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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1190, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1190

३८२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

आत्मपद में रखो और स्वाभाविक इच्छा बिना चेष्टा करो। इच्छा ही दुःखदायक है। जब इच्छा नष्ट होती है, तब उर्मी को ज्ञानवान् तुरीयपद कहते हैं। जहाँ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति का अभाव हो, वही तुरीयपद है।

हे राम ! ये जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाएँ जहाँ न पाइये, वही तुरीयपद है। जब संवेदन, स्फुरण या अहंकार का अभाव हो जावे, तब तुरीयपद प्राप्त होता है। हे राम ! अहंकार का होना दुःखदायक है। जब इसका नाश हो, तभी आनन्द मिलता है। आत्मपद से भिन्न जो माया की रचना है, उसमें मिलकर जीव अपने को जानता है कि 'मैं हूँ'। यही अनर्थ है। इसमें अहंकार का त्याग करो। जिसको देखकर यह अहंकार स्फुरता है, उसका निज अर्थ की भावना से नाश करो। और जो आत्मपद से भिन्न भासित होता है, उसे मिथ्या जानो। यही निज असत् का अर्थ है। जो कुछ संसार भासित होता है, उसको स्वप्न-मात्र जानो। इसको सत्य जानकर इसकी इच्छा करना ही अनर्थ और मिथ्या जानकर इच्छा न करना कल्याण है। हे राम ! में ऊँची बाह करके पुकारता हूँ, पर मेरे वचन कोई नहीं सुनता कि इच्छा ही संसार का कारण है और इच्छा से रहित होना ही परमकल्याण है। जब जीव इच्छा से रहित होता है, तब शान्तपद को प्राप्त होता है। निश्चलत होने पर आत्मा ही भासित होता है, जो आनन्दरूप, सम और अद्वैत है। उसमें जगत् का अभाव है। हे राम ! मोह की बड़ी महिमा है। हृदय में जो आत्मरूपी चिन्तामणि स्थित है, उसको विस्मरण करके मूर्ख अहंकाररूपी काँच को ग्रहण करते हैं।

हे राम ! तुम निरभिमान होकर चेष्टा करो। जैसे यन्त्र की पुतली में अभिमान नहीं होता और वह चेष्टा करती है, वैसे ही प्रारब्ध वेग से तुम्हारी चेष्टा होगी। यह अभिमान तुम न करो कि ऐसे हो और ऐसे न हो। जब ऐसे होगे, तब शान्तपद को प्राप्त होगे; जहाँ वाणी की गति नहीं ऐसे आनन्द को प्राप्त होगे। जब तक इन्द्रियों के विषयों की तृष्णा है, तब तक जन्म-मृत्यु का बन्धन है। इसमें पुरुषप्रयत्न यही

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