योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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कल्पित हुए हैं। वह तो निष्क्रिय केवल सत्तामात्र है और सत्य और असत्य की तरह स्थित है। हे राम ! संसार एक मिर्च का पेड़ है अथवा संसार एक फूल है। उसमें अहंतारूपी सुगन्ध है। जब अहंता उदय होती है, तब संसार क्षण में उदय होता है और अहंता का नाश होने पर संसार क्षण भर में नष्ट हो जाता है। क्षण में उदय और क्षण में नाश होता है। सो अहंता का होना ही उदय होने का क्षण है और अहंता का लीन होना नाश का क्षण।
हे राम ! जैसे मृत्तिका में जल के संयोग से घट बनता है, तब मृत्तिका घटसंज्ञा पाती है, वैसे ही पुरुष को जब अहंकार का संग होता है तब संसारी होता है और जीवसंज्ञा पाता है। वह देश, काल, पृथ्वी, पर्वत आदिक दृश्य को प्रत्यक्ष देखता है। जब अहंता का नाश होता है तब वह सुखी होता है। निदान जो कुछ नाम और उसका अर्थ है सो अहंता में भासित होता है। जब अहंता को त्यागता है, तब शान्तरूप आत्मा ही शेष रहता है। जैसे पवन से रहित दीपक प्रकाशित होता है, वैसे ही अहंकाररूपी पवन से रहित जीव अपने स्वभाव में स्थित होकर आनन्द-पद को प्राप्त होता है, अनादि पद पाता है, सबका अपना रूप होता है और अपने में देश, काल, वस्तु देखता है। हे राम ! जब तक अहंता का नाश नहीं होता, तबतक मेरे वचन हृदय में न जमेंगे। जैसे रेत में तेल निकलना कठिन है, वैसे ही जिस पुरुष ने अपना स्वभाव नहीं जाना, उसके लिए ब्रह्म को पाना कठिन है। अपना स्वभाव जानना अति सुगम है। जब अहंता का त्याग करे कि न मैं हूँ और न जगत है, तब कल्याण होता है; तहीं अहंता का नाश होता है और कोई भ्रम नहीं रहता, जैसे गर्मी के जाने से सर्पभ्रम निवृत्त हो जाता है। जब तक अहंता फुरती है, तब तक उसको उपदेश नहीं लगता। जैसे आरसी पर मोती नहीं ठहरता वैसे ही जिसको अहंता फुरती है, उसके हृदय में मेरे वचन नहीं ठहरते। और जिसका हृदय शुद्ध है, उसको मेरे वचन लगते हैं। जैसे तेल की बूँद जल में फैल जाती है, वैसे ही उसको थोड़े वचन भी बहुत लगते हैं।