होते हैं और वह निर्मल आकाशवत् शान्तरूप है । अहं-भाव से रहित वह केवल चिन्मात्र में स्थित है । वह ग्रहण व त्याग से अतीत सर्वकल्पना से रहित, निर्वाण, स्वच्छ, निर्मल आकाशरूप स्थित है । अहं-मम आदिक चिद्ग्रन्थि उसकी कट गई हैं । अनात्म में अहं अभिमान उसका नष्ट हो जाता है, वह केवल शान्तरूप हो रहता है ।
जैसे क्षीरसमुद्र से मन्दराचल पर्वत निकलकर शान्तरूप हुआ, वैसे ही वह रागद्वेषरूपी क्षोभ करनेवाले अन्तःकरणरूपी समुद्र से निकल गया, तब शान्तरूप अक्षोभ्य होकर परम शोभा से शोभित होता है । जैसे विश्वकर्मा ने सूर्य का मण्डल रचा है और वह प्रकाश से शोभा पाता है, वैसे ही ज्ञानरूपी प्रकाश से वह प्रकाश पाता है । जैसे चक्र फिरता-फिरता रह जाता है और शान्त होता है, वैसे ही वह अज्ञान में फिरता-फिरता ठहरकर सदा शान्ति को प्राप्त होकर अपने आप से प्रकाशित होता है । जैसे पवन से रहित दीपक प्रकाशित होता है, वैसे ही कलनारूपी पवन से रहित पुरुष अपने आपमें प्रकाशमान होता है और सर्वदा निर्मल और एकरस रहता है । जैसे घट के भीतर और बाहर शून्य है, वैसे ही देह के भीतर-बाहर आत्मा है । जैसे जल में घट रखिये तो उसके भीतर-बाहर जल होता है, वैसे ही वह पुरुष अपने रूप में
३७६ ❋ योगवाशिष्ठ ❋
भीतर-बाहर पूर्ण हो रहा है और एकरस है। वह द्वैतकल्पना को नहीं प्राप्त होता और उस पद को पाकर आनन्दित होता है। जैसे कोई मारे जाने के निमित्त पकड़ा गया हो और उसकी रक्षा हो तो वह बड़े आनन्द को प्राप्त होता है; वैसे ही वह पुरुष आनन्द को प्राप्त होता है। जैसे कोई आधि-व्याधि से छूटा आनन्द को प्राप्त होता है, वैसे ही वह ज्ञानवान् आनन्द को प्राप्त होता है। जैसे कोई मंजिल चलने मे थका हुआ शय्या पर विश्राम करे और आनन्द को प्राप्त हो, वैसे ही ज्ञानवान् को आनन्द मिलता है। जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा अमृत से आनन्दमय होता है, वैसे वह पुरुष अपने आनन्द से परिपूर्ण रहता है। जैसे काष्ठ के बिना अग्नि धुएँ से रहित प्रज्वलित होती है, वैसे ही ज्ञानवान् अज्ञानरूपी धुएँ से रहित शोभा पाता है। हे राम! जब वह संसार की ओर देखता है तो उसे अग्नि से जलता हुआ अपने से भिन्न देखता है। वह ज्ञानरूपी पर्वत के ऊपर स्थित होकर संसार को जलता देखता है।
हे राम! यह जो कहा है कि संसार को जलता देखता है, सो ऐसे भी नहीं फुरता कि मैं ज्ञानी हूँ और यह संसार है। स्वरूप की अपेक्षा से यह कहा है कि संसार उसको दुःखदायी लगता है। वह आनन्द से भी परे परमानन्द को प्राप्त हुआ है और सत्-असत् से रहित जो अपना आपा है उसमें स्थित है। जैसे पर्वत भीतर-बाहर अपने आपमें स्थित और एकरस है, वैसे ही वह पुरुष एकरस है। वह संसार में जाग्रत होकर चेष्टा करता है, पर हृदय में संसार की भावना से रहित है। उस पद में वाणी की गति नहीं। फिर भी कुछ कहता हूँ, सुनो। कोई उसे ब्रह्म कहते हैं; कोई चैतन्य कहते हैं; कोई आत्मा कहते हैं; कोई साक्षी कहते हैं। कालवाले उसी को काल कहते हैं, ईश्वरवादी ईश्वर कहते हैं; सांख्यवाले प्रकृति इत्यादिक संज्ञाओं से निर्देश करते हैं। सब उसी के नाम हैं—उसमें भिन्न नहीं। उस पद को सन्तजन जानते हैं। हे राम! ऐसे पद को पाकर वह अपने आपमे शोभित होता है। जैसे मणि के भीतर-बाहर प्रकाश होता है, वैसे ही वह पुरुष भीतर-बाहर
- निर्वाण प्रकरण * ३७७
सोहता है और अपने स्वरूप में सदा सन्तुष्ट रहता है। जो पुरुष छठी भूमिका में स्थित है, उसके ये लक्षण होते हैं—वह संसार में सुपुप्त होकर स्वरूप में सावधान रहता है और उसका जीवभाव जाता रहता है। जैसे घट की उपाधि से घटाकाश परिच्छिन्न भासित होता है और जब घट भग्न हुआ तब घटाकाश महाकाश एक हो जाता है, वैसे ही अहङ्काररूपी घट के भग्न होने पर आत्मा ही भासित होता है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे षष्ठभूमिकोपदेशो नाम शताधिकपञ्चविंशतितमस्सर्गः ॥ १२५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसके अनन्तर जब उस पुरुष को सप्तम भूमिका प्राप्त होती है, तब वह अपने को आत्मा ही जानता है। उसे पंचभूतों का ज्ञान नहीं रहता। तब केवल आत्मत्वमात्र होता है और दृश्य का ज्ञान नहीं रहता; बल्कि यह भी ज्ञान नहीं रहता कि विश्व मेरे आश्रय में फुरता है। देहसहित हो, अथवा विदेह हो, उसकी आत्मा में उत्थान कभी नहीं होता। जैसे आकाश अपनी शून्यता में स्थित है, वैसे ही वह आत्मस्वरूप में स्थित होता है और उसकी चेष्टा भी स्वाभाविक होती है। जैसे बालक पालने में अपने अङ्ग स्वाभाविक हिलाता है, वैसे ही उसकी खान, पान आदिक चेष्टाएँ स्वाभाविक ही होती हैं। जैसे काष्ठ की पुतली तागे के हिलने में चेष्टा करती है, वैसे ही प्रारब्ध-वेग के तागे से उसकी चेष्टाएँ होती हैं—उसको अपनी कुछ इच्छा नहीं रहती। हे राम ! सप्तम भूमिकावाला जैसी अवस्था को प्राप्त होता है; उसे वही जानता है, और कोई नहीं जान सकता। जिसका चित्त सत्पद को प्राप्त हुआ है, वह भी उस अवस्था को नहीं जान सकता। जिसको वह पद प्राप्त हुआ है, वही उसे जानता है। हे राम ! जीवन्मुक्त का चित्त सत्पद को प्राप्त होता है और वह तुरीय-पद में स्थित होता है। उसका चित्त निर्वाण को प्राप्त हो जाता है और तुरीयातीत पद को प्राप्त होकर विदेहमुक्त होता है। उसमें अहंभाव का उत्थान कदापि नहीं होता। वह मनरूप है, पर असत् की नाईं स्थित है। हे राम ! वह पुरुष उस पद को प्राप्त होता है, जिसमें वाणी की
३७८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
गति नहीं; परन्तु फिर भी कुछ कहता हूँ। वह शुद्ध, निर्मल, अद्वैत, चैतन्य ब्रह्म, काल का भी काल, केवल चिन्मात्र और त्यों का त्यों अच्युत पद है। उस पद को पाकर जीव ऐसा हो जाता है, जैसे वस्त्र के ऊपर मूर्ति लिखी हो, वैसे ही यह उत्थान से रहित होता है और उसको अहंब्रह्म का उत्थान भी नहीं रहता। इति० नि० सप्तभूमिकालक्षण विचारः षड्विंशाधिकशततमस्सर्गः॥ १२६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! ये सप्तभूमिकाएँ जो तुमसे कहीं हैं इन्हीं से ज्ञान की प्राप्ति होती है, अन्य साधनों से ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। हे राम! जब गुरु ज्ञानवान् हो, तब जानिये कि उसकी वृत्ति प्रथम भूमिका में स्थित हुई है। इससे तुम भूमिका की ओर चित्तरूप चरण रखोगे, तब तुमको स्वरूप की प्राप्ति होगी। हे राम! तीसरी भूमिका तक सब कामनाएँ निवृत्त होती हैं, केवल एक आत्मपद की कामना रहती है। यदि उस अवस्था में शरीर छूट जाय तो मनुष्य और जन्म पाकर ज्ञान का पात्र होता है। और यदि चतुर्थ भूमिका में प्राप्त होकर शरीर छूटे तो फिर जन्म नहीं होता; क्योंकि आत्मपद की प्राप्ति होने पर फिर कुछ पाने की इच्छा नहीं रहती। जन्म का कारण इच्छा है; जब कुछ इच्छा नहीं रही, तब जन्म भी नहीं रहा। जिसको चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है, उसको स्वरूप की प्राप्ति होती है, तब फिर इच्छा कैसे हो? जैसे भुना बीज नहीं उगता, वैसे ही उसका चित्त ज्ञान-अग्नि में दग्ध हो जाता है; क्योंकि वह सत्यपद को प्राप्त होता है। इससे वह जन्म नहीं लेता और मरता भी नहीं—संसार को स्वप्नवत् देखता है। पञ्चम भूमिकावाला सुषुप्त की तरह होता है। छठी भूमिका साक्षारूप तुरीयापद है। सप्तम तुरीयातीत निर्वाच्यपद है। हे राम! इतना कहने का प्रयोजन यही है कि वासना का त्याग करो और अचितपद को प्राप्त हो! इसका अभिमान होना ही वासना है। जब इसका अभिमान निवृत्त हो, तब शान्ति होगी, परिच्छिन्न अहंकार न रहेगा। आत्मा के अज्ञान से अहंभाव हुआ है और आत्मज्ञान से यह लीन हो जाता है।
❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३७६
हे राम ! संसार एक नदी है। उसमें आधि-व्याधि उपाधि रोग तरङ्ग हैं; राग-द्वेषरूपी छोटे मच्छ हैं और तृष्णारूपी बड़े मच्छ हैं। उसमें जीव दुःख पाते हैं। जैसे जल नीचे को चला जाता है, वैसे ही मृत्यु के मुख में संसार चला जाता है। उसमें अज्ञान ही जल भरा है। हे राम ! तृष्णा से पुरुष बँधे हैं। इससे तुम हाथी की तरह वैराग्य और अभ्यासरूपी दाँतों से तृष्णारूपी जंजीर को काटो। हे राम ! तृष्णारूपी सर्पिणी विषयरूपी फूत्कार से विचाररूपी बेल को जलाती है, इससे जीवरूपी किसान दुःख पाता है। इससे तुम वैराग्यरूपी अग्नि से उस सर्पिणी को जलाओ। हे राम ! तृष्णा दुःखदायी है। जब तक तृष्णा है, तब तक सन्तों के वचन हृदय में स्थान नहीं पाते। जैसे दर्पण पर मोती नहीं ठहरता। वैसे ही तृष्णावान के हृदय में सन्तों के वचन नहीं ठहरते। तृष्णा के इतने नाम हैं—तृष्णा, अभिलाषा, इच्छा, फुरना, संस्मृति। ये सब इसी के नाम हैं। इच्छारूपी मेघ ने ज्ञानरूपी सूर्य को ढका है, इससे वह नहीं चमकता। जब विचाररूपी पवन चले, तब इच्छारूपी मेघ नष्ट हो जावे और आत्मरूपी सूर्य का साक्षात्कार हो।
