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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1202, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1202

३६४ ✲ योगवाशिष्ठ ✲

और राग सुने और त्वचा में बहुत स्पर्श किये हैं, तो भी शान्ति न हुई ।

हे भगवन् ! में जिस ओर सुख जानकर जाता हूँ, उसी ओर दुःख प्राप्त होते हैं-जैसे मृग क्षुधा निवारने के लिए घाम खाने जाता है और राग सुनकर मूर्च्छित हो जाना है, तब उसको बधिक पकड़ लेता है तो मृग दुःख पाता है, वैसे ही मैं सुख जानकर विषयों को ग्रहण करता था और बड़े दुःखों को प्राप्त होता था। हे भगवन् ! मैंने चिरकाल तक पाँचों इन्द्रियों और छठे मन सहित दिव्यभोग भोगे हैं, जो कहे नहीं जा सकते, परन्तु मुझे शान्ति न हुई और न इन्द्रियाँ तृप्त हुईं । जैसे घृत से अग्नि तृप्त नहीं होती, वैसे ही दिन-दिन तृष्णा बढ़ती जाती है और हृदय जलाती है । जो पुरुष इन भोगों के निमित्त यत्न करता है कि में इनसे सुखी हूँगा, वह मूर्ख है और उसको धिक्कार है—वह समुद्र में तरंग को पकड़ता है। ये तब तक सुखरूप लगते हैं, जब तक इन्द्रियों और विषयों का संयोग है। जब इन्द्रियों से विषयों का वियोग होता है तब महादुःख होता है; क्योंकि तृष्णा हृदय में रहती है और भोग जाते रहते हैं। तब जो-जो विषय भोग होते हैं, वे दुःखदायक हो जाते हैं ।

हे भगवन् ! मैंने इसी से बहुत दुःख पाया है । यद्यपि इन्द्रियां कोमल हैं, तो भी सुमेरु की तरह कठिन हैं। कोमल लगती हैं, परन्तु ऐसी हैं जैसे सर्पिणी और खड्ग की धार कोमल होती है, पर स्पर्श करने से मनुष्य मर जाता है । जैसे जल में नाव पवन से घूमती है वैसे ही अज्ञानरूपी नदी में पवनरूपा इन्द्रियों ने मुझे दुःख दिया है हे भगवन् ! ऐसे पुरुष भी मैंने देखे, जो सारे दिन माँगते रहे और भोजन के निमित्त अन्न प्राप्त नहीं हुआ । और ऐसे भी देखे हैं कि उन्होंने ब्रह्मा से काष्ठ पर्यन्त सब भोग भोगे हैं। पर जिसको दिन में भोजनमात्र भी प्राप्त नहीं होता और जो सब इन्द्रियों के इष्टरूप भोगों को भोगता है; उन दोनों को भस्म होते देखा है । भस्म दोनों की तुल्य होती है-विशेषता कुछ नहीं । इन्द्रियों के बन्धन में बारम्बार जन्मते-मरते अज्ञानी पुरुष शान्ति नहीं पाते । जो तुम कहो कि तू तो सुखी देख पड़ता है