योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
३८२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
आत्मपद में रखो और स्वाभाविक इच्छा बिना चेष्टा करो। इच्छा ही दुःखदायक है। जब इच्छा नष्ट होती है, तब उर्मी को ज्ञानवान् तुरीयपद कहते हैं। जहाँ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति का अभाव हो, वही तुरीयपद है।
हे राम ! ये जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाएँ जहाँ न पाइये, वही तुरीयपद है। जब संवेदन, स्फुरण या अहंकार का अभाव हो जावे, तब तुरीयपद प्राप्त होता है। हे राम ! अहंकार का होना दुःखदायक है। जब इसका नाश हो, तभी आनन्द मिलता है। आत्मपद से भिन्न जो माया की रचना है, उसमें मिलकर जीव अपने को जानता है कि 'मैं हूँ'। यही अनर्थ है। इसमें अहंकार का त्याग करो। जिसको देखकर यह अहंकार स्फुरता है, उसका निज अर्थ की भावना से नाश करो। और जो आत्मपद से भिन्न भासित होता है, उसे मिथ्या जानो। यही निज असत् का अर्थ है। जो कुछ संसार भासित होता है, उसको स्वप्न-मात्र जानो। इसको सत्य जानकर इसकी इच्छा करना ही अनर्थ और मिथ्या जानकर इच्छा न करना कल्याण है। हे राम ! में ऊँची बाह करके पुकारता हूँ, पर मेरे वचन कोई नहीं सुनता कि इच्छा ही संसार का कारण है और इच्छा से रहित होना ही परमकल्याण है। जब जीव इच्छा से रहित होता है, तब शान्तपद को प्राप्त होता है। निश्चलत होने पर आत्मा ही भासित होता है, जो आनन्दरूप, सम और अद्वैत है। उसमें जगत् का अभाव है। हे राम ! मोह की बड़ी महिमा है। हृदय में जो आत्मरूपी चिन्तामणि स्थित है, उसको विस्मरण करके मूर्ख अहंकाररूपी काँच को ग्रहण करते हैं।
हे राम ! तुम निरभिमान होकर चेष्टा करो। जैसे यन्त्र की पुतली में अभिमान नहीं होता और वह चेष्टा करती है, वैसे ही प्रारब्ध वेग से तुम्हारी चेष्टा होगी। यह अभिमान तुम न करो कि ऐसे हो और ऐसे न हो। जब ऐसे होगे, तब शान्तपद को प्राप्त होगे; जहाँ वाणी की गति नहीं ऐसे आनन्द को प्राप्त होगे। जब तक इन्द्रियों के विषयों की तृष्णा है, तब तक जन्म-मृत्यु का बन्धन है। इसमें पुरुषप्रयत्न यही
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३८३
है कि तृष्णा का नाश करो। कर्म के फल की तृष्णा न हो और कर्म के करने की भी इच्छा न हो। इन दोनों को त्यागकर स्वरूप में स्थित हो रहो। बल्कि ऐसा भी निश्चय न हो कि मैंने त्याग किया है। हे राम! जिस पुरुष ने कर्म को त्याग दिया है और अहंकारसहित है, उसने पुण्य और पाप सब कुछ किया है, और जिसमें अहंभाव नहीं है, वह चाहे जैसे कर्म करे तो भी कुछ नहीं करता। वह बन्धन को नहीं प्राप्त होता। जो न करने में अभिमानसहित है, उसको कर्त्ता देखते हैं, वह बन्धन में पड़ा है। हे राम! ऐसे आत्मा को जानकर अहं-मम का त्याग करो। ऐसे संवेदन के त्यागने में कुछ यत्न नहीं करना पड़ता। स्मृति उसकी होती है, जिसका अनुभव होता है। पर जिसका अनुभव नहीं, उसका त्याग करना सुगम है। अनुभव प्रत्यक्ष देखने को कहते हैं। तुम्हारे स्वरूप में विश्व नहीं है तो अनुभव क्या हो। ये पदार्थ जो तुमको भासित होते हैं, उनके कारण को जानो। इनका कारण अनुभव है। जब इनका अनुभव ही मिथ्या है, तब स्मृति कैसे सत् हो? रस्सी में सर्प का अनुभव हुआ और फिर स्मरण किया कि वहाँ सर्प देखा था। तो जब सर्प का अनुभव ही मिथ्या है, तब फिर उसका स्मरण कैसे सत् हो? इससे जो वस्तु मिथ्या है, उसके त्यागने में क्या यत्न है?
जब प्रपञ्च को मिथ्या जाना, तब तुमको कोई कर्म बन्धन का कारण न होगा; चेष्टा स्वाभाविक होगी और रागद्वेष जाता रहेगा। जैसे शरत्काल की वेलि सूख जाती है और उसका आकार देख पड़ता है, वैसे ही तुम्हारा चित्त देखने में आयेगा और चित्त का धर्म जो रागद्वेष है, वह जाता रहेगा—वह चित्त सत्पद को प्राप्त होगा। जब सबका विस्मरण (बाध) होता है, उसको शिवपद कहते हैं। वह परमपद ब्रह्म-शब्द-अर्थ से रहित केवल चिन्मात्र अद्वैत पद है। उसमें अहं-मम का त्याग करके स्थित रहो। संसार इसी का नाम है कि मैं हूँ और यह मेरा है। इसको त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो। हे राम! जब तक अहं-मम का संवेदन है, तब तक दुःख नहीं मिटते। जब यह संवेदन मिटता
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है, तब आनन्द मिलता है। यह मेरा उपदेश है। अब तुम्हारी जो इच्छा हो सो करो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे इच्छाचिकित्सोपदेशन्नाम शताधिकाष्टविंशतितमस्सर्गः ॥ १२८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! अद्वैत आत्मा—जिसको एक या दो नहीं कह सकते—अपने आप स्वभाव में स्थित है। अन्तःकरण-चतुष्टय बाह्य पदार्थ सब चेतनमात्र हैं, आत्मा से कुछ भिन्न नहीं। रूप, इन्द्रियाँ और मन का फुरना, देश और काल, सब आत्मरूप ही हैं। जैसे बालक मिट्टी की सेना बनाकर हाथी, घोड़े, राजा, प्रजा, आदि नाम रखता है, सो सब मिट्टी है—भिन्न कुछ नहीं; वैसे ही अहं-मम आदिक भी सब आत्मरूप हैं—कुछ पृथक् नहीं। जैसे मिट्टी में हाथी, घोड़ा आदि नाम कल्पित हैं, वैसे आत्मा में ही जगत् कल्पित है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। इस अहंकार को त्याग करो कि आत्मपद से भिन्न कुछ न फुरै। हे राम! रूप, अवलोक और नमस्कार, ये सब शिवरूपी मृत्तिका के नाम हैं। जब मापक, मान, मेय आदि सब वही रूप हुए तब किसमें किसको संचित कहिये? यह अहं-मम आदिक भी चिदाकाश से कुछ भिन्न वस्तु नहीं। इनको ऐसे जानकर संवेदनहीन शिला की तरह निःसंग हो रहो।