हे राम ! यह जीव आकाश का पक्षी है, पर कर्म में इच्छारूपी तागे से बँधा है, इससे नहीं उड़ सकता और परमात्मपद को भी प्राप्त नहीं होता। यह इच्छा ही से दीन है। जब इच्छा नष्ट हो, तब आत्मस्वरूप प्राप्त हो। इसमें तुम इच्छा का नाश कर आत्मपरायण हो, अर्थात् विषय संसार से वैराग्य और आत्माभ्यास करो। हे राम ! यह जो मैंने तुमसे भूमिका का क्रम कहा है, इसमें जब आवे तब ज्ञान की प्राप्ति हो। पर इनको तब प्राप्त होता है, जब कि एक हथिनी को जीते, जो एक वन में रहती है। महातमरूप उसके दो पुत्र हैं। जो अनेक जीवों को मारकर अनर्थ करते हैं। उसके जीतने से सब जगत् जीता जाता है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! ऐसी मतरूपी हथिनी कौन है और कहाँ रहती है? उसके दाँत और पुत्र कौन हैं? कैसे वह मरती है, कैसे उत्पन्न हुई है और कौन वन है? यह सब मुझसे कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इच्छारूपी हथिनी और शरीररूपी वन है। वह मन-
३८० ✴ योगवाशिष्ठ ✴
रूपी गुफा में रहती है । इन्द्रियाँ उसके बच्चे और संकल्प-विकल्प दाँत हैं, उनमें वह छेदती है । हे राम ! एक नदी है, जिसका प्रवाह सदा चला जाता है । उसमें दो मच्छ रहते हैं, जो कभी नष्ट नहीं होते । संसृति ही नदी है, जिसमें राग-द्वेष मच्छ रहते हैं, वे नष्ट नहीं होते ।
हे राम ! वे मच्छ तब नष्ट हों, जब संस्मरणरूपी जल नष्ट हो । उसके सुकृत और दुष्कृतरूपी दो किनारे हैं । उसमें चिन्तारूपी ग्राह रहता है । कर्मरूपी लहरें हैं, उनमें जीवरूपी तृण आकर भटकता है । इस तृष्णा-रूपी विषवेलि का नाश करो । हे राम ! तृष्णारूपी अंकुर को बढ़ाना-घटाना अपने ही अधीन है । जो अंकुर को जल दीजिये तो बढ़ता जाता है और जो न दीजिये तो जल जाता है । स्फुरणरूपी जल देने में तृष्णारूपी अंकुर बढ़ता जाता है, और न देने से स्वरूप के अभ्यास द्वारा जल जाता है । हे राम ! तृष्णारूपी बड़ा मच्छ है, जो धैर्य आदि के मांस को भक्षण करनेवाला है । उसे वैराग्यरूपी कगडी और अभ्यासरूपी दाँतों से नष्ट करो । हे राम ! इच्छा का नाम बन्धन है और निरिच्छा का नाम मुक्ति । हे राम ! एक सुगम उपाय कहता हूँ, जिसमें तृष्णा नष्ट हो जायगी । निज अर्थ की भावना करो । तो उस भावना से शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होगी, तुम्हारी जय होगी और तुम सबसे उत्तम पद को प्राप्त होगे । फिर तुम्हें वासना न रहेगी, शरीर की चेष्टा स्वाभाविक होगी और सब संकल्प नष्ट हो जावेंगे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे संस्मरणभावप्रतिपादनं नाम शताधिकसप्तविंशतितमसर्गः ॥ २२७ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! आप कहते हैं कि निज अर्थ की भावना में वासना नष्ट हो जावेगी और शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होगी । सो वासना तो चिरकाल से चित्त में स्थित है । वह एकवारगी कैसे नष्ट होगी ? आप कहते हैं कि वासना के नष्ट होने से जीव जीवन्मुक्त होता है । पर जिसकी वासना नष्ट होगी, उसका शरीर कैसे रहेगा ? वासना बिना चेष्टा क्योंकर होगी और जीवन्मुक्त पद कैसे प्राप्त होगा ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मेरे वचनों को, जो कानों के भूषण हैं, सुनने
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
<p align="right">३८१</p>से दरिद्र न रहेगा। निज अर्थ के धारण से संशय नष्ट हो जावेंगे और आत्मपद की प्राप्ति होगी। उस निज अक्षर के तीन अर्थ हैं—एक तो अन्य के अर्थ हैं कि पाञ्चभौतिक शरीर से तुम्हारा स्वरूप विलक्षण है, और दूसरा अर्थ विरुद्ध है, अर्थात् शरीर जड़ और तमरूप है और तुम्हारा स्वरूप आदित्यवर्ण और तम से परे है। हे राम! जब तुमने ऐसी धारणा की कि मैं आत्मा हूँ और यह देहादिक अनात्मा है, तब देह में मिलकर अभिलाषा कैसे रहेगी? मतलब यह कि अभिलाषा न करोगे; क्योंकि जब तक जाना नहीं, तब तक अभिलाषा है। तीसरा अर्थ यह है कि सबका अभाव है, अर्थात् न मैं हूँ और न कोई जगत् है। जब ऐसे जाना तब किसकी इच्छा रहेगी? अर्थात् किसी की न रहेगी। अथवा जो तुम अपने को देह से विलक्षण आत्मा जानोगे, तो भी अविद्याकृत तमरूप शरीर की अभिलाषा न रहेगी।
