योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1188, कुल 1734 में से
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रूपी गुफा में रहती है । इन्द्रियाँ उसके बच्चे और संकल्प-विकल्प दाँत हैं, उनमें वह छेदती है । हे राम ! एक नदी है, जिसका प्रवाह सदा चला जाता है । उसमें दो मच्छ रहते हैं, जो कभी नष्ट नहीं होते । संसृति ही नदी है, जिसमें राग-द्वेष मच्छ रहते हैं, वे नष्ट नहीं होते ।
हे राम ! वे मच्छ तब नष्ट हों, जब संस्मरणरूपी जल नष्ट हो । उसके सुकृत और दुष्कृतरूपी दो किनारे हैं । उसमें चिन्तारूपी ग्राह रहता है । कर्मरूपी लहरें हैं, उनमें जीवरूपी तृण आकर भटकता है । इस तृष्णा-रूपी विषवेलि का नाश करो । हे राम ! तृष्णारूपी अंकुर को बढ़ाना-घटाना अपने ही अधीन है । जो अंकुर को जल दीजिये तो बढ़ता जाता है और जो न दीजिये तो जल जाता है । स्फुरणरूपी जल देने में तृष्णारूपी अंकुर बढ़ता जाता है, और न देने से स्वरूप के अभ्यास द्वारा जल जाता है । हे राम ! तृष्णारूपी बड़ा मच्छ है, जो धैर्य आदि के मांस को भक्षण करनेवाला है । उसे वैराग्यरूपी कगडी और अभ्यासरूपी दाँतों से नष्ट करो । हे राम ! इच्छा का नाम बन्धन है और निरिच्छा का नाम मुक्ति । हे राम ! एक सुगम उपाय कहता हूँ, जिसमें तृष्णा नष्ट हो जायगी । निज अर्थ की भावना करो । तो उस भावना से शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होगी, तुम्हारी जय होगी और तुम सबसे उत्तम पद को प्राप्त होगे । फिर तुम्हें वासना न रहेगी, शरीर की चेष्टा स्वाभाविक होगी और सब संकल्प नष्ट हो जावेंगे ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे संस्मरणभावप्रतिपादनं नाम शताधिकसप्तविंशतितमसर्गः ॥ २२७ ॥
राम ने पूछा, हे भगवन् ! आप कहते हैं कि निज अर्थ की भावना में वासना नष्ट हो जावेगी और शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होगी । सो वासना तो चिरकाल से चित्त में स्थित है । वह एकवारगी कैसे नष्ट होगी ? आप कहते हैं कि वासना के नष्ट होने से जीव जीवन्मुक्त होता है । पर जिसकी वासना नष्ट होगी, उसका शरीर कैसे रहेगा ? वासना बिना चेष्टा क्योंकर होगी और जीवन्मुक्त पद कैसे प्राप्त होगा ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मेरे वचनों को, जो कानों के भूषण हैं, सुनने