योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1185, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें- निर्वाण प्रकरण * ३७७
सोहता है और अपने स्वरूप में सदा सन्तुष्ट रहता है। जो पुरुष छठी भूमिका में स्थित है, उसके ये लक्षण होते हैं—वह संसार में सुपुप्त होकर स्वरूप में सावधान रहता है और उसका जीवभाव जाता रहता है। जैसे घट की उपाधि से घटाकाश परिच्छिन्न भासित होता है और जब घट भग्न हुआ तब घटाकाश महाकाश एक हो जाता है, वैसे ही अहङ्काररूपी घट के भग्न होने पर आत्मा ही भासित होता है।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे षष्ठभूमिकोपदेशो नाम शताधिकपञ्चविंशतितमस्सर्गः ॥ १२५ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसके अनन्तर जब उस पुरुष को सप्तम भूमिका प्राप्त होती है, तब वह अपने को आत्मा ही जानता है। उसे पंचभूतों का ज्ञान नहीं रहता। तब केवल आत्मत्वमात्र होता है और दृश्य का ज्ञान नहीं रहता; बल्कि यह भी ज्ञान नहीं रहता कि विश्व मेरे आश्रय में फुरता है। देहसहित हो, अथवा विदेह हो, उसकी आत्मा में उत्थान कभी नहीं होता। जैसे आकाश अपनी शून्यता में स्थित है, वैसे ही वह आत्मस्वरूप में स्थित होता है और उसकी चेष्टा भी स्वाभाविक होती है। जैसे बालक पालने में अपने अङ्ग स्वाभाविक हिलाता है, वैसे ही उसकी खान, पान आदिक चेष्टाएँ स्वाभाविक ही होती हैं। जैसे काष्ठ की पुतली तागे के हिलने में चेष्टा करती है, वैसे ही प्रारब्ध-वेग के तागे से उसकी चेष्टाएँ होती हैं—उसको अपनी कुछ इच्छा नहीं रहती। हे राम ! सप्तम भूमिकावाला जैसी अवस्था को प्राप्त होता है; उसे वही जानता है, और कोई नहीं जान सकता। जिसका चित्त सत्पद को प्राप्त हुआ है, वह भी उस अवस्था को नहीं जान सकता। जिसको वह पद प्राप्त हुआ है, वही उसे जानता है। हे राम ! जीवन्मुक्त का चित्त सत्पद को प्राप्त होता है और वह तुरीय-पद में स्थित होता है। उसका चित्त निर्वाण को प्राप्त हो जाता है और तुरीयातीत पद को प्राप्त होकर विदेहमुक्त होता है। उसमें अहंभाव का उत्थान कदापि नहीं होता। वह मनरूप है, पर असत् की नाईं स्थित है। हे राम ! वह पुरुष उस पद को प्राप्त होता है, जिसमें वाणी की