देह तमरूप है और तुम आदित्यवर्ण अर्थात् प्रकाशरूप हो। तुम्हारा और इसका क्या संयोग। जैसे सूर्य के मण्डल में रात्रि नहीं दिखती, वैसे ही जब तुम अपने को प्रकाशरूप जानोगे, तब तमरूप संसार न दिखेगा। तब शरीर की चेष्टा स्वाभाविक होगी और तुममें कुछ चेष्टा न होगी। जैसी अर्धनिद्रावाले की चेष्टा होती है, वैसी ही चेष्टा होगी और तुमको बालक की तरह अभिमान न होगा। जैसे बालक की उन्मत्त चेष्टा होती है, वैसे ही तुम्हारी चेष्टा भी स्वाभाविक होगी। हे राम! यदि तुम यह इच्छा करोगे कि यह सुख हो और यह दुःख न हो तो कदापि वह न होवेगा। जो कुछ शरीर का प्रारब्ध है, सो अवश्य होता है परन्तु ज्ञानवान् के हृदय में संसार की सत्यता जाती रहती है और स्वाभाविक चेष्टा होती है; इच्छा नहीं रहती। हे राम! जैसे कोई पुरुष किसी देश को जाता है और पहुँचने का समय थोड़ा हो तो वह मार्ग के स्थान देखता भी जाता है परन्तु किसी में लिप्त नहीं होता, वैसे ही चित्त को आत्मपद में लगाओ। ऐसा शरीर पाकर यदि आत्मपद न पाया तो कब पावोगे? जो आत्मपद से विमुख है, वह वृक्षादि के जन्मों को पावेगा। इससे हे राम! चित्त
३८२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
आत्मपद में रखो और स्वाभाविक इच्छा बिना चेष्टा करो। इच्छा ही दुःखदायक है। जब इच्छा नष्ट होती है, तब उर्मी को ज्ञानवान् तुरीयपद कहते हैं। जहाँ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति का अभाव हो, वही तुरीयपद है।
हे राम ! ये जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाएँ जहाँ न पाइये, वही तुरीयपद है। जब संवेदन, स्फुरण या अहंकार का अभाव हो जावे, तब तुरीयपद प्राप्त होता है। हे राम ! अहंकार का होना दुःखदायक है। जब इसका नाश हो, तभी आनन्द मिलता है। आत्मपद से भिन्न जो माया की रचना है, उसमें मिलकर जीव अपने को जानता है कि 'मैं हूँ'। यही अनर्थ है। इसमें अहंकार का त्याग करो। जिसको देखकर यह अहंकार स्फुरता है, उसका निज अर्थ की भावना से नाश करो। और जो आत्मपद से भिन्न भासित होता है, उसे मिथ्या जानो। यही निज असत् का अर्थ है। जो कुछ संसार भासित होता है, उसको स्वप्न-मात्र जानो। इसको सत्य जानकर इसकी इच्छा करना ही अनर्थ और मिथ्या जानकर इच्छा न करना कल्याण है। हे राम ! में ऊँची बाह करके पुकारता हूँ, पर मेरे वचन कोई नहीं सुनता कि इच्छा ही संसार का कारण है और इच्छा से रहित होना ही परमकल्याण है। जब जीव इच्छा से रहित होता है, तब शान्तपद को प्राप्त होता है। निश्चलत होने पर आत्मा ही भासित होता है, जो आनन्दरूप, सम और अद्वैत है। उसमें जगत् का अभाव है। हे राम ! मोह की बड़ी महिमा है। हृदय में जो आत्मरूपी चिन्तामणि स्थित है, उसको विस्मरण करके मूर्ख अहंकाररूपी काँच को ग्रहण करते हैं।
हे राम ! तुम निरभिमान होकर चेष्टा करो। जैसे यन्त्र की पुतली में अभिमान नहीं होता और वह चेष्टा करती है, वैसे ही प्रारब्ध वेग से तुम्हारी चेष्टा होगी। यह अभिमान तुम न करो कि ऐसे हो और ऐसे न हो। जब ऐसे होगे, तब शान्तपद को प्राप्त होगे; जहाँ वाणी की गति नहीं ऐसे आनन्द को प्राप्त होगे। जब तक इन्द्रियों के विषयों की तृष्णा है, तब तक जन्म-मृत्यु का बन्धन है। इसमें पुरुषप्रयत्न यही
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३८३
है कि तृष्णा का नाश करो। कर्म के फल की तृष्णा न हो और कर्म के करने की भी इच्छा न हो। इन दोनों को त्यागकर स्वरूप में स्थित हो रहो। बल्कि ऐसा भी निश्चय न हो कि मैंने त्याग किया है। हे राम! जिस पुरुष ने कर्म को त्याग दिया है और अहंकारसहित है, उसने पुण्य और पाप सब कुछ किया है, और जिसमें अहंभाव नहीं है, वह चाहे जैसे कर्म करे तो भी कुछ नहीं करता। वह बन्धन को नहीं प्राप्त होता। जो न करने में अभिमानसहित है, उसको कर्त्ता देखते हैं, वह बन्धन में पड़ा है। हे राम! ऐसे आत्मा को जानकर अहं-मम का त्याग करो। ऐसे संवेदन के त्यागने में कुछ यत्न नहीं करना पड़ता। स्मृति उसकी होती है, जिसका अनुभव होता है। पर जिसका अनुभव नहीं, उसका त्याग करना सुगम है। अनुभव प्रत्यक्ष देखने को कहते हैं। तुम्हारे स्वरूप में विश्व नहीं है तो अनुभव क्या हो। ये पदार्थ जो तुमको भासित होते हैं, उनके कारण को जानो। इनका कारण अनुभव है। जब इनका अनुभव ही मिथ्या है, तब स्मृति कैसे सत् हो? रस्सी में सर्प का अनुभव हुआ और फिर स्मरण किया कि वहाँ सर्प देखा था। तो जब सर्प का अनुभव ही मिथ्या है, तब फिर उसका स्मरण कैसे सत् हो? इससे जो वस्तु मिथ्या है, उसके त्यागने में क्या यत्न है?
