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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1183, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1183

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३७५

हे राम ! जो देश-काल वस्तु पदार्थ है, उन सबमें वह आत्मभाव रखता है। यद्यपि उसमें प्रत्यक्ष चेष्टा दीखती है, तो भी उसमें हृदय में कुछ नहीं। जैसे सपने में खाता, पीता, लेता, देता अपने को देखता है और जागे पर सबका अभाव हो जाता है, वैसे ही जो पुरुष परमार्थ-सत्ता में जागा है, उसको गुण व क्रिया अपने में नहीं भासित होती । वह जो करता है, उसमें अभिलाषा नहीं रखता । उसकी सब चेष्टा स्वाभाविक होती है । अपने निमित्त उसे कुछ कर्तव्य नहीं । ऐसे भगवान् ने भी कहा है कि वह सर्वत्र आत्मा को ही देखता है। आकाश, पृथ्वी, सूर्य, ब्राह्मण, हाथी, श्वान, चाण्डाल आदिक सबमें वह आत्मभाव देखता है, सब आकारों को मृगतृष्णा के जलवत् देखता है कि इनका अत्यन्त अभाव है। द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, भी उसको आकाशवत् भासित होते हैं और वह निर्मल आकाशवत् शान्तरूप है । अहं-भाव से रहित वह केवल चिन्मात्र में स्थित है । वह ग्रहण व त्याग से अतीत सर्वकल्पना से रहित, निर्वाण, स्वच्छ, निर्मल आकाशरूप स्थित है । अहं-मम आदिक चिद्ग्रन्थि उसकी कट गई हैं । अनात्म में अहं अभिमान उसका नष्ट हो जाता है, वह केवल शान्तरूप हो रहता है ।

जैसे क्षीरसमुद्र से मन्दराचल पर्वत निकलकर शान्तरूप हुआ, वैसे ही वह रागद्वेषरूपी क्षोभ करनेवाले अन्तःकरणरूपी समुद्र से निकल गया, तब शान्तरूप अक्षोभ्य होकर परम शोभा से शोभित होता है । जैसे विश्वकर्मा ने सूर्य का मण्डल रचा है और वह प्रकाश से शोभा पाता है, वैसे ही ज्ञानरूपी प्रकाश से वह प्रकाश पाता है । जैसे चक्र फिरता-फिरता रह जाता है और शान्त होता है, वैसे ही वह अज्ञान में फिरता-फिरता ठहरकर सदा शान्ति को प्राप्त होकर अपने आप से प्रकाशित होता है । जैसे पवन से रहित दीपक प्रकाशित होता है, वैसे ही कलनारूपी पवन से रहित पुरुष अपने आपमें प्रकाशमान होता है और सर्वदा निर्मल और एकरस रहता है । जैसे घट के भीतर और बाहर शून्य है, वैसे ही देह के भीतर-बाहर आत्मा है । जैसे जल में घट रखिये तो उसके भीतर-बाहर जल होता है, वैसे ही वह पुरुष अपने रूप में