राम ने पूछा, हे भगवन्! आपने कहा कि अहं-मम फुरने का त्याग करो, यह मिथ्या है, और अहं-मम असत् है। ज्ञानी ऐसी भावना करते हैं कि इनकी सत्ता कुछ नहीं और तुम असंग हो रहो। यह असंग निष्कर्म से होता है अथवा कर्म से होता है, यह कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह तुम्हीं कहो कि कर्म क्या है और निष्कर्म क्या है; इनका कारण कौन है और इनका नाश कैसे हो और नाश होने से क्या सिद्धि होगी। जो तुम जानते हो तो कहो। राम बोले, हे भगवन्! जैसे आपसे सुना है और समझा है वही में कहता हूँ। वस्तु-नष्ट करनी हो, उसका निश्चय करके मूल से नाश कीजिये, तभी उसका नाश होता है। शाखा और पत्र काटने से उसका नाश नहीं होता। इससे इनका क्रम सुनो। इस संसाररूपी वन में देहरूपी वृक्ष
⚛ निर्वाण प्रकरण ⚛ ३८५
है, जिसका बीज कर्म है । पाणि, पाद आदिक पत्ते हैं । रुधिर, स्वास और वासना रस और सुख-दुःख फल है । जाग्रत् कर्म वासनारूपी वसन्तऋतु है । उसमें वह प्रफुल्लित होता है । और सुषुप्ति पापकर्मरूपी शरत्काल है । उसमें सूख जाता है । ऐसा शरीररूपी वृक्ष है । जवानी-रूपी उसकी कली है, जो क्षण भर सुन्दर रहती है । जरारूपी फल इसको हँसते हैं और रागद्वेषरूपी वानर क्षण-क्षण में हिलाते हैं ।
जाग्रत् वसन्तऋतु है जो सुषुप्तिरूपी हिम उत्पन्न करती है । यह वृक्ष वासनारूपी रस से बढ़ता है । पुत्र, कलत्र आदिक तृण और बांस हैं । इन्द्रियों के छिद्ररूपी मुख हैं, जिनसे शरीर की चेष्टा होती है । ज्ञान इन्द्रियाँ पाँच स्तम्भ हैं, जिनसे यह वृक्ष सधा है । इच्छारूपी बेलि है, जो अपने-अपने को चाहती है । बड़ा स्तम्भ इसका मन है, जो सबको धारण करता है । पञ्चप्राण इसके रस हैं । उनसे यह प्रत्यक्ष सब विषयों को ग्रहण करता है । इसका बीज जीव है । जीव चैतन्योन्मुखत्व चेतन को कहते हैं । जीवत्व का बीज संवित् है, जिसका मात्रपद से उत्थान हुआ है । उस संवित् का बीज ब्रह्म है—जिसका बीज कोई नहीं है । हे भगवन् ! सबका मूल संवित् का फुरना है । जब इसका अभाव होता है, तब आत्मा ही शेष रहता है । हे भगवन् ! यह तो मैं जानता हूँ । आगे आप भी कुछ कृपा करके कहिये । हे भगवन् ! जब तक चित्त से सम्बन्ध है, तब तक संसार में जन्म-मरण होता है, और जब जीव चित्त से रहित होता है तब परब्रह्म हो जाता है—वह शिवपद अनिच्छित, शान्त और अनन्तरूप है । चिन्मात्र में जो अहं का उत्थान है, वही कर्मरूपी वृक्ष का कारण है । जब तक अनात्मा से मिलकर जीव कहता है कि 'मैं हूँ' तब तक वही संसार का कारण है । यह आपके वचनों से मैंने समझा है, सो सुना दिया । आगे कुछ कृपा करके आप भी कहिये ।
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसी प्रकार कर्म का बीज सूक्ष्म संवित् है । जब तक संवित् है, तब तक कर्मों का बीज नष्ट नहीं होता । और ये सब संज्ञाएँ इसी की हैं । कर्मों का बीज इच्छा, तृष्णा, अज्ञान, चित्त और ग्रहणत्याग की बुद्धि इत्यादिक बहुत सी संज्ञाएँ हैं । क्या किसी
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में हेयोपादेय बुद्धि करे ? हे राम ! जब तक अज्ञान है, तब तक इच्छा नष्ट नहीं होती और कर्म भी नष्ट नहीं होते। नाश दोनों का नहीं होता, परन्तु भेद इतना ही है कि अज्ञानी को भासित होता है कि यह इच्छा है, यह कर्म है। ज्ञानवान को सब ब्रह्म ही भासित होता है, इससे वह सुखी रहता है और अज्ञानी को कर्म में कर्म भासित होता है, इसलिए वह बन्धन में पड़ता है। कर्म में कर्मबुद्धि जाने को त्याग कहते हैं; क्रिया का त्याग करने को त्याग नहीं कहते। हे राम ! बड़ी उपाधि अहंकार है। जिसका अहंकार नष्ट हुआ है, वह पुरुष कर्म करता है तो भी उसने कर्त्ता कुछ नहीं किया। और जो अहंकारसहित है, वह पुरुष जो चुप हो बैठता है तो भी सब कर्म करता है। इस अहं के त्याग का नाम सर्वत्याग है; क्रिया के त्याग का नाम सर्वत्याग नहीं। सब कर्मों के बीज अहंकार को त्यागना और परम शान्ति को पाना ही पुरुषप्रयत्न है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे कर्मबीजदाहोपदेशं नाम शताधिकनवविंशत्तमस्सर्गः ॥ १२९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस संवेदन का होना ही अनर्थ है कि जीव अपने को कुछ जानता है। जब यह निवृत्त हो, तभी इसको आनन्द प्राप्त हो। हे राम ! ज्ञानी की चेष्टा अहंकार से रहित स्वाभाविक होती है। जैसे अर्धनिद्रित पुरुष होता है वैसे ही ज्ञानी अपने स्वरूप में मग्न रहता है। जैसे हाथी मद में उन्मत्त होता है, वैसे ही ज्ञानवान् स्वयंब्रह्म चिदानन्द में मग्न रहता है। जैसे कामी को काम का व्यसन होता है, वैसे ही सुन्दरूपी स्त्री को पाकर ज्ञानी मग्न रहता है क्योंकि वह निरहंकार है। सब दुःखों का बीज अहंकार है। जब अहंकार नष्ट हो तब आनन्द हो। हे राम ! संसाररूपी विष की बेलि का बीज अहंकार है। जब अहंकार का अभाव हो, तब संसार का भी अभाव होता है। हे राम ! अहंकार ही दुःख का मूल है। इस संवेदन का विस्मरण बड़ा कल्याणकारक है। अनात्मा में मिलकर अपने को मानना या अहंभाव ही अनर्थ है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो वस्तु असत
✴ निर्वाण प्रकरण ✴ ३८७
है, वह नहीं होती और जो सत्य है उसका अभाव नहीं होता । फिर आप कैसे कहते हैं कि अहं संवेदन का नाश करो ? ये तो सत् भासित होते हैं, इनका नाश कैसे हो ?
