योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३६५
तुझे क्या दुःख है तो हे भगवन् ! वह दुःख देखने में नहीं आता; परन्तु मेरा हृदय जलता है । हे भगवन् ! ब्रह्मा के लोक में मैंने बड़े सुख देखे हैं, परन्तु वहाँ भी दुःखी ही रहा हूँ; क्योंकि क्षय और अतिशय वहाँ भी रहता है । इससे वहाँ के निवासी भी जलते हैं । इन्द्रियों का शस्त्र से भी कठिन घाव होता है । ये जो संसार का नाना प्रकार की विषमता देख पड़ती हैं और उनमें सर्वदा रागद्वेष रहता है, इससे मैं बहुत जलता रहा हूँ । इससे मुझसे वही उपाय कहिये, जिससे मैं शान्ति पाऊँ । वह कौन सुख है, जिससे फिर दुःखी न होऊँ, जिसका कदापि नाश न हो और जो आदि अन्त से रहित हो । चाहे उसके पाने में कष्ट हो तो मैं यत्न करूँगा कि वह किसी प्रकार मुझे प्राप्त हो ।
हे मुनीश्वर ! इन्द्रियों ने मुझे बड़ा कष्ट दिया है । ये इन्द्रियाँ गुण-रूपी वृक्ष के लिए अग्नि हैं; शुभ गुणों को जलाती हैं । ये विचार, धैर्य, सन्तोष शान्ति आदिक गुणरूपी वृक्ष का नाश करनेवाली हैं । हे भगवन् ! इन्होंने मुझे दुःख दिया है । जैसे मृग का बच्चा सिंह के सामने पड़े तो वह उसका मर्दन करता है, वैसे ही इन्द्रियों ने मुझे मारा है । हे भगवन् ! जिस पुरुष ने इन्द्रियों को वश में किया है उसका पूजन सब देवता करते हैं और उसके दर्शन की इच्छा रखते हैं और जिसने मन को नहीं वश किया उसको दीन जानते हैं । जिस पुरुष ने इन्द्रियों को वश किया है, वह सुमेरु पर्वत की तरह अपनी गम्भीरता में स्थित है और जिसने इन्द्रियाँ वश नहीं कीं, वह तृण की तरह तुच्छ है । जिसको इन्द्रियों के विषयों में सदा तृष्णा रहती है, वह पशु है; उसको धिक्कार है । हे मुनीश्वर ! चाहे बड़ा महन्त भी हो, यदि उसके इन्द्रियाँ वश नहीं तो वह महानीच है । हे मुनीश्वर ! इन्द्रियों ने मुझे बड़ा दुःख दिया है । जैसे महाशून्य उजाड़ में चोर लूट लेते हैं, वैसे ही इन्द्रियों ने मुझे लूट लिया है । इन्द्रिय-रूपिणी सर्पिणी में तृष्णारूपी विष है । इससे इनके द्वारा सारा विश्व मोहित देख पड़ता है, कोई विरला ही इनमें न द्वारा होगा । ये इन्द्रियाँ दुष्ट हैं, जो अपने-अपने विषय को लेती हैं, और को नहीं देतीं । ये