जब प्रपञ्च को मिथ्या जाना, तब तुमको कोई कर्म बन्धन का कारण न होगा; चेष्टा स्वाभाविक होगी और रागद्वेष जाता रहेगा। जैसे शरत्काल की वेलि सूख जाती है और उसका आकार देख पड़ता है, वैसे ही तुम्हारा चित्त देखने में आयेगा और चित्त का धर्म जो रागद्वेष है, वह जाता रहेगा—वह चित्त सत्पद को प्राप्त होगा। जब सबका विस्मरण (बाध) होता है, उसको शिवपद कहते हैं। वह परमपद ब्रह्म-शब्द-अर्थ से रहित केवल चिन्मात्र अद्वैत पद है। उसमें अहं-मम का त्याग करके स्थित रहो। संसार इसी का नाम है कि मैं हूँ और यह मेरा है। इसको त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो। हे राम! जब तक अहं-मम का संवेदन है, तब तक दुःख नहीं मिटते। जब यह संवेदन मिटता
३८४ ✺ योगवाशिष्ठ ✺
है, तब आनन्द मिलता है। यह मेरा उपदेश है। अब तुम्हारी जो इच्छा हो सो करो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे इच्छाचिकित्सोपदेशन्नाम शताधिकाष्टविंशतितमस्सर्गः ॥ १२८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! अद्वैत आत्मा—जिसको एक या दो नहीं कह सकते—अपने आप स्वभाव में स्थित है। अन्तःकरण-चतुष्टय बाह्य पदार्थ सब चेतनमात्र हैं, आत्मा से कुछ भिन्न नहीं। रूप, इन्द्रियाँ और मन का फुरना, देश और काल, सब आत्मरूप ही हैं। जैसे बालक मिट्टी की सेना बनाकर हाथी, घोड़े, राजा, प्रजा, आदि नाम रखता है, सो सब मिट्टी है—भिन्न कुछ नहीं; वैसे ही अहं-मम आदिक भी सब आत्मरूप हैं—कुछ पृथक् नहीं। जैसे मिट्टी में हाथी, घोड़ा आदि नाम कल्पित हैं, वैसे आत्मा में ही जगत् कल्पित है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। इस अहंकार को त्याग करो कि आत्मपद से भिन्न कुछ न फुरै। हे राम! रूप, अवलोक और नमस्कार, ये सब शिवरूपी मृत्तिका के नाम हैं। जब मापक, मान, मेय आदि सब वही रूप हुए तब किसमें किसको संचित कहिये? यह अहं-मम आदिक भी चिदाकाश से कुछ भिन्न वस्तु नहीं। इनको ऐसे जानकर संवेदनहीन शिला की तरह निःसंग हो रहो।
राम ने पूछा, हे भगवन्! आपने कहा कि अहं-मम फुरने का त्याग करो, यह मिथ्या है, और अहं-मम असत् है। ज्ञानी ऐसी भावना करते हैं कि इनकी सत्ता कुछ नहीं और तुम असंग हो रहो। यह असंग निष्कर्म से होता है अथवा कर्म से होता है, यह कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह तुम्हीं कहो कि कर्म क्या है और निष्कर्म क्या है; इनका कारण कौन है और इनका नाश कैसे हो और नाश होने से क्या सिद्धि होगी। जो तुम जानते हो तो कहो। राम बोले, हे भगवन्! जैसे आपसे सुना है और समझा है वही में कहता हूँ। वस्तु-नष्ट करनी हो, उसका निश्चय करके मूल से नाश कीजिये, तभी उसका नाश होता है। शाखा और पत्र काटने से उसका नाश नहीं होता। इससे इनका क्रम सुनो। इस संसाररूपी वन में देहरूपी वृक्ष
⚛ निर्वाण प्रकरण ⚛ ३८५
है, जिसका बीज कर्म है । पाणि, पाद आदिक पत्ते हैं । रुधिर, स्वास और वासना रस और सुख-दुःख फल है । जाग्रत् कर्म वासनारूपी वसन्तऋतु है । उसमें वह प्रफुल्लित होता है । और सुषुप्ति पापकर्मरूपी शरत्काल है । उसमें सूख जाता है । ऐसा शरीररूपी वृक्ष है । जवानी-रूपी उसकी कली है, जो क्षण भर सुन्दर रहती है । जरारूपी फल इसको हँसते हैं और रागद्वेषरूपी वानर क्षण-क्षण में हिलाते हैं ।