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम सच कहते हो कि जो वस्तु असत्य है, वह नहीं होती और जो सत्य है, उसका नाश नहीं होता । हे राम ! यह जो अहंकार दृश्य तुमको भासित होता है, सो कभी नहीं हुआ, मिथ्या कल्पित है । जैसे रस्सी में सर्प होता है, वैसे ही आत्मा में अहंकार है और जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा में अहंकार का शब्द अर्थ फुरता है । यह शब्द और अर्थ मिथ्या है । इसका लक्षण यह है कि मैं हूँ सो कल्पित है; आत्मा केवल शुद्धस्वरूप है; उसमें अहं-त्वं का शब्द अर्थ कोई नहीं । ये अबोध से भासित होते हैं और बोध में लीन हो जाते हैं । वेदना का बोध अनर्थ का कारण है और अबोध तम है । जब यह निर्वाण हो, तब कर्म का बीज मूल से कटे । हे राम ! जो कर्मों का त्यागकर एकान्त में जाकर बैठता है, और ऐसे मानता है कि मैं कर्म नहीं करता, वह केवल मुख से कहता ही है, पर वास्तव में अहंकारयुक्त है, इससे फल को भोगता ही है; क्योंकि अहंकार सहित जीव फिर कर्म करेगा । वह आत्मज्ञान बिना अनात्म में मिलकर अपने को कर्ता भोक्ता आदि मानता है । जो पुरुष कर्म-इन्द्रियों से चेष्टा करता है और आत्मा को लिप्त नहीं जानता, वह अकर्ता ही है—उसके करने से कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होते और न करने से भी नहीं होते । ऐसा पुरुष परम निर्वाणपद को प्राप्त होता है, जिस पद में वाणी की गति नहीं । हे राम ! उसमें स्फुरण कोई नहीं—केवल चमत्कार है, अर्थात् हुआ कुछ नहीं और भासित होता है । जैसे बेल की मज्जा बेल से भिन्न नहीं, वैसे ही यह जगत् है । जैसे सोने से भूषण भिन्न नहीं, वैसे ही निज शब्द का अर्थ है; पर ये भिन्न-भिन्न शब्द अर्थ तब तक भासित होते हैं, जब तक अहं वेदना है । हे राम ! आत्मपद सदा अपने आपमें स्थित है । जैसे पत्थर अपनी जड़ता में स्थित है, वैसे ही आत्मा चैतन्य घनता में स्थित है ।
३८८ ( योगवासिष्ठ )
उसको मुनीश्वर चैतन्य मात्र कहते हैं। उस अपने स्वरूप के प्रमाद से ही जीव दुख पाता है।
हे राम ! जो पुरुष गृहस्था में स्थित है, पर अहंकार से रहित है, उसको वनवासी जानो, उसे सदा एकान्त है। और जो वनवासी अहँ-कार-सहित है, वह सदा जनों में स्थित है। प्रथम तो वह एक गढ़े में था, फिर उसको त्यागकर दूसरे गढ़े में पड़ा है; अर्थात् वेषधारी है और बनवास लिया है। ईश्वर चाहे तो निकाले नहीं, क्योंकि बड़े कूप में पड़ा है। हे राम ! जो पुरुष अर्थत्याग करता है या एक अङ्ग का त्याग करता है और दूसरे को अङ्गीकार करता है, ऐसा पुरुष अपने को निष्काम मानता है, पर उसको यह त्यागरूपी पिशाचिनी भोगती है। हे राम ! यह जीव निष्कर्म तभी होता है, जब इसकी अहँवेदना नष्ट होती है, अन्यथा नहीं होता। इससे कर्म को मूल से उखाड़ो। जैसे कुल्हाड़ा बेलि और वृक्ष को मूल से काटता है, वैसे ही काटो। अहँवेदना ही मूल है, उसको काटना चाहिए।
हे राम ! पुरुषप्रयत्न उसी का नाम है कि अपने अहँ का नाश करना और आपही शेष रहना। देह से भिन्न हुआ जीव अपने को कर्त्ता-भोक्ता जानता है। उस अहँ का नाश करना और शिवपद को प्राप्त होना एक ही बात है। जो सर्वदा मङ्गलरूप अद्वैत है—यह विश्व भी उसका चमत्कार है। जैसे नारियल में खोपड़ा होता और उसके बहुत नाम रखते हैं, सो नारियल से कुछ भिन्न नहीं, वैसे ही संसार आत्मा से भिन्न नहीं। जैसे खम्भे में काष्ठ से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह संसार है। यह नानात्व भी चैतन्य घन आत्मा ही है। निज अक्षर का जो अर्थ कहा है, वह भी जब यही है, तब विधि-निषेध किसका कीजिये ? सब परमात्मतत्त्व है, दूसरा नहीं। हे राम ! ऐसे आत्मा को जानकर सुख से विचरो। जैसे अर्द्धनिद्रित की चेष्टा होती है और जैसे बालक पालने में सोकर स्वाभाविक अङ्ग हिलाता है, वैसे ही तुम्हारी चेष्टा होगी, अपने देह का अभिमान तुम न करो। हे राम ! जो कुछ भाव-अभाव पदार्थ भिन्न-भिन्न भासित होते हैं, वे
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असत्य है। आत्मा का साक्षात्कार होने पर परमात्मतत्त्व ही भासित होगा, तब अहंकार का उत्थान निवृत्त होगा। हे राम ! एक और युक्ति सुनो, जिससे आत्मज्ञान होगा। यह जो अहं-अहं क्षण-क्षण में फुरता है, सो जब फुरे तभी उस क्षण में जानो कि मैं नहीं हूँ। जब ऐसे दृढ़ होगे, तब अहंकाररूपी पिशाच का नाश हो जावेगा और आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होगा। इससे अहंकार के नाश का यत्न कर सोचो कि 'न मैं हूँ' 'न जगत् है'। हे राम ! ज्ञान इसी का नाम है कि 'अहं', 'मम' न रहे। उसको मुनीश्वर परब्रह्म और सम्यक्पद कहते हैं। और जहाँ अहं-मम है, वहाँ अविद्यारूपी तम है। हे राम ! अज्ञानी के हृदय में सब पदार्थों का भाव स्थित है, इससे उसको देश, काल, घर, नगर, मनुष्य, पशु, पक्षी आदिक त्रिगुणमय संसार भासित होता है। जब इनका अभाव हो जाय, तब शान्तिपद की प्राप्ति हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अहंकारनाशविचारो नाम शताधिकत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३० ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिसके मन से 'मैं' और 'मेरे' का अभिमान चला गया है, उसको शान्ति हुई है। जिसके हृदय में 'मैं' 'देह' 'मेरे सम्बन्धी', 'गृह' आदिक का अभिमान है, उसको कदापि शान्ति नहीं, और शान्ति बिना सुख नहीं। हे राम ! प्रथम आप बनता है, तब जगत् है। जो आप न बने तो जगत् कहाँ हो ? इसका होना ही अनर्थ का कारण है। जिस पुरुष ने अहंकार का त्याग किया है, वह सर्वत्यागी है। जिसने अहंकार का त्याग नहीं किया, उसने कुछ नहीं त्यागा। जिसने क्रिया का त्याग किया और अपने को सर्वत्यागी मानता है, उसका यह विचार मिथ्या है। जैसे वृक्ष की डालें काटिये तो वह फिर उगता है, उसका नाश नहीं होता, वैसे ही कर्म के त्याग से त्याग नहीं होता। जो त्यागने योग्य अहंकार नहीं नष्ट होता तो कर्म फिर उपजते हैं। इससे अहंकार का त्याग करो, तब सर्वत्यागी होगे। इसका नाम महात्याग है। तब स्वप्न में भी संसार न भासित होगा। जाग्रत् का क्या कहना है। उसको संसार का ज्ञान कदापि
