योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1184, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें३७६ ❋ योगवाशिष्ठ ❋
भीतर-बाहर पूर्ण हो रहा है और एकरस है। वह द्वैतकल्पना को नहीं प्राप्त होता और उस पद को पाकर आनन्दित होता है। जैसे कोई मारे जाने के निमित्त पकड़ा गया हो और उसकी रक्षा हो तो वह बड़े आनन्द को प्राप्त होता है; वैसे ही वह पुरुष आनन्द को प्राप्त होता है। जैसे कोई आधि-व्याधि से छूटा आनन्द को प्राप्त होता है, वैसे ही वह ज्ञानवान् आनन्द को प्राप्त होता है। जैसे कोई मंजिल चलने मे थका हुआ शय्या पर विश्राम करे और आनन्द को प्राप्त हो, वैसे ही ज्ञानवान् को आनन्द मिलता है। जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा अमृत से आनन्दमय होता है, वैसे वह पुरुष अपने आनन्द से परिपूर्ण रहता है। जैसे काष्ठ के बिना अग्नि धुएँ से रहित प्रज्वलित होती है, वैसे ही ज्ञानवान् अज्ञानरूपी धुएँ से रहित शोभा पाता है। हे राम! जब वह संसार की ओर देखता है तो उसे अग्नि से जलता हुआ अपने से भिन्न देखता है। वह ज्ञानरूपी पर्वत के ऊपर स्थित होकर संसार को जलता देखता है।
हे राम! यह जो कहा है कि संसार को जलता देखता है, सो ऐसे भी नहीं फुरता कि मैं ज्ञानी हूँ और यह संसार है। स्वरूप की अपेक्षा से यह कहा है कि संसार उसको दुःखदायी लगता है। वह आनन्द से भी परे परमानन्द को प्राप्त हुआ है और सत्-असत् से रहित जो अपना आपा है उसमें स्थित है। जैसे पर्वत भीतर-बाहर अपने आपमें स्थित और एकरस है, वैसे ही वह पुरुष एकरस है। वह संसार में जाग्रत होकर चेष्टा करता है, पर हृदय में संसार की भावना से रहित है। उस पद में वाणी की गति नहीं। फिर भी कुछ कहता हूँ, सुनो। कोई उसे ब्रह्म कहते हैं; कोई चैतन्य कहते हैं; कोई आत्मा कहते हैं; कोई साक्षी कहते हैं। कालवाले उसी को काल कहते हैं, ईश्वरवादी ईश्वर कहते हैं; सांख्यवाले प्रकृति इत्यादिक संज्ञाओं से निर्देश करते हैं। सब उसी के नाम हैं—उसमें भिन्न नहीं। उस पद को सन्तजन जानते हैं। हे राम! ऐसे पद को पाकर वह अपने आपमे शोभित होता है। जैसे मणि के भीतर-बाहर प्रकाश होता है, वैसे ही वह पुरुष भीतर-बाहर