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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1201, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1201

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ <span style="float:right;">३६३</span>

हे राम ! इसी प्रसंग में एक पुरातन इतिहास कहता हूँ सो तुम सुनो। वह मेरा और काकभुशुण्डि का संवाद है। एक समय में सुमेरु पर्वत के शिखर पर गया तो वहाँ भुशुण्डि बैठा था। उससे मैंने प्रश्न किया कि हे अङ्ग ! ऐसा भी कोई पुरुष देखा है, जिसकी आयु बड़ी हो और ज्ञान मे शून्य रहा हो ? जो देखा हो तो कहो। भुशुण्डि बोले, हे भगवन् ! एक विद्याधर था, जिसकी बड़ी आयु थी और जिसने बहुत विद्याध्ययन किया था। वह सत्कर्मों को बहुत करता था। उसने बहुत भोग भोगे थे और चार युग पर्यन्त जप, तप, नियम आदिक सकाम कर्म किये थे। जब चतुर्थ युग का अन्त हुआ, तब उसने विचार किया और जितने भोग सुखरूप जानकर भोगता था, उनमें उसको वैराग्य हुआ।

तब उनको त्यागकर लोकालोक पर्वत पर गया और विचार कि यह संसार असाररूप है, किसी प्रकार इममे छूटूँ। इसमें बारम्बार जन्म और मरण होता है। यहाँ का कोई पदार्थ सत्य नहीं, किसका आश्रय ग्रहण करूँ ? ऐसे विचार करके वह विकृत आत्मावाला पुरुष सुमेरुपर्वत पर मेरे पास आया और सिर झुकाकर मुझे दण्डवत् की। मैंने भी उसका बहुत आदर किया। तब हाथ जोड़कर उसने कहा, हे भगवन् ! इतने काल तक मैं विषयों को भोगता रहा, परन्तु मुझे शान्ति न हुई इससे मैं दुःखी हूँ। तुम कृपा करके शान्ति का उपाय कहो। हे भगवन् ! चित्ररथ के बाग में, जिसमें सदाशिवजी रहते हैं और जहाँ बहुत कल्पवृक्ष हैं, मैं चिरकाल रहा; फिर विद्याधरों के स्वर्ग में रहा; फिर इन्द्र के नन्दनवन और सुवर्ण की कन्दरा में रहकर सुन्दर अप्सराओं के साथ विहार किया और विमान पर बहुत घूमा हूँ। हे भगवन् ! बहुत स्थान मैंने देखे हैं और तप, दान, यज्ञ, व्रत भी बहुत किये हैं। सहस्र वर्ष तक ऐसे सुन्दर रूप देखता रहा हूँ, जिनकी सुन्दरता नहीं कह सकता, तो भी नेत्रों की तृप्ति नहीं हुई; बहुत सुगन्ध सूँघी, पर नासिका को तृप्ति न हुई; रसना मे भोजन बहुत प्रकार के खाये, पर शान्ति न हुई, बल्कि तृष्णा बढ़ती गई, कानों से बहुत प्रकार के शब्द