३४० * योगवाशिष्ठ *
नहीं होता । हे राम ! संसार का बीज अहंभाव है, उसी से स्थावर-जङ्गम जगत भासता है । जब इसका नाश हुआ, तब जगतभ्रम मिट जाता है, इससे इसके अभाव की भावना करो । जब तुम्हें अहँ की भावना फुरे तो जानो कि मैं नहीं हूँ । जब इस प्रकार अहंकार का अभाव हुआ तब पीछे जो शेष रहेगा, वही आत्मपद है । हे राम ! सब अनर्थों का कारण अहंभाव है, उसका त्याग करो ।
हे राम ! शस्त्र के प्रहार और व्याधि को यह जीव सह सकता है तो इस अहँ के त्यागने में क्या कदर्थना है । हे राम ! संसार का बीज अहँ का सद्भाव है, उसका नाश करना मानो संसार का मूलसंयुक्त नाश करना है—इसी के नाश का उपाय करो । जिसका अहंभाव नष्ट हुआ है, उसको सब ठौर आकाशरूप है । उसके हृदय में संसार की सत्ता नहीं फुरती । चाहे वह गृहस्थ हो तो भी उसको यह प्रपञ्च शून्य बन जाता है । जो अहंकार सहित वन में जा बैठे तो भी वह जनों के समूह में बैठा है; क्योंकि उसका अज्ञान नष्ट नहीं हुआ । जिसने मन सहित षट् इन्द्रियों को वश नहीं किया, उसको मेरी कथा के सुनने का अधिकार नहीं—वह पशु है । जिस पुरुष ने मन को जीता है, अथवा दिन प्रतिदिन जीतने की इच्छा करता है, वह पुरुष है । और जो इन्द्रियों का विश्रामी अर्थात् क्रोध, लोभ, मोह से सम्पन्न है वह पशु है और महाअन्धतम को प्राप्त होता है । हे राम ! जो पुरुष ज्ञानवान् है, उसमें यदि इच्छा दिखती है तो भी वह उसकी इच्छा अनिच्छा ही है और उसके कर्म अकर्म ही हैं । जैसे भुना दाना फिर नहीं उगता, पर उसका आकार भासित होता है वैसे ही ज्ञानवान् की चेष्टा देखने मात्र को होती है, उसके हृदय में वासना नहीं होती । हे राम ! जो पुरुष इन्द्रियों से चेष्टा करता है और हृदय में जगत की सत्यता नहीं मानता, उसे कोई बन्धन नहीं होता और जो जगत को सत्य मानकर थोड़ा ही कर्म करता है, तो भी वह फँस जाता है-जैसे थोड़ी अग्नि जाग कर बहुत हो जाती है—ज्ञानी को बन्धन नहीं होता । उसका प्रारब्ध शेष है, यह भी वह हृदय में नहीं मानता और जानता है कि ये कर्म शरीर
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३६१
के हैं, आत्मा के नहीं। जैसे कुम्हार के चाक का वेग उतरता जाता है, वैसे ही उसका प्रारब्ध वेग उतरता जाता है और फिर जन्म नहीं होता; क्योंकि उसको अहंकाररूपी चरण नहीं लगता। इससे अहंकार का नाश करो। जब अहंकार नष्ट होगा, तब सबके आदि पद की प्राप्ति होगी, जो परम निर्वाणपद है और जिसमें निर्वाण का भी निर्वाण हो जाना है।
हे राम ! जब वर्षाकाल होता है, तब बादल होते हैं। जब शरत्काल आता है, तब बादल जाते रहते हैं। हे राम ! जबतक अज्ञानरूपी वर्षा-काल है, तब तक अहंकाररूपी वर्षा है। जब विचाररूपी शरत्काल आवेगा, तब अहंकाररूपी मेघ जाते रहेंगे और आत्मरूपी आकाश निर्मल भासित होगा। हे राम ! जैसे मलिन दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब उज्ज्वल नहीं दिखता, और जब मैल मिटता है, तब मुख का प्रतिबिम्ब स्पष्ट प्रत्यक्ष दिखता है, वैसे ही अहंकाररूपी मैल से जीव ढका हुआ है, इससे आत्मा नहीं दिखता; जब अहंकाररूपी मैल हटेगा, तब आत्मा ज्यों का त्यों दिखेगा। जैसे समुद्र में नाना प्रकार के तरङ्ग उठते हैं सो सम्यक्दर्शी को सब जलमय देख पड़ते हैं, और भूषण में सुवर्ण ही भासित होता है, वैसे ही नाना प्रकार के प्रपञ्च उस सम्यक्दर्शी को चैतन्य-घन आत्मा ही देख पड़ते हैं—वह आत्मा से भिन्न कुछ नहीं देखता। वह पत्थर की शिला के समान हो जाता है, क्योंकि उसका अहंकार नष्ट हो गया है। अहंकार-संयुक्त है और क्रिया का त्यागकर अपने को सुखी मानता है, वह मूर्ख है। जैसे कोई लकड़ी लेकर आकाश का नाश किया चाहे तो वह नष्ट नहीं होता, वैसे ही क्रिया के त्याग से दुःख नष्ट नहीं होते। जब सम्पूर्ण संसार और कर्म के बीज अहंकार का नाश हो, तब अक्रिय आत्मस्वरूप को प्राप्त होता है।
जैसे ताँबा अपने ताम्रभाव को त्यागकर सुवर्ण होता है, वैसे ही जब जीव अपना जीवत्व त्यागता है, तब आत्मा होता है। जैसे तेल की बूँद जल में फैल जाती है और नाना प्रकार के रङ्ग जल में दिखते हैं, वैसे ही ब्रह्म में अनेक प्रकार की कलना दिखाई देती है—आत्मा ब्रह्म, निराकार, निरञ्जन इत्यादि का नाम भी अहंकार से शुद्ध आत्मा में
३६२ ❊ योगवाशिष्ट ❊
कल्पित हुए हैं। वह तो निष्क्रिय केवल सत्तामात्र है और सत्य और असत्य की तरह स्थित है। हे राम ! संसार एक मिर्च का पेड़ है अथवा संसार एक फूल है। उसमें अहंतारूपी सुगन्ध है। जब अहंता उदय होती है, तब संसार क्षण में उदय होता है और अहंता का नाश होने पर संसार क्षण भर में नष्ट हो जाता है। क्षण में उदय और क्षण में नाश होता है। सो अहंता का होना ही उदय होने का क्षण है और अहंता का लीन होना नाश का क्षण।
हे राम ! जैसे मृत्तिका में जल के संयोग से घट बनता है, तब मृत्तिका घटसंज्ञा पाती है, वैसे ही पुरुष को जब अहंकार का संग होता है तब संसारी होता है और जीवसंज्ञा पाता है। वह देश, काल, पृथ्वी, पर्वत आदिक दृश्य को प्रत्यक्ष देखता है। जब अहंता का नाश होता है तब वह सुखी होता है। निदान जो कुछ नाम और उसका अर्थ है सो अहंता में भासित होता है। जब अहंता को त्यागता है, तब शान्तरूप आत्मा ही शेष रहता है। जैसे पवन से रहित दीपक प्रकाशित होता है, वैसे ही अहंकाररूपी पवन से रहित जीव अपने स्वभाव में स्थित होकर आनन्द-पद को प्राप्त होता है, अनादि पद पाता है, सबका अपना रूप होता है और अपने में देश, काल, वस्तु देखता है। हे राम ! जब तक अहंता का नाश नहीं होता, तबतक मेरे वचन हृदय में न जमेंगे। जैसे रेत में तेल निकलना कठिन है, वैसे ही जिस पुरुष ने अपना स्वभाव नहीं जाना, उसके लिए ब्रह्म को पाना कठिन है। अपना स्वभाव जानना अति सुगम है। जब अहंता का त्याग करे कि न मैं हूँ और न जगत है, तब कल्याण होता है; तहीं अहंता का नाश होता है और कोई भ्रम नहीं रहता, जैसे गर्मी के जाने से सर्पभ्रम निवृत्त हो जाता है। जब तक अहंता फुरती है, तब तक उसको उपदेश नहीं लगता। जैसे आरसी पर मोती नहीं ठहरता वैसे ही जिसको अहंता फुरती है, उसके हृदय में मेरे वचन नहीं ठहरते। और जिसका हृदय शुद्ध है, उसको मेरे वचन लगते हैं। जैसे तेल की बूँद जल में फैल जाती है, वैसे ही उसको थोड़े वचन भी बहुत लगते हैं।
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ <span style="float:right;">३६३</span>
हे राम ! इसी प्रसंग में एक पुरातन इतिहास कहता हूँ सो तुम सुनो। वह मेरा और काकभुशुण्डि का संवाद है। एक समय में सुमेरु पर्वत के शिखर पर गया तो वहाँ भुशुण्डि बैठा था। उससे मैंने प्रश्न किया कि हे अङ्ग ! ऐसा भी कोई पुरुष देखा है, जिसकी आयु बड़ी हो और ज्ञान मे शून्य रहा हो ? जो देखा हो तो कहो। भुशुण्डि बोले, हे भगवन् ! एक विद्याधर था, जिसकी बड़ी आयु थी और जिसने बहुत विद्याध्ययन किया था। वह सत्कर्मों को बहुत करता था। उसने बहुत भोग भोगे थे और चार युग पर्यन्त जप, तप, नियम आदिक सकाम कर्म किये थे। जब चतुर्थ युग का अन्त हुआ, तब उसने विचार किया और जितने भोग सुखरूप जानकर भोगता था, उनमें उसको वैराग्य हुआ।
तब उनको त्यागकर लोकालोक पर्वत पर गया और विचार कि यह संसार असाररूप है, किसी प्रकार इममे छूटूँ। इसमें बारम्बार जन्म और मरण होता है। यहाँ का कोई पदार्थ सत्य नहीं, किसका आश्रय ग्रहण करूँ ? ऐसे विचार करके वह विकृत आत्मावाला पुरुष सुमेरुपर्वत पर मेरे पास आया और सिर झुकाकर मुझे दण्डवत् की। मैंने भी उसका बहुत आदर किया। तब हाथ जोड़कर उसने कहा, हे भगवन् ! इतने काल तक मैं विषयों को भोगता रहा, परन्तु मुझे शान्ति न हुई इससे मैं दुःखी हूँ। तुम कृपा करके शान्ति का उपाय कहो। हे भगवन् ! चित्ररथ के बाग में, जिसमें सदाशिवजी रहते हैं और जहाँ बहुत कल्पवृक्ष हैं, मैं चिरकाल रहा; फिर विद्याधरों के स्वर्ग में रहा; फिर इन्द्र के नन्दनवन और सुवर्ण की कन्दरा में रहकर सुन्दर अप्सराओं के साथ विहार किया और विमान पर बहुत घूमा हूँ। हे भगवन् ! बहुत स्थान मैंने देखे हैं और तप, दान, यज्ञ, व्रत भी बहुत किये हैं। सहस्र वर्ष तक ऐसे सुन्दर रूप देखता रहा हूँ, जिनकी सुन्दरता नहीं कह सकता, तो भी नेत्रों की तृप्ति नहीं हुई; बहुत सुगन्ध सूँघी, पर नासिका को तृप्ति न हुई; रसना मे भोजन बहुत प्रकार के खाये, पर शान्ति न हुई, बल्कि तृष्णा बढ़ती गई, कानों से बहुत प्रकार के शब्द
३६४ ✲ योगवाशिष्ठ ✲
और राग सुने और त्वचा में बहुत स्पर्श किये हैं, तो भी शान्ति न हुई ।
हे भगवन् ! में जिस ओर सुख जानकर जाता हूँ, उसी ओर दुःख प्राप्त होते हैं-जैसे मृग क्षुधा निवारने के लिए घाम खाने जाता है और राग सुनकर मूर्च्छित हो जाना है, तब उसको बधिक पकड़ लेता है तो मृग दुःख पाता है, वैसे ही मैं सुख जानकर विषयों को ग्रहण करता था और बड़े दुःखों को प्राप्त होता था। हे भगवन् ! मैंने चिरकाल तक पाँचों इन्द्रियों और छठे मन सहित दिव्यभोग भोगे हैं, जो कहे नहीं जा सकते, परन्तु मुझे शान्ति न हुई और न इन्द्रियाँ तृप्त हुईं । जैसे घृत से अग्नि तृप्त नहीं होती, वैसे ही दिन-दिन तृष्णा बढ़ती जाती है और हृदय जलाती है । जो पुरुष इन भोगों के निमित्त यत्न करता है कि में इनसे सुखी हूँगा, वह मूर्ख है और उसको धिक्कार है—वह समुद्र में तरंग को पकड़ता है। ये तब तक सुखरूप लगते हैं, जब तक इन्द्रियों और विषयों का संयोग है। जब इन्द्रियों से विषयों का वियोग होता है तब महादुःख होता है; क्योंकि तृष्णा हृदय में रहती है और भोग जाते रहते हैं। तब जो-जो विषय भोग होते हैं, वे दुःखदायक हो जाते हैं ।
