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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1189, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1189

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

<p align="right">३८१</p>

से दरिद्र न रहेगा। निज अर्थ के धारण से संशय नष्ट हो जावेंगे और आत्मपद की प्राप्ति होगी। उस निज अक्षर के तीन अर्थ हैं—एक तो अन्य के अर्थ हैं कि पाञ्चभौतिक शरीर से तुम्हारा स्वरूप विलक्षण है, और दूसरा अर्थ विरुद्ध है, अर्थात् शरीर जड़ और तमरूप है और तुम्हारा स्वरूप आदित्यवर्ण और तम से परे है। हे राम! जब तुमने ऐसी धारणा की कि मैं आत्मा हूँ और यह देहादिक अनात्मा है, तब देह में मिलकर अभिलाषा कैसे रहेगी? मतलब यह कि अभिलाषा न करोगे; क्योंकि जब तक जाना नहीं, तब तक अभिलाषा है। तीसरा अर्थ यह है कि सबका अभाव है, अर्थात् न मैं हूँ और न कोई जगत् है। जब ऐसे जाना तब किसकी इच्छा रहेगी? अर्थात् किसी की न रहेगी। अथवा जो तुम अपने को देह से विलक्षण आत्मा जानोगे, तो भी अविद्याकृत तमरूप शरीर की अभिलाषा न रहेगी।

देह तमरूप है और तुम आदित्यवर्ण अर्थात् प्रकाशरूप हो। तुम्हारा और इसका क्या संयोग। जैसे सूर्य के मण्डल में रात्रि नहीं दिखती, वैसे ही जब तुम अपने को प्रकाशरूप जानोगे, तब तमरूप संसार न दिखेगा। तब शरीर की चेष्टा स्वाभाविक होगी और तुममें कुछ चेष्टा न होगी। जैसी अर्धनिद्रावाले की चेष्टा होती है, वैसी ही चेष्टा होगी और तुमको बालक की तरह अभिमान न होगा। जैसे बालक की उन्मत्त चेष्टा होती है, वैसे ही तुम्हारी चेष्टा भी स्वाभाविक होगी। हे राम! यदि तुम यह इच्छा करोगे कि यह सुख हो और यह दुःख न हो तो कदापि वह न होवेगा। जो कुछ शरीर का प्रारब्ध है, सो अवश्य होता है परन्तु ज्ञानवान् के हृदय में संसार की सत्यता जाती रहती है और स्वाभाविक चेष्टा होती है; इच्छा नहीं रहती। हे राम! जैसे कोई पुरुष किसी देश को जाता है और पहुँचने का समय थोड़ा हो तो वह मार्ग के स्थान देखता भी जाता है परन्तु किसी में लिप्त नहीं होता, वैसे ही चित्त को आत्मपद में लगाओ। ऐसा शरीर पाकर यदि आत्मपद न पाया तो कब पावोगे? जो आत्मपद से विमुख है, वह वृक्षादि के जन्मों को पावेगा। इससे हे राम! चित्त