जाग्रत् वसन्तऋतु है जो सुषुप्तिरूपी हिम उत्पन्न करती है । यह वृक्ष वासनारूपी रस से बढ़ता है । पुत्र, कलत्र आदिक तृण और बांस हैं । इन्द्रियों के छिद्ररूपी मुख हैं, जिनसे शरीर की चेष्टा होती है । ज्ञान इन्द्रियाँ पाँच स्तम्भ हैं, जिनसे यह वृक्ष सधा है । इच्छारूपी बेलि है, जो अपने-अपने को चाहती है । बड़ा स्तम्भ इसका मन है, जो सबको धारण करता है । पञ्चप्राण इसके रस हैं । उनसे यह प्रत्यक्ष सब विषयों को ग्रहण करता है । इसका बीज जीव है । जीव चैतन्योन्मुखत्व चेतन को कहते हैं । जीवत्व का बीज संवित् है, जिसका मात्रपद से उत्थान हुआ है । उस संवित् का बीज ब्रह्म है—जिसका बीज कोई नहीं है । हे भगवन् ! सबका मूल संवित् का फुरना है । जब इसका अभाव होता है, तब आत्मा ही शेष रहता है । हे भगवन् ! यह तो मैं जानता हूँ । आगे आप भी कुछ कृपा करके कहिये । हे भगवन् ! जब तक चित्त से सम्बन्ध है, तब तक संसार में जन्म-मरण होता है, और जब जीव चित्त से रहित होता है तब परब्रह्म हो जाता है—वह शिवपद अनिच्छित, शान्त और अनन्तरूप है । चिन्मात्र में जो अहं का उत्थान है, वही कर्मरूपी वृक्ष का कारण है । जब तक अनात्मा से मिलकर जीव कहता है कि 'मैं हूँ' तब तक वही संसार का कारण है । यह आपके वचनों से मैंने समझा है, सो सुना दिया । आगे कुछ कृपा करके आप भी कहिये ।
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसी प्रकार कर्म का बीज सूक्ष्म संवित् है । जब तक संवित् है, तब तक कर्मों का बीज नष्ट नहीं होता । और ये सब संज्ञाएँ इसी की हैं । कर्मों का बीज इच्छा, तृष्णा, अज्ञान, चित्त और ग्रहणत्याग की बुद्धि इत्यादिक बहुत सी संज्ञाएँ हैं । क्या किसी
३८६ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
में हेयोपादेय बुद्धि करे ? हे राम ! जब तक अज्ञान है, तब तक इच्छा नष्ट नहीं होती और कर्म भी नष्ट नहीं होते। नाश दोनों का नहीं होता, परन्तु भेद इतना ही है कि अज्ञानी को भासित होता है कि यह इच्छा है, यह कर्म है। ज्ञानवान को सब ब्रह्म ही भासित होता है, इससे वह सुखी रहता है और अज्ञानी को कर्म में कर्म भासित होता है, इसलिए वह बन्धन में पड़ता है। कर्म में कर्मबुद्धि जाने को त्याग कहते हैं; क्रिया का त्याग करने को त्याग नहीं कहते। हे राम ! बड़ी उपाधि अहंकार है। जिसका अहंकार नष्ट हुआ है, वह पुरुष कर्म करता है तो भी उसने कर्त्ता कुछ नहीं किया। और जो अहंकारसहित है, वह पुरुष जो चुप हो बैठता है तो भी सब कर्म करता है। इस अहं के त्याग का नाम सर्वत्याग है; क्रिया के त्याग का नाम सर्वत्याग नहीं। सब कर्मों के बीज अहंकार को त्यागना और परम शान्ति को पाना ही पुरुषप्रयत्न है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे कर्मबीजदाहोपदेशं नाम शताधिकनवविंशत्तमस्सर्गः ॥ १२९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस संवेदन का होना ही अनर्थ है कि जीव अपने को कुछ जानता है। जब यह निवृत्त हो, तभी इसको आनन्द प्राप्त हो। हे राम ! ज्ञानी की चेष्टा अहंकार से रहित स्वाभाविक होती है। जैसे अर्धनिद्रित पुरुष होता है वैसे ही ज्ञानी अपने स्वरूप में मग्न रहता है। जैसे हाथी मद में उन्मत्त होता है, वैसे ही ज्ञानवान् स्वयंब्रह्म चिदानन्द में मग्न रहता है। जैसे कामी को काम का व्यसन होता है, वैसे ही सुन्दरूपी स्त्री को पाकर ज्ञानी मग्न रहता है क्योंकि वह निरहंकार है। सब दुःखों का बीज अहंकार है। जब अहंकार नष्ट हो तब आनन्द हो। हे राम ! संसाररूपी विष की बेलि का बीज अहंकार है। जब अहंकार का अभाव हो, तब संसार का भी अभाव होता है। हे राम ! अहंकार ही दुःख का मूल है। इस संवेदन का विस्मरण बड़ा कल्याणकारक है। अनात्मा में मिलकर अपने को मानना या अहंभाव ही अनर्थ है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो वस्तु असत
✴ निर्वाण प्रकरण ✴ ३८७
