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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1181, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1181

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३७३

रात्रि हुई, तब मुँद जाता है—उसको कोई खेद नहीं, वैसे ही उस पुरुष की अहंममता से रहित स्वाभाविक चेष्टा होती है। हे राम! अहंता-ममतारूप जाग्रत् से वह पुरुष सुषुप्त हो जाता है, और सम्पूर्ण भावरूप जो शब्द और अर्थ है, उनका उसको अभाव हो जाता है। उसका अशेष-शेष का मनन नष्ट हो जाता है। उसको पशु, पक्षी, मनुष्य, देवता, भला, बुरा इत्यादि भिन्न-भिन्न पदार्थों की भावना नहीं रहती। उसकी द्वैतकलना नष्ट हो जाती है। उसे एक ब्रह्मसत्ता ही भासित होती है—संसार नहीं भासित होता।

हे राम! अहंतारूपी तिल से संसाररूपी तेल उपजता है और अहंतारूपी फूल से संसाररूपी गन्ध उपजती है। संसार का कारण अहंता ही है। जिस पुरुष की अहंता नष्ट हो जाती है, वह इन्द्रियों के इष्ट को पाकर हर्षित नहीं होता और अनिष्ट के प्राप्त होने पर द्वेष नहीं करता। वह ऐसे अपने को नहीं जानता कि मैं खड़ा हूँ बैठा हूँ अथवा चलता हूँ; वह अपने को सर्वदा आकाशरूप जानता है। वह न भीतर देखता है, न बाहर देखता है; न आकाश को देखता है और न पृथ्वी को देखता है, सर्वत्र ब्रह्म ही देखता है। उसको भिन्न कुछ नहीं दीखता। वह द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, तीनों का साक्षी रहता है। वह अहंकार का भी साक्षी, इन्द्रियों का भी साक्षी और विश्व का भी साक्षी है। इनके साथ उसका स्पर्श कभी नहीं होता। जैसे ब्राह्मण चाण्डाल को स्पर्श नहीं करता। जैसे बीज से अंकुर होता है और फिर अंकुर से डालें होती हैं, इसी प्रकार सब पदार्थों का परिणाम है। पर उनमें आकाश ज्यों का त्यों रहता है; क्योंकि उनके साथ उसका स्पर्श नहीं होता। वैसे ही वह पुरुष द्रष्टा, दर्शन, दृश्य से अतीत रहता है। जैसे मरुस्थल में जल असत् है, वैसे ही उस पुरुष की दृष्टि में त्रिपुटी असत्य है। उस पुरुष की त्रिपुटी और अहंता नष्ट हो जाती है, इससे भेदबुद्धि भी नहीं रहती। इसी से वह शान्त, निर्मल संसार से सुषुप्त, चैतन्य-घनता से पूर्ण और सर्वदा शान्तरूप रहता है। जिन नेत्रों से लोग संसार देखते हैं, उनसे वह अन्धा हुआ है—अर्थ यह कि जिस मन में फुरना होता