योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३६१
के हैं, आत्मा के नहीं। जैसे कुम्हार के चाक का वेग उतरता जाता है, वैसे ही उसका प्रारब्ध वेग उतरता जाता है और फिर जन्म नहीं होता; क्योंकि उसको अहंकाररूपी चरण नहीं लगता। इससे अहंकार का नाश करो। जब अहंकार नष्ट होगा, तब सबके आदि पद की प्राप्ति होगी, जो परम निर्वाणपद है और जिसमें निर्वाण का भी निर्वाण हो जाना है।
हे राम ! जब वर्षाकाल होता है, तब बादल होते हैं। जब शरत्काल आता है, तब बादल जाते रहते हैं। हे राम ! जबतक अज्ञानरूपी वर्षा-काल है, तब तक अहंकाररूपी वर्षा है। जब विचाररूपी शरत्काल आवेगा, तब अहंकाररूपी मेघ जाते रहेंगे और आत्मरूपी आकाश निर्मल भासित होगा। हे राम ! जैसे मलिन दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब उज्ज्वल नहीं दिखता, और जब मैल मिटता है, तब मुख का प्रतिबिम्ब स्पष्ट प्रत्यक्ष दिखता है, वैसे ही अहंकाररूपी मैल से जीव ढका हुआ है, इससे आत्मा नहीं दिखता; जब अहंकाररूपी मैल हटेगा, तब आत्मा ज्यों का त्यों दिखेगा। जैसे समुद्र में नाना प्रकार के तरङ्ग उठते हैं सो सम्यक्दर्शी को सब जलमय देख पड़ते हैं, और भूषण में सुवर्ण ही भासित होता है, वैसे ही नाना प्रकार के प्रपञ्च उस सम्यक्दर्शी को चैतन्य-घन आत्मा ही देख पड़ते हैं—वह आत्मा से भिन्न कुछ नहीं देखता। वह पत्थर की शिला के समान हो जाता है, क्योंकि उसका अहंकार नष्ट हो गया है। अहंकार-संयुक्त है और क्रिया का त्यागकर अपने को सुखी मानता है, वह मूर्ख है। जैसे कोई लकड़ी लेकर आकाश का नाश किया चाहे तो वह नष्ट नहीं होता, वैसे ही क्रिया के त्याग से दुःख नष्ट नहीं होते। जब सम्पूर्ण संसार और कर्म के बीज अहंकार का नाश हो, तब अक्रिय आत्मस्वरूप को प्राप्त होता है।
जैसे ताँबा अपने ताम्रभाव को त्यागकर सुवर्ण होता है, वैसे ही जब जीव अपना जीवत्व त्यागता है, तब आत्मा होता है। जैसे तेल की बूँद जल में फैल जाती है और नाना प्रकार के रङ्ग जल में दिखते हैं, वैसे ही ब्रह्म में अनेक प्रकार की कलना दिखाई देती है—आत्मा ब्रह्म, निराकार, निरञ्जन इत्यादि का नाम भी अहंकार से शुद्ध आत्मा में