योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1204, कुल 1734 में से
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तुच्छ और जड़ है । जैसे बिजुली का प्रकाश होता है और फिर छिप जाता है; वैसे ही इन्द्रियों के सुख अणमात्र दिखाई देते हैं और फिर छिप जाते हैं ।
जबतक इन्द्रियों और विषयों का संयोग है, तबतक सुख मिलता है । जब इनका वियोग होता है, तब दुःख उत्पन्न होता है, क्योंकि तृष्णा रहती है । एक सेना है, उसमें इन्द्रियों के भोग उन्मत्त हाथी हैं, जिनके तृष्णारूपी जंजीर है । इन्द्रियाँ रथ हैं; नाना प्रकार के विषय घोड़े हैं । इस पर संकल्प-विकल्परूपी खड्गों को धारण किये अहंकार उस पर सवार है । ये जो काम अहंकार के साथ होते हैं, वे ही शस्त्रों के समूह हैं । हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष ने इस सेना को नहीं जीता वह मोहरूपी अन्धे कुएँ में गिरकर कष्ट पाता है, और जिसने जीत लिया है, वह परमसुख को प्राप्त होता है । हे मुनीश्वर ! ये इन्द्रियाँ भोग की इच्छारूपी गाड़े में अहंकाररूपी राजा को डाल देती हैं । उसमें से निकलना कठिन होता है ।
जिस पुरुष ने इनको जीता है, उसकी त्रिलोकी में जय होती है, और जिसने नहीं जीता, वह महादीनता को प्राप्त होता है, और जन्म-जन्मान्तर पाता है । इन इन्द्रियों में रजोगुण और तमोगुण रहता है ये तबतक दाह देती हैं, जबतक रज-तम वृत्ति है । यह भी मन की वृत्ति है । जब इनका अभाव होता है, तब शान्ति प्राप्त होती है । यह खोज करके देखा है कि इन्द्रियाँ तप, यज्ञ, व्रत, तीर्थ और किसी औषध से वश नहीं होतीं और न इनके वश करने का कोई उपाय है । केवल सन्तों के संग से जब वासना को छोड़े, तब वश होती हैं । इससे मैं तुम्हारी शरण हूँ; कृपा करके मुझे आपदा के समुद्र से निकालो; क्योंकि मैं उसमें डूब रहा हूँ । मैं इस संसारसमुद्र में दीन हूँ, तुम पार करो । तुम्हारी महिमा मैंने सन्तों से भी सुनी है । हे भगवन् ! जो कोई सब आयु पर्यन्त विषयों के दिव्य भोग भोगता रहे और इनसे शान्ति चाहे तो न प्राप्त होगी । बड़े सुख और दुःख, दोनों समान हैं । आकाशचारी सिद्ध भी इन्द्रियों को वश नहीं कर सकते, इससे दीन और