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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1187, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1187

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३७६

हे राम ! संसार एक नदी है। उसमें आधि-व्याधि उपाधि रोग तरङ्ग हैं; राग-द्वेषरूपी छोटे मच्छ हैं और तृष्णारूपी बड़े मच्छ हैं। उसमें जीव दुःख पाते हैं। जैसे जल नीचे को चला जाता है, वैसे ही मृत्यु के मुख में संसार चला जाता है। उसमें अज्ञान ही जल भरा है। हे राम ! तृष्णा से पुरुष बँधे हैं। इससे तुम हाथी की तरह वैराग्य और अभ्यासरूपी दाँतों से तृष्णारूपी जंजीर को काटो। हे राम ! तृष्णारूपी सर्पिणी विषयरूपी फूत्कार से विचाररूपी बेल को जलाती है, इससे जीवरूपी किसान दुःख पाता है। इससे तुम वैराग्यरूपी अग्नि से उस सर्पिणी को जलाओ। हे राम ! तृष्णा दुःखदायी है। जब तक तृष्णा है, तब तक सन्तों के वचन हृदय में स्थान नहीं पाते। जैसे दर्पण पर मोती नहीं ठहरता। वैसे ही तृष्णावान के हृदय में सन्तों के वचन नहीं ठहरते। तृष्णा के इतने नाम हैं—तृष्णा, अभिलाषा, इच्छा, फुरना, संस्मृति। ये सब इसी के नाम हैं। इच्छारूपी मेघ ने ज्ञानरूपी सूर्य को ढका है, इससे वह नहीं चमकता। जब विचाररूपी पवन चले, तब इच्छारूपी मेघ नष्ट हो जावे और आत्मरूपी सूर्य का साक्षात्कार हो।

हे राम ! यह जीव आकाश का पक्षी है, पर कर्म में इच्छारूपी तागे से बँधा है, इससे नहीं उड़ सकता और परमात्मपद को भी प्राप्त नहीं होता। यह इच्छा ही से दीन है। जब इच्छा नष्ट हो, तब आत्मस्वरूप प्राप्त हो। इसमें तुम इच्छा का नाश कर आत्मपरायण हो, अर्थात् विषय संसार से वैराग्य और आत्माभ्यास करो। हे राम ! यह जो मैंने तुमसे भूमिका का क्रम कहा है, इसमें जब आवे तब ज्ञान की प्राप्ति हो। पर इनको तब प्राप्त होता है, जब कि एक हथिनी को जीते, जो एक वन में रहती है। महातमरूप उसके दो पुत्र हैं। जो अनेक जीवों को मारकर अनर्थ करते हैं। उसके जीतने से सब जगत् जीता जाता है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! ऐसी मतरूपी हथिनी कौन है और कहाँ रहती है? उसके दाँत और पुत्र कौन हैं? कैसे वह मरती है, कैसे उत्पन्न हुई है और कौन वन है? यह सब मुझसे कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इच्छारूपी हथिनी और शरीररूपी वन है। वह मन-