है, वह नहीं होती और जो सत्य है उसका अभाव नहीं होता । फिर आप कैसे कहते हैं कि अहं संवेदन का नाश करो ? ये तो सत् भासित होते हैं, इनका नाश कैसे हो ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम सच कहते हो कि जो वस्तु असत्य है, वह नहीं होती और जो सत्य है, उसका नाश नहीं होता । हे राम ! यह जो अहंकार दृश्य तुमको भासित होता है, सो कभी नहीं हुआ, मिथ्या कल्पित है । जैसे रस्सी में सर्प होता है, वैसे ही आत्मा में अहंकार है और जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा में अहंकार का शब्द अर्थ फुरता है । यह शब्द और अर्थ मिथ्या है । इसका लक्षण यह है कि मैं हूँ सो कल्पित है; आत्मा केवल शुद्धस्वरूप है; उसमें अहं-त्वं का शब्द अर्थ कोई नहीं । ये अबोध से भासित होते हैं और बोध में लीन हो जाते हैं । वेदना का बोध अनर्थ का कारण है और अबोध तम है । जब यह निर्वाण हो, तब कर्म का बीज मूल से कटे । हे राम ! जो कर्मों का त्यागकर एकान्त में जाकर बैठता है, और ऐसे मानता है कि मैं कर्म नहीं करता, वह केवल मुख से कहता ही है, पर वास्तव में अहंकारयुक्त है, इससे फल को भोगता ही है; क्योंकि अहंकार सहित जीव फिर कर्म करेगा । वह आत्मज्ञान बिना अनात्म में मिलकर अपने को कर्ता भोक्ता आदि मानता है । जो पुरुष कर्म-इन्द्रियों से चेष्टा करता है और आत्मा को लिप्त नहीं जानता, वह अकर्ता ही है—उसके करने से कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होते और न करने से भी नहीं होते । ऐसा पुरुष परम निर्वाणपद को प्राप्त होता है, जिस पद में वाणी की गति नहीं । हे राम ! उसमें स्फुरण कोई नहीं—केवल चमत्कार है, अर्थात् हुआ कुछ नहीं और भासित होता है । जैसे बेल की मज्जा बेल से भिन्न नहीं, वैसे ही यह जगत् है । जैसे सोने से भूषण भिन्न नहीं, वैसे ही निज शब्द का अर्थ है; पर ये भिन्न-भिन्न शब्द अर्थ तब तक भासित होते हैं, जब तक अहं वेदना है । हे राम ! आत्मपद सदा अपने आपमें स्थित है । जैसे पत्थर अपनी जड़ता में स्थित है, वैसे ही आत्मा चैतन्य घनता में स्थित है ।
३८८ ( योगवासिष्ठ )
उसको मुनीश्वर चैतन्य मात्र कहते हैं। उस अपने स्वरूप के प्रमाद से ही जीव दुख पाता है।
हे राम ! जो पुरुष गृहस्था में स्थित है, पर अहंकार से रहित है, उसको वनवासी जानो, उसे सदा एकान्त है। और जो वनवासी अहँ-कार-सहित है, वह सदा जनों में स्थित है। प्रथम तो वह एक गढ़े में था, फिर उसको त्यागकर दूसरे गढ़े में पड़ा है; अर्थात् वेषधारी है और बनवास लिया है। ईश्वर चाहे तो निकाले नहीं, क्योंकि बड़े कूप में पड़ा है। हे राम ! जो पुरुष अर्थत्याग करता है या एक अङ्ग का त्याग करता है और दूसरे को अङ्गीकार करता है, ऐसा पुरुष अपने को निष्काम मानता है, पर उसको यह त्यागरूपी पिशाचिनी भोगती है। हे राम ! यह जीव निष्कर्म तभी होता है, जब इसकी अहँवेदना नष्ट होती है, अन्यथा नहीं होता। इससे कर्म को मूल से उखाड़ो। जैसे कुल्हाड़ा बेलि और वृक्ष को मूल से काटता है, वैसे ही काटो। अहँवेदना ही मूल है, उसको काटना चाहिए।
हे राम ! पुरुषप्रयत्न उसी का नाम है कि अपने अहँ का नाश करना और आपही शेष रहना। देह से भिन्न हुआ जीव अपने को कर्त्ता-भोक्ता जानता है। उस अहँ का नाश करना और शिवपद को प्राप्त होना एक ही बात है। जो सर्वदा मङ्गलरूप अद्वैत है—यह विश्व भी उसका चमत्कार है। जैसे नारियल में खोपड़ा होता और उसके बहुत नाम रखते हैं, सो नारियल से कुछ भिन्न नहीं, वैसे ही संसार आत्मा से भिन्न नहीं। जैसे खम्भे में काष्ठ से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह संसार है। यह नानात्व भी चैतन्य घन आत्मा ही है। निज अक्षर का जो अर्थ कहा है, वह भी जब यही है, तब विधि-निषेध किसका कीजिये ? सब परमात्मतत्त्व है, दूसरा नहीं। हे राम ! ऐसे आत्मा को जानकर सुख से विचरो। जैसे अर्द्धनिद्रित की चेष्टा होती है और जैसे बालक पालने में सोकर स्वाभाविक अङ्ग हिलाता है, वैसे ही तुम्हारी चेष्टा होगी, अपने देह का अभिमान तुम न करो। हे राम ! जो कुछ भाव-अभाव पदार्थ भिन्न-भिन्न भासित होते हैं, वे
३८६
असत्य है। आत्मा का साक्षात्कार होने पर परमात्मतत्त्व ही भासित होगा, तब अहंकार का उत्थान निवृत्त होगा। हे राम ! एक और युक्ति सुनो, जिससे आत्मज्ञान होगा। यह जो अहं-अहं क्षण-क्षण में फुरता है, सो जब फुरे तभी उस क्षण में जानो कि मैं नहीं हूँ। जब ऐसे दृढ़ होगे, तब अहंकाररूपी पिशाच का नाश हो जावेगा और आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होगा। इससे अहंकार के नाश का यत्न कर सोचो कि 'न मैं हूँ' 'न जगत् है'। हे राम ! ज्ञान इसी का नाम है कि 'अहं', 'मम' न रहे। उसको मुनीश्वर परब्रह्म और सम्यक्पद कहते हैं। और जहाँ अहं-मम है, वहाँ अविद्यारूपी तम है। हे राम ! अज्ञानी के हृदय में सब पदार्थों का भाव स्थित है, इससे उसको देश, काल, घर, नगर, मनुष्य, पशु, पक्षी आदिक त्रिगुणमय संसार भासित होता है। जब इनका अभाव हो जाय, तब शान्तिपद की प्राप्ति हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अहंकारनाशविचारो नाम शताधिकत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिसके मन से 'मैं' और 'मेरे' का अभिमान चला गया है, उसको शान्ति हुई है। जिसके हृदय में 'मैं' 'देह' 'मेरे सम्बन्धी', 'गृह' आदिक का अभिमान है, उसको कदापि शान्ति नहीं, और शान्ति बिना सुख नहीं। हे राम ! प्रथम आप बनता है, तब जगत् है। जो आप न बने तो जगत् कहाँ हो ? इसका होना ही अनर्थ का कारण है। जिस पुरुष ने अहंकार का त्याग किया है, वह सर्वत्यागी है। जिसने अहंकार का त्याग नहीं किया, उसने कुछ नहीं त्यागा। जिसने क्रिया का त्याग किया और अपने को सर्वत्यागी मानता है, उसका यह विचार मिथ्या है। जैसे वृक्ष की डालें काटिये तो वह फिर उगता है, उसका नाश नहीं होता, वैसे ही कर्म के त्याग से त्याग नहीं होता। जो त्यागने योग्य अहंकार नहीं नष्ट होता तो कर्म फिर उपजते हैं। इससे अहंकार का त्याग करो, तब सर्वत्यागी होगे। इसका नाम महात्याग है। तब स्वप्न में भी संसार न भासित होगा। जाग्रत् का क्या कहना है। उसको संसार का ज्ञान कदापि
३४० * योगवाशिष्ठ *
नहीं होता । हे राम ! संसार का बीज अहंभाव है, उसी से स्थावर-जङ्गम जगत भासता है । जब इसका नाश हुआ, तब जगतभ्रम मिट जाता है, इससे इसके अभाव की भावना करो । जब तुम्हें अहँ की भावना फुरे तो जानो कि मैं नहीं हूँ । जब इस प्रकार अहंकार का अभाव हुआ तब पीछे जो शेष रहेगा, वही आत्मपद है । हे राम ! सब अनर्थों का कारण अहंभाव है, उसका त्याग करो ।
हे राम ! शस्त्र के प्रहार और व्याधि को यह जीव सह सकता है तो इस अहँ के त्यागने में क्या कदर्थना है । हे राम ! संसार का बीज अहँ का सद्भाव है, उसका नाश करना मानो संसार का मूलसंयुक्त नाश करना है—इसी के नाश का उपाय करो । जिसका अहंभाव नष्ट हुआ है, उसको सब ठौर आकाशरूप है । उसके हृदय में संसार की सत्ता नहीं फुरती । चाहे वह गृहस्थ हो तो भी उसको यह प्रपञ्च शून्य बन जाता है । जो अहंकार सहित वन में जा बैठे तो भी वह जनों के समूह में बैठा है; क्योंकि उसका अज्ञान नष्ट नहीं हुआ । जिसने मन सहित षट् इन्द्रियों को वश नहीं किया, उसको मेरी कथा के सुनने का अधिकार नहीं—वह पशु है । जिस पुरुष ने मन को जीता है, अथवा दिन प्रतिदिन जीतने की इच्छा करता है, वह पुरुष है । और जो इन्द्रियों का विश्रामी अर्थात् क्रोध, लोभ, मोह से सम्पन्न है वह पशु है और महाअन्धतम को प्राप्त होता है । हे राम ! जो पुरुष ज्ञानवान् है, उसमें यदि इच्छा दिखती है तो भी वह उसकी इच्छा अनिच्छा ही है और उसके कर्म अकर्म ही हैं । जैसे भुना दाना फिर नहीं उगता, पर उसका आकार भासित होता है वैसे ही ज्ञानवान् की चेष्टा देखने मात्र को होती है, उसके हृदय में वासना नहीं होती । हे राम ! जो पुरुष इन्द्रियों से चेष्टा करता है और हृदय में जगत की सत्यता नहीं मानता, उसे कोई बन्धन नहीं होता और जो जगत को सत्य मानकर थोड़ा ही कर्म करता है, तो भी वह फँस जाता है-जैसे थोड़ी अग्नि जाग कर बहुत हो जाती है—ज्ञानी को बन्धन नहीं होता । उसका प्रारब्ध शेष है, यह भी वह हृदय में नहीं मानता और जानता है कि ये कर्म शरीर