योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1186, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें३७८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊
गति नहीं; परन्तु फिर भी कुछ कहता हूँ। वह शुद्ध, निर्मल, अद्वैत, चैतन्य ब्रह्म, काल का भी काल, केवल चिन्मात्र और त्यों का त्यों अच्युत पद है। उस पद को पाकर जीव ऐसा हो जाता है, जैसे वस्त्र के ऊपर मूर्ति लिखी हो, वैसे ही यह उत्थान से रहित होता है और उसको अहंब्रह्म का उत्थान भी नहीं रहता। इति० नि० सप्तभूमिकालक्षण विचारः षड्विंशाधिकशततमस्सर्गः॥ १२६ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! ये सप्तभूमिकाएँ जो तुमसे कहीं हैं इन्हीं से ज्ञान की प्राप्ति होती है, अन्य साधनों से ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। हे राम! जब गुरु ज्ञानवान् हो, तब जानिये कि उसकी वृत्ति प्रथम भूमिका में स्थित हुई है। इससे तुम भूमिका की ओर चित्तरूप चरण रखोगे, तब तुमको स्वरूप की प्राप्ति होगी। हे राम! तीसरी भूमिका तक सब कामनाएँ निवृत्त होती हैं, केवल एक आत्मपद की कामना रहती है। यदि उस अवस्था में शरीर छूट जाय तो मनुष्य और जन्म पाकर ज्ञान का पात्र होता है। और यदि चतुर्थ भूमिका में प्राप्त होकर शरीर छूटे तो फिर जन्म नहीं होता; क्योंकि आत्मपद की प्राप्ति होने पर फिर कुछ पाने की इच्छा नहीं रहती। जन्म का कारण इच्छा है; जब कुछ इच्छा नहीं रही, तब जन्म भी नहीं रहा। जिसको चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है, उसको स्वरूप की प्राप्ति होती है, तब फिर इच्छा कैसे हो? जैसे भुना बीज नहीं उगता, वैसे ही उसका चित्त ज्ञान-अग्नि में दग्ध हो जाता है; क्योंकि वह सत्यपद को प्राप्त होता है। इससे वह जन्म नहीं लेता और मरता भी नहीं—संसार को स्वप्नवत् देखता है। पञ्चम भूमिकावाला सुषुप्त की तरह होता है। छठी भूमिका साक्षारूप तुरीयापद है। सप्तम तुरीयातीत निर्वाच्यपद है। हे राम! इतना कहने का प्रयोजन यही है कि वासना का त्याग करो और अचितपद को प्राप्त हो! इसका अभिमान होना ही वासना है। जब इसका अभिमान निवृत्त हो, तब शान्ति होगी, परिच्छिन्न अहंकार न रहेगा। आत्मा के अज्ञान से अहंभाव हुआ है और आत्मज्ञान से यह लीन हो जाता है।