सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1180, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1180

३०२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

राम ने पूछा, हे भगवन् ! जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति का लक्षण कहिये। तुरीयावस्था और तुरीयातीत पद मुझमे कहिये। गुरु शिष्य को उपदेश करने नहीं ऊबते। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तत्त्व का विस्मरण, पदार्थों की भावना और नाशवान् पदार्थों को सत की तरह जानना ही जाग्रत है। पदार्थों में भाव-अभाव की सत्यता और जगत् को मिथ्या भावनामात्र जानना स्वप्न कहाता है और जाग्रत और स्वप्न जिसमें लय हो जावें, वह सुषुप्ति है। जब ज्ञान में भेद की शान्ति हो जाय और जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति तीनों का अभाव हो, ऐसी निर्मल स्थिति तुरीयावस्था है। हे राम ! अज्ञानी जीव संसार को वर्षाकाल के मेघ की तरह देखते हैं; क्योंकि संसार उनको दृढ़ होकर भासित होता है। पर जिसको चतुर्थ भूमिका प्राप्त हुई है, वह संसार को शरत्काल के मेघ की तरह क्षणभंगुर देखता है। जिसको पञ्चम भूमिका प्राप्त हुई है, वह शरत्काल के मेघ नष्ट हुए की तरह देखता है। जैसे शरत् में निर्मल आकाश होता है, वैसे ही उसको निर्मल दीखता है। इन तीनों का वृत्तान्त सुनो। अज्ञानी जगत् को जाग्रत की तरह देखता है और उसको जगत् की दृढ़ सत्यता भासित होती है, इससे उसे रागद्वेष उपजता है। चतुर्थ भूमिकावाला जगत् को ऐसे देखता है, जैसे शरत्काल का मेघ वर्षा से रहित होता है। जैसे स्वप्न की सृष्टि होती है, वैसे ही उसको जगत् की सत्यता नहीं भासित होती; क्योंकि उसकी स्मृति स्वप्न की होती है। वह जगत् को स्वप्नवत् देखता है, इससे उसको राग, द्वेष नहीं उपजता।

पञ्चम भूमिका पर पहुँचनेवाला जगत् को सुषुप्ति की तरह देखता है। जैसे शरत्काल का मेघ नष्ट होकर फिर नहीं देख पड़ता, वैसे ही उसको संसार का भान नहीं होता, और उसकी चेष्टा स्वाभाविक होती है जैसे कमल स्वाभाविक ही खुलता और मुँद जाता है, वैसे ही वह कुछ यत्न नहीं करता—चेष्टा में जैसा प्रतियोगी स्वाभाविक प्राप्त होता है, वही करता है। जैसे कमल के खुलने का प्रतियोगी सूर्य जब उदय हुआ, तब कमल खुल गया, और जब मुँदने की प्रतियोगी