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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1198, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1198

३४० * योगवाशिष्ठ *

नहीं होता । हे राम ! संसार का बीज अहंभाव है, उसी से स्थावर-जङ्गम जगत भासता है । जब इसका नाश हुआ, तब जगतभ्रम मिट जाता है, इससे इसके अभाव की भावना करो । जब तुम्हें अहँ की भावना फुरे तो जानो कि मैं नहीं हूँ । जब इस प्रकार अहंकार का अभाव हुआ तब पीछे जो शेष रहेगा, वही आत्मपद है । हे राम ! सब अनर्थों का कारण अहंभाव है, उसका त्याग करो ।

हे राम ! शस्त्र के प्रहार और व्याधि को यह जीव सह सकता है तो इस अहँ के त्यागने में क्या कदर्थना है । हे राम ! संसार का बीज अहँ का सद्भाव है, उसका नाश करना मानो संसार का मूलसंयुक्त नाश करना है—इसी के नाश का उपाय करो । जिसका अहंभाव नष्ट हुआ है, उसको सब ठौर आकाशरूप है । उसके हृदय में संसार की सत्ता नहीं फुरती । चाहे वह गृहस्थ हो तो भी उसको यह प्रपञ्च शून्य बन जाता है । जो अहंकार सहित वन में जा बैठे तो भी वह जनों के समूह में बैठा है; क्योंकि उसका अज्ञान नष्ट नहीं हुआ । जिसने मन सहित षट् इन्द्रियों को वश नहीं किया, उसको मेरी कथा के सुनने का अधिकार नहीं—वह पशु है । जिस पुरुष ने मन को जीता है, अथवा दिन प्रतिदिन जीतने की इच्छा करता है, वह पुरुष है । और जो इन्द्रियों का विश्रामी अर्थात् क्रोध, लोभ, मोह से सम्पन्न है वह पशु है और महाअन्धतम को प्राप्त होता है । हे राम ! जो पुरुष ज्ञानवान् है, उसमें यदि इच्छा दिखती है तो भी वह उसकी इच्छा अनिच्छा ही है और उसके कर्म अकर्म ही हैं । जैसे भुना दाना फिर नहीं उगता, पर उसका आकार भासित होता है वैसे ही ज्ञानवान् की चेष्टा देखने मात्र को होती है, उसके हृदय में वासना नहीं होती । हे राम ! जो पुरुष इन्द्रियों से चेष्टा करता है और हृदय में जगत की सत्यता नहीं मानता, उसे कोई बन्धन नहीं होता और जो जगत को सत्य मानकर थोड़ा ही कर्म करता है, तो भी वह फँस जाता है-जैसे थोड़ी अग्नि जाग कर बहुत हो जाती है—ज्ञानी को बन्धन नहीं होता । उसका प्रारब्ध शेष है, यह भी वह हृदय में नहीं मानता और जानता है कि ये कर्म शरीर