योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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है, उसका उसने नाश किया है । और यदि भय, क्रोध, अहंकार, मोह इत्यादि विकार उस पुरुष में दीखते भी हैं, तो उसके हृदय को वे स्पर्श नहीं करते । जैसे पक्षी आकाश में उड़ता है, परन्तु आकाश को स्पर्श नहीं कर सकता, वैसे ही उस पुरुष को कोई विकार स्पर्श नहीं करता । हे राम ! उस पुरुष के सब संशय नष्ट हो गये हैं और वह सर्वदा स्वरूप में स्थित और शान्तरूप है, आत्मा से भिन्न वह किसी सुख की वाञ्छा नहीं करता और उसके सब संकल्प मिट चुके हैं । उसे आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होता । वह जाग्रत की तरह देख पड़ता है, पर सर्वदा जाग्रत से सुपुप्त है ।
इति० नि० पञ्चमभूमिकावर्णनंनामचतुर्विंशताधिकतमस्सर्गः ॥ १२४ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तीसरी भूमिका पर्यन्त वह जाग्रत है और चतुर्थ भूमिका में जाग्रत् अवस्था को स्वप्नवत् देखता है । पञ्चम भूमिका-वाला संसार में सुपुप्त होता है और छठी भूमिकावाला तुरीयपद में स्थित होता है और सर्वदा अक्रिय है, अर्थात् किसी क्रिया में नहीं बंधता । वह सर्वदा आनन्दरूप है । भिन्न होकर आनन्द को नहीं भोगता, आप ही आनन्दरूप है । केवल अपने आप स्वतः अपने में ही स्थित है और सर्वदा निर्वाणरूप है । हे राम ! सब कर्म वह यथाशास्त्र करता देख पड़ता है, परन्तु हृदय में शून्य है—उसका किसी में लगाव नहीं । जैसे आकाश में सब पदार्थ हैं, पर आकाश का स्पर्श किसी में नहीं, वैसे ही सब क्रिया उसमें विद्यमान देख पड़ती हैं, तो भी वह हृदय में किसी का स्पर्श नहीं करता; क्योंकि उसको कर्मबन्धन में डालनेवाला अहंकार नष्ट हो गया है—वह केवल शान्तरूप है । चिन्मात्र में अहंभाव का उत्थान ही अज्ञान है, और वही दुःखदायी है । जब अहंभाव निवृत्त होता है, तब कोई कर्म स्पर्श नहीं करता । यद्यपि उसको विश्व देख पड़ता है, तो भी वास्तव में वह नहीं देखता; क्योंकि उसको सर्वत्र ब्रह्म ही भासित होता है । वह खाता है, पर नहीं खाता; देता भी है, पर कभी नहीं देता । लेता है तो भी कभी किसी से कुछ नहीं लेता । चलता है, परन्तु कभी नहीं चला ।