हे भगवन् ! मैंने इसी से बहुत दुःख पाया है । यद्यपि इन्द्रियां कोमल हैं, तो भी सुमेरु की तरह कठिन हैं। कोमल लगती हैं, परन्तु ऐसी हैं जैसे सर्पिणी और खड्ग की धार कोमल होती है, पर स्पर्श करने से मनुष्य मर जाता है । जैसे जल में नाव पवन से घूमती है वैसे ही अज्ञानरूपी नदी में पवनरूपा इन्द्रियों ने मुझे दुःख दिया है हे भगवन् ! ऐसे पुरुष भी मैंने देखे, जो सारे दिन माँगते रहे और भोजन के निमित्त अन्न प्राप्त नहीं हुआ । और ऐसे भी देखे हैं कि उन्होंने ब्रह्मा से काष्ठ पर्यन्त सब भोग भोगे हैं। पर जिसको दिन में भोजनमात्र भी प्राप्त नहीं होता और जो सब इन्द्रियों के इष्टरूप भोगों को भोगता है; उन दोनों को भस्म होते देखा है । भस्म दोनों की तुल्य होती है-विशेषता कुछ नहीं । इन्द्रियों के बन्धन में बारम्बार जन्मते-मरते अज्ञानी पुरुष शान्ति नहीं पाते । जो तुम कहो कि तू तो सुखी देख पड़ता है
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३६५
तुझे क्या दुःख है तो हे भगवन् ! वह दुःख देखने में नहीं आता; परन्तु मेरा हृदय जलता है । हे भगवन् ! ब्रह्मा के लोक में मैंने बड़े सुख देखे हैं, परन्तु वहाँ भी दुःखी ही रहा हूँ; क्योंकि क्षय और अतिशय वहाँ भी रहता है । इससे वहाँ के निवासी भी जलते हैं । इन्द्रियों का शस्त्र से भी कठिन घाव होता है । ये जो संसार का नाना प्रकार की विषमता देख पड़ती हैं और उनमें सर्वदा रागद्वेष रहता है, इससे मैं बहुत जलता रहा हूँ । इससे मुझसे वही उपाय कहिये, जिससे मैं शान्ति पाऊँ । वह कौन सुख है, जिससे फिर दुःखी न होऊँ, जिसका कदापि नाश न हो और जो आदि अन्त से रहित हो । चाहे उसके पाने में कष्ट हो तो मैं यत्न करूँगा कि वह किसी प्रकार मुझे प्राप्त हो ।
हे मुनीश्वर ! इन्द्रियों ने मुझे बड़ा कष्ट दिया है । ये इन्द्रियाँ गुण-रूपी वृक्ष के लिए अग्नि हैं; शुभ गुणों को जलाती हैं । ये विचार, धैर्य, सन्तोष शान्ति आदिक गुणरूपी वृक्ष का नाश करनेवाली हैं । हे भगवन् ! इन्होंने मुझे दुःख दिया है । जैसे मृग का बच्चा सिंह के सामने पड़े तो वह उसका मर्दन करता है, वैसे ही इन्द्रियों ने मुझे मारा है । हे भगवन् ! जिस पुरुष ने इन्द्रियों को वश में किया है उसका पूजन सब देवता करते हैं और उसके दर्शन की इच्छा रखते हैं और जिसने मन को नहीं वश किया उसको दीन जानते हैं । जिस पुरुष ने इन्द्रियों को वश किया है, वह सुमेरु पर्वत की तरह अपनी गम्भीरता में स्थित है और जिसने इन्द्रियाँ वश नहीं कीं, वह तृण की तरह तुच्छ है । जिसको इन्द्रियों के विषयों में सदा तृष्णा रहती है, वह पशु है; उसको धिक्कार है । हे मुनीश्वर ! चाहे बड़ा महन्त भी हो, यदि उसके इन्द्रियाँ वश नहीं तो वह महानीच है । हे मुनीश्वर ! इन्द्रियों ने मुझे बड़ा दुःख दिया है । जैसे महाशून्य उजाड़ में चोर लूट लेते हैं, वैसे ही इन्द्रियों ने मुझे लूट लिया है । इन्द्रिय-रूपिणी सर्पिणी में तृष्णारूपी विष है । इससे इनके द्वारा सारा विश्व मोहित देख पड़ता है, कोई विरला ही इनमें न द्वारा होगा । ये इन्द्रियाँ दुष्ट हैं, जो अपने-अपने विषय को लेती हैं, और को नहीं देतीं । ये
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तुच्छ और जड़ है । जैसे बिजुली का प्रकाश होता है और फिर छिप जाता है; वैसे ही इन्द्रियों के सुख अणमात्र दिखाई देते हैं और फिर छिप जाते हैं ।
जबतक इन्द्रियों और विषयों का संयोग है, तबतक सुख मिलता है । जब इनका वियोग होता है, तब दुःख उत्पन्न होता है, क्योंकि तृष्णा रहती है । एक सेना है, उसमें इन्द्रियों के भोग उन्मत्त हाथी हैं, जिनके तृष्णारूपी जंजीर है । इन्द्रियाँ रथ हैं; नाना प्रकार के विषय घोड़े हैं । इस पर संकल्प-विकल्परूपी खड्गों को धारण किये अहंकार उस पर सवार है । ये जो काम अहंकार के साथ होते हैं, वे ही शस्त्रों के समूह हैं । हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष ने इस सेना को नहीं जीता वह मोहरूपी अन्धे कुएँ में गिरकर कष्ट पाता है, और जिसने जीत लिया है, वह परमसुख को प्राप्त होता है । हे मुनीश्वर ! ये इन्द्रियाँ भोग की इच्छारूपी गाड़े में अहंकाररूपी राजा को डाल देती हैं । उसमें से निकलना कठिन होता है ।
जिस पुरुष ने इनको जीता है, उसकी त्रिलोकी में जय होती है, और जिसने नहीं जीता, वह महादीनता को प्राप्त होता है, और जन्म-जन्मान्तर पाता है । इन इन्द्रियों में रजोगुण और तमोगुण रहता है ये तबतक दाह देती हैं, जबतक रज-तम वृत्ति है । यह भी मन की वृत्ति है । जब इनका अभाव होता है, तब शान्ति प्राप्त होती है । यह खोज करके देखा है कि इन्द्रियाँ तप, यज्ञ, व्रत, तीर्थ और किसी औषध से वश नहीं होतीं और न इनके वश करने का कोई उपाय है । केवल सन्तों के संग से जब वासना को छोड़े, तब वश होती हैं । इससे मैं तुम्हारी शरण हूँ; कृपा करके मुझे आपदा के समुद्र से निकालो; क्योंकि मैं उसमें डूब रहा हूँ । मैं इस संसारसमुद्र में दीन हूँ, तुम पार करो । तुम्हारी महिमा मैंने सन्तों से भी सुनी है । हे भगवन् ! जो कोई सब आयु पर्यन्त विषयों के दिव्य भोग भोगता रहे और इनसे शान्ति चाहे तो न प्राप्त होगी । बड़े सुख और दुःख, दोनों समान हैं । आकाशचारी सिद्ध भी इन्द्रियों को वश नहीं कर सकते, इससे दीन और
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हो जायगा । संसाररूपी वृक्ष के सुमेरु आदिक पर्वत पत्ते हैं; तारागण कली और फूल हैं; मानों समुद्र रस हैं; जन्म-मरण बेल है; सुख-दुःख फल हैं और वह आकाश, दिशा, पाताल को धारण किये स्थित है । अहंकाररूपी वृक्ष पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ है; अहंकार ही उसका बीज है । यह वृक्ष मिथ्या भ्रममात्र, असत्य और सत्य की नाईं स्थित है । इससे अहंकाररूप बीज का नाश करो और निरहंकाररूपी अग्नि में इसको जलाओ, तब इसका अत्यन्त अभाव हो जावेगा । यह भ्रम के कारण भय देता है, जैसे रस्सी में सर्पभ्रम डराता है । इससे निरहंकार-रूपी अग्नि से उसका नाश करो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकद्वार्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३२ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह ज्ञान जैसे उत्पन्न होता है सो सुनो । ब्रह्मविद्या-शास्त्र के सुनने और आत्मविचार से यह उपजता है । उस आत्मज्ञानरूपी अग्नि में संसाररूपी वृक्ष को जलाओ । यह आगे भी नहीं था, असत्त्वहीन ही उदय हुआ है और मन के संकल्प से विद्यमान की नाईं स्थित है । जैसे पत्थर में शिल्पी कल्पना करता है कि इतनी पुतलियाँ निकलेंगी, सो हुई कुछ नहीं; वैसे ही मनरूपी शिल्पी यह विश्वरूपी पुतलियाँ कल्पना में लाता है । जब मन का नाश करोगे, तब संसारभ्रम मिट जावेगा; आत्मविचार करके परमपद को प्राप्त होगे और अपना रूप परमात्मारूप प्रत्यक्ष भासित होगा । इससे अहंता को त्याग कर अपने स्वरूप में स्थित होओ । हे विद्याधर ! यह संसाररूपी वृक्ष अहंतारूपी बीज से उपजता है । उसको जब ज्ञानरूपी अग्नि से जलाओगे, तब फिर यह जगत् न उपजेगा । यदि इसको विचार करके देखिये, तो अहं-त्व नहीं रहता ।
हे विद्याधर ! यह अहं-त्व मिथ्या है—इसके अभाव की भावना करो यही उत्तम ज्ञान है । हे साधो ! जब गुरु के वचन सुनकर उनके अनु-सार पुरुषार्थ करे, तब परमपद को प्राप्त होता है और जय होती है । हे विद्यारूपी कन्दरा को धारण करनेवाले, पर्वत, और विद्यारूपी पृथ्वी को धारण करनेवाले शेषनाग ! यह संसार एक आडम्बर है । इसके
❋ निर्वाण प्रकरण ❋
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सुमेरु जैसे कई खम्भे हैं जो रत्नों की पंक्ति से जड़े हुए हैं। बन, दिशा, पहाड़, वृक्ष, कन्दरा, वैताल, देवता, पाताल, आकाश, इत्यादिक सारा ब्रह्माण्ड उनके ऊपर स्थित है। रात्रि, दिन, भूत, प्राणी और इनके जो घर हैं सो चौपड़ के खाने हैं। जो जैसा कर्म करता है, वह उसके अनुसार दुःख-सुख भोगता है। ऐसे ही यह जो क्रियासंयुक्त सम्पूर्ण प्रपञ्च दिखाई देता है सो भ्रम से सिद्ध है—इसलिए मिथ्या है। जैसे स्वप्न की सृष्टि संकल्प से भासित होती है, वैसे ही यह सृष्टि भी भ्रम से भासित होती है और अज्ञान की रची हुई है। आत्मा के अज्ञान से भासित होती है और आत्मा के ज्ञान से लीन हो जाती है। जब सृष्टि है तब भी परमात्मतत्त्व ही है और जब सृष्टि न होगी तब भी परमात्मतत्त्व ही होगा। आगे भी वही था। यह जो कुछ प्रपञ्च तुझे दीखता है सो शून्य आकाश ही है। त्रिगुणमय प्रपञ्च गुणों का रचा हुआ अपने स्वरूप के प्रमाद से स्थित हुआ है। आत्मज्ञान से यह शून्य सदृश हो जावेगा। जब प्रपञ्च ही शून्य हुआ, तब आत्मा और अनात्मा का कहना भी न रहेगा। पीछे जो शेष रहेगा, वह केवल शुद्ध परमतत्त्व और तेरा अपना रूप है। उसमें स्थित हो रहे और दृश्य का त्याग-कर। यह विचार कि न मैं हूँ और न जगत् है। जब तू ऐसा होगा, तब तेरी जय होगी। आत्मपद सबसे उत्तम है। जब तू आत्मपद में स्थित होगा, तब सबसे उत्तम होगा और तेरी जय होगी—इससे आत्मपद में ही स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे संगराडम्बरोत्पत्ति-
नाम शताधिकत्रयस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३३ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह प्रपञ्च भी आत्मा का चमत्कार है। आत्मा शुद्ध चैतन्य है, जिसमें जड़ और चेतन स्थित हैं। वह सबका अधिष्ठान है। वह सत्तामात्र तेरा अपना रूप है। वह अहं-त्वं शब्द-अर्थ से रहित आत्मतत्त्वमात्र है, पर सत्यस्वरूप होकर असत्य की भाँति स्थित है। हे विद्याधर ! तू इस जड़ और चेतन से अबोध हो रह। जब तू अबोध होगा, तब शान्त और चिद्घन होगा। ये जो
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जड़ और चेतन हैं, इन दोनों का परमार्थ चैतन्य के ऊपर आवरण है। यद्यपि वह अदृश्य है तो भी इनके भीतर ही रहता है, जैसे समुद्र के भीतर बड़वाग्नि रहती है। इन जड़-चेतन रूपों का कारणरूप वही है। इनकी उत्पत्ति भी उर्मी में होती है, और नाश भी वही करता है। हे विद्याधर ! जब ऐसे जाना कि मैं चेतनरूप भी नहीं और जड़ भी नहीं तो पीछे जो रहेगा, वही तेरा स्वरूप है। जब तेरे भीतर इन जड़ और चेतन, दोनों का स्पर्श नहीं हुआ, तब सबके भीतर जो चैतन्य है, वही ब्रह्म तुझे भासित होगा। विश्व और आत्मा में कुछ अन्तर नहीं हुआ। जैसे सूर्य की किरणों का चमत्कार जलाभास होना है, वैसे ही शुद्ध चैतन्य का चमत्कार विश्व होकर दिखता है।
हे अङ्ग ! जैसे दीवाल पर पुतलियाँ लिखी होती हैं तो वे दीवाल में भिन्न चितेरे ने नहीं लिखी हैं, वैसे ही शून्य आकाश में चित्तरूपी चितेरे ने विश्वरूपी पुतलियों की कल्पना की है। जैसे सुवर्ण कल्पित भूषण सुवर्ण से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा में अज्ञान से जो विश्व देखते हैं, वह आत्मा से भिन्न नहीं। जगत, ब्रह्म, आत्मा, आकाश, देश, काल सब उर्मी तत्त्व की संज्ञा है। वही शुद्ध चैतन्य आकाश है, जिसका चमत्कार ऐसे स्थित है। उर्मी तत्त्व में तू भी स्थित हो रह। यह जगत् ऐसे है, जैसे दूर-दृष्टि से आकाश में बादल हाथी की सूँड़ से लगते हैं। यह जो अहँ-त्वं-रूप जगत् है सो अबोध से भासित होता और बोध से लीन हो जाना है—जैसे मरुस्थल में सूर्य की किरणों में जल दिखता है, वैसे ही यह जगत् है—इससे इसका त्याग करो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्तचमत्कारो नाम शताधिकचतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३४ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह सब स्थावर जङ्गम जगत् आत्मा में उत्पन्न हुआ है और आत्मा ही में स्थित है। आत्मा ही विश्व में स्थित है। जैसे स्वप्न का विश्व स्वप्न देखनेवाले में स्थित होता है। आत्मा किसी का कारण नहीं; क्योंकि अद्वैत है। हे अङ्ग ! जो तू उस पद के पाने की इच्छा करता है तो तू ऐसा निश्चय कर कि न मैं हूँ और
❉ निर्वाण प्रकरण ❉
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न यह जगत् है। जब तू ऐसा जानेगा, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी, जो कि देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है। सर्वत्र सब वही परमात्मतत्त्व है। जगत् का कर्त्ता संकल्प ही है; क्योंकि संकल्प से जगत् उत्पन्न होता है। जैसे पवन से अग्नि उत्पन्न होता है और पवन ही से दीपक का निर्वाण होता है, वैसे ही जब संकल्प बहिर्मुख फुरता है, तब संसार उदय हो भासित होता है, और जब संकल्प अन्तर्मुख होता है, तब आत्मपद प्राप्त होता है, सब प्रपञ्च उर्मी में लय हो जाता है। इस प्रकार संसार की नाना प्रकार की संज्ञाएँ फुरने से ही होती हैं, स्वरूप में कुछ नहीं है। न सत्य है, न असत्य है, न स्वतः है, न अन्य से है। यह सब कल्पनामात्र है। सत्, असत् और स्वतः, अन्य का जब अभाव हुआ, तब वहाँ अहं-त्व कहाँ मिलेंगे? वह है नहीं और बालक के यक्षवत् भ्रममात्र है।
हे साधो ! जहाँ अहं-त्व नष्ट हो गये, वहाँ जो सत्ता बची वही परमपद है। जहाँ जगत् का भ्रम है, वहाँ वह विचार से लीन हो जाता है। वास्तव में पूछो तो ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं—नाम-मात्र दो हैं—जैसे घट और कुम्भ—परन्तु भ्रम से नानात्व भासित होता है। जैसे समुद्र में उठनेवाले आवर्त्त और तरङ्ग जल से कुछ भिन्न नहीं और पवन के संयोग से उनके आकार भासित होते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् कुछ भिन्न नहीं। संकल्प के उठने से नाना प्रकार का जगत् भासित होता है। हे अङ्ग ! संकल्प के साथ मिलकर चित्त जैसी भावना करता है, वैसा ही अपना रूप देखता है स्वरूप में कुछ भिन्न नहीं, परन्तु जीव भावना से और का और देखता है। जैसे शुद्ध मणि के निकट कोई रङ्ग रखिये, वैसा ही रंग भासित होता है, पर मणि में कोई रङ्ग नहीं होता, वैसे ही चित्त शक्ति में कुछ हुआ नहीं, पर हुए की नाईं स्थित है। इससे अपने स्वरूप की भावना करो और जड़ चैतन्य को छोड़कर शुद्ध चैतन्य में स्थित होओ। जब ऐसे जानकर अपने स्वरूप में स्थित होगे, तब तुम्हें उत्थान में भी अपना स्वरूप दिखेगा। जैसे स्थिर समुद्र में जो तरङ्ग उठते हैं, वे कारणरूप जल के
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विना नो नहीं होते, वैसे ही कारणरूप ब्रह्म विना जगत् नहीं है; परन्तु ब्रह्मसत्ता अकर्ता, अद्वैत और अच्युत है। इसी से कहा है कि ब्रह्म अकर्ता है और जगत् अकारणरूप है। जो जगत् अकारणरूप है सो वह न उपजता है और न नाश होता है—मरुस्थल के जल की तरह भ्रममात्र है। इसी से कहा है कि जगत् कुछ वस्तु नहीं, केवल अज, अच्युत और शान्तरूप आत्मतत्त्व ही अखण्डित स्थित है और शिला कोश की तरह अद्वैत चिन्मात्र है। जिसके हृदय में चिन्मात्र की भावना नहीं, उस मूर्ख को हम क्या कहें ! हे साधो ! वास्तव में परमार्थ दृष्टि से कुछ भी नहीं बना, पर जहाँ-जहाँ मन है, वहाँ-वहाँ अनेक जगत् हैं। तृण से सुमेरु तक सब जगत् में हैं। जो विचारकर देखिये तो सब वही ब्रह्मरूप है, और कुछ नहीं। जैसे सुवर्ण को जान लेने से भूषण भी सुवर्ण भासित होता है, वैसे ही केवल सत्ता समानपद एक अद्वैत है, भिन्न कुछ नहीं। और भिन्न-भिन्न संज्ञाएँ भी वही हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकपञ्चत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥१३५॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! जब आत्मपद प्राप्त होता है, तब ऐसी अवस्था होती है कि जो नग्न शरीर हो और उस पर बहुत शस्त्रों की वर्षा हो तो भी उसमें जीव दुःखी नहीं होता और सुन्दर अप्सरा कण्ठ से लगे तो हर्ष नहीं होता, अर्थात् दोनों ही में समदर्शी रहता है। हे विद्याधर ! तब तक आत्मपद का अभ्यास करे, जब तक संसार में सुषुप्ति की नाईं न हो जाय। अभ्यास ही से आत्मपद प्राप्त होगा। जब आत्मपद की प्राप्ति होगी, तब पाञ्चभौतिक शरीर को ताप या ज्वर स्पर्श न करेंगे, और यदि शरीर के हों भी, तो भी उनके अन्तःकरण में प्रवेश नहीं करते। वह केवल शान्तपद में स्थित रहता है—जैसे जल कमल को स्पर्श नहीं करता। हे देवपुत्र ! जब तक देहादि में अभ्यास है, तब तक आत्मा के प्रमाद से सुख-दुःख स्पर्श करते हैं। जब आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब सब प्रपञ्च भी आत्मरूप हो जाते हैं। हे विद्याधर ! जैसे कोई पुरुष विष-पान करता है तो उसको जलन और खाँसी होती है—यह अवस्था विष की है—विष से भिन्न और कुछ