योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
३४० * योगवाशिष्ठ *
नहीं होता । हे राम ! संसार का बीज अहंभाव है, उसी से स्थावर-जङ्गम जगत भासता है । जब इसका नाश हुआ, तब जगतभ्रम मिट जाता है, इससे इसके अभाव की भावना करो । जब तुम्हें अहँ की भावना फुरे तो जानो कि मैं नहीं हूँ । जब इस प्रकार अहंकार का अभाव हुआ तब पीछे जो शेष रहेगा, वही आत्मपद है । हे राम ! सब अनर्थों का कारण अहंभाव है, उसका त्याग करो ।
हे राम ! शस्त्र के प्रहार और व्याधि को यह जीव सह सकता है तो इस अहँ के त्यागने में क्या कदर्थना है । हे राम ! संसार का बीज अहँ का सद्भाव है, उसका नाश करना मानो संसार का मूलसंयुक्त नाश करना है—इसी के नाश का उपाय करो । जिसका अहंभाव नष्ट हुआ है, उसको सब ठौर आकाशरूप है । उसके हृदय में संसार की सत्ता नहीं फुरती । चाहे वह गृहस्थ हो तो भी उसको यह प्रपञ्च शून्य बन जाता है । जो अहंकार सहित वन में जा बैठे तो भी वह जनों के समूह में बैठा है; क्योंकि उसका अज्ञान नष्ट नहीं हुआ । जिसने मन सहित षट् इन्द्रियों को वश नहीं किया, उसको मेरी कथा के सुनने का अधिकार नहीं—वह पशु है । जिस पुरुष ने मन को जीता है, अथवा दिन प्रतिदिन जीतने की इच्छा करता है, वह पुरुष है । और जो इन्द्रियों का विश्रामी अर्थात् क्रोध, लोभ, मोह से सम्पन्न है वह पशु है और महाअन्धतम को प्राप्त होता है । हे राम ! जो पुरुष ज्ञानवान् है, उसमें यदि इच्छा दिखती है तो भी वह उसकी इच्छा अनिच्छा ही है और उसके कर्म अकर्म ही हैं । जैसे भुना दाना फिर नहीं उगता, पर उसका आकार भासित होता है वैसे ही ज्ञानवान् की चेष्टा देखने मात्र को होती है, उसके हृदय में वासना नहीं होती । हे राम ! जो पुरुष इन्द्रियों से चेष्टा करता है और हृदय में जगत की सत्यता नहीं मानता, उसे कोई बन्धन नहीं होता और जो जगत को सत्य मानकर थोड़ा ही कर्म करता है, तो भी वह फँस जाता है-जैसे थोड़ी अग्नि जाग कर बहुत हो जाती है—ज्ञानी को बन्धन नहीं होता । उसका प्रारब्ध शेष है, यह भी वह हृदय में नहीं मानता और जानता है कि ये कर्म शरीर
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३६१
के हैं, आत्मा के नहीं। जैसे कुम्हार के चाक का वेग उतरता जाता है, वैसे ही उसका प्रारब्ध वेग उतरता जाता है और फिर जन्म नहीं होता; क्योंकि उसको अहंकाररूपी चरण नहीं लगता। इससे अहंकार का नाश करो। जब अहंकार नष्ट होगा, तब सबके आदि पद की प्राप्ति होगी, जो परम निर्वाणपद है और जिसमें निर्वाण का भी निर्वाण हो जाना है।
हे राम ! जब वर्षाकाल होता है, तब बादल होते हैं। जब शरत्काल आता है, तब बादल जाते रहते हैं। हे राम ! जबतक अज्ञानरूपी वर्षा-काल है, तब तक अहंकाररूपी वर्षा है। जब विचाररूपी शरत्काल आवेगा, तब अहंकाररूपी मेघ जाते रहेंगे और आत्मरूपी आकाश निर्मल भासित होगा। हे राम ! जैसे मलिन दर्पण में मुख का प्रतिबिम्ब उज्ज्वल नहीं दिखता, और जब मैल मिटता है, तब मुख का प्रतिबिम्ब स्पष्ट प्रत्यक्ष दिखता है, वैसे ही अहंकाररूपी मैल से जीव ढका हुआ है, इससे आत्मा नहीं दिखता; जब अहंकाररूपी मैल हटेगा, तब आत्मा ज्यों का त्यों दिखेगा। जैसे समुद्र में नाना प्रकार के तरङ्ग उठते हैं सो सम्यक्दर्शी को सब जलमय देख पड़ते हैं, और भूषण में सुवर्ण ही भासित होता है, वैसे ही नाना प्रकार के प्रपञ्च उस सम्यक्दर्शी को चैतन्य-घन आत्मा ही देख पड़ते हैं—वह आत्मा से भिन्न कुछ नहीं देखता। वह पत्थर की शिला के समान हो जाता है, क्योंकि उसका अहंकार नष्ट हो गया है। अहंकार-संयुक्त है और क्रिया का त्यागकर अपने को सुखी मानता है, वह मूर्ख है। जैसे कोई लकड़ी लेकर आकाश का नाश किया चाहे तो वह नष्ट नहीं होता, वैसे ही क्रिया के त्याग से दुःख नष्ट नहीं होते। जब सम्पूर्ण संसार और कर्म के बीज अहंकार का नाश हो, तब अक्रिय आत्मस्वरूप को प्राप्त होता है।
जैसे ताँबा अपने ताम्रभाव को त्यागकर सुवर्ण होता है, वैसे ही जब जीव अपना जीवत्व त्यागता है, तब आत्मा होता है। जैसे तेल की बूँद जल में फैल जाती है और नाना प्रकार के रङ्ग जल में दिखते हैं, वैसे ही ब्रह्म में अनेक प्रकार की कलना दिखाई देती है—आत्मा ब्रह्म, निराकार, निरञ्जन इत्यादि का नाम भी अहंकार से शुद्ध आत्मा में
३६२ ❊ योगवाशिष्ट ❊
कल्पित हुए हैं। वह तो निष्क्रिय केवल सत्तामात्र है और सत्य और असत्य की तरह स्थित है। हे राम ! संसार एक मिर्च का पेड़ है अथवा संसार एक फूल है। उसमें अहंतारूपी सुगन्ध है। जब अहंता उदय होती है, तब संसार क्षण में उदय होता है और अहंता का नाश होने पर संसार क्षण भर में नष्ट हो जाता है। क्षण में उदय और क्षण में नाश होता है। सो अहंता का होना ही उदय होने का क्षण है और अहंता का लीन होना नाश का क्षण।
हे राम ! जैसे मृत्तिका में जल के संयोग से घट बनता है, तब मृत्तिका घटसंज्ञा पाती है, वैसे ही पुरुष को जब अहंकार का संग होता है तब संसारी होता है और जीवसंज्ञा पाता है। वह देश, काल, पृथ्वी, पर्वत आदिक दृश्य को प्रत्यक्ष देखता है। जब अहंता का नाश होता है तब वह सुखी होता है। निदान जो कुछ नाम और उसका अर्थ है सो अहंता में भासित होता है। जब अहंता को त्यागता है, तब शान्तरूप आत्मा ही शेष रहता है। जैसे पवन से रहित दीपक प्रकाशित होता है, वैसे ही अहंकाररूपी पवन से रहित जीव अपने स्वभाव में स्थित होकर आनन्द-पद को प्राप्त होता है, अनादि पद पाता है, सबका अपना रूप होता है और अपने में देश, काल, वस्तु देखता है। हे राम ! जब तक अहंता का नाश नहीं होता, तबतक मेरे वचन हृदय में न जमेंगे। जैसे रेत में तेल निकलना कठिन है, वैसे ही जिस पुरुष ने अपना स्वभाव नहीं जाना, उसके लिए ब्रह्म को पाना कठिन है। अपना स्वभाव जानना अति सुगम है। जब अहंता का त्याग करे कि न मैं हूँ और न जगत है, तब कल्याण होता है; तहीं अहंता का नाश होता है और कोई भ्रम नहीं रहता, जैसे गर्मी के जाने से सर्पभ्रम निवृत्त हो जाता है। जब तक अहंता फुरती है, तब तक उसको उपदेश नहीं लगता। जैसे आरसी पर मोती नहीं ठहरता वैसे ही जिसको अहंता फुरती है, उसके हृदय में मेरे वचन नहीं ठहरते। और जिसका हृदय शुद्ध है, उसको मेरे वचन लगते हैं। जैसे तेल की बूँद जल में फैल जाती है, वैसे ही उसको थोड़े वचन भी बहुत लगते हैं।
☸ निर्वाण प्रकरण ☸ <span style="float:right;">३६३</span>
हे राम ! इसी प्रसंग में एक पुरातन इतिहास कहता हूँ सो तुम सुनो। वह मेरा और काकभुशुण्डि का संवाद है। एक समय में सुमेरु पर्वत के शिखर पर गया तो वहाँ भुशुण्डि बैठा था। उससे मैंने प्रश्न किया कि हे अङ्ग ! ऐसा भी कोई पुरुष देखा है, जिसकी आयु बड़ी हो और ज्ञान मे शून्य रहा हो ? जो देखा हो तो कहो। भुशुण्डि बोले, हे भगवन् ! एक विद्याधर था, जिसकी बड़ी आयु थी और जिसने बहुत विद्याध्ययन किया था। वह सत्कर्मों को बहुत करता था। उसने बहुत भोग भोगे थे और चार युग पर्यन्त जप, तप, नियम आदिक सकाम कर्म किये थे। जब चतुर्थ युग का अन्त हुआ, तब उसने विचार किया और जितने भोग सुखरूप जानकर भोगता था, उनमें उसको वैराग्य हुआ।
तब उनको त्यागकर लोकालोक पर्वत पर गया और विचार कि यह संसार असाररूप है, किसी प्रकार इममे छूटूँ। इसमें बारम्बार जन्म और मरण होता है। यहाँ का कोई पदार्थ सत्य नहीं, किसका आश्रय ग्रहण करूँ ? ऐसे विचार करके वह विकृत आत्मावाला पुरुष सुमेरुपर्वत पर मेरे पास आया और सिर झुकाकर मुझे दण्डवत् की। मैंने भी उसका बहुत आदर किया। तब हाथ जोड़कर उसने कहा, हे भगवन् ! इतने काल तक मैं विषयों को भोगता रहा, परन्तु मुझे शान्ति न हुई इससे मैं दुःखी हूँ। तुम कृपा करके शान्ति का उपाय कहो। हे भगवन् ! चित्ररथ के बाग में, जिसमें सदाशिवजी रहते हैं और जहाँ बहुत कल्पवृक्ष हैं, मैं चिरकाल रहा; फिर विद्याधरों के स्वर्ग में रहा; फिर इन्द्र के नन्दनवन और सुवर्ण की कन्दरा में रहकर सुन्दर अप्सराओं के साथ विहार किया और विमान पर बहुत घूमा हूँ। हे भगवन् ! बहुत स्थान मैंने देखे हैं और तप, दान, यज्ञ, व्रत भी बहुत किये हैं। सहस्र वर्ष तक ऐसे सुन्दर रूप देखता रहा हूँ, जिनकी सुन्दरता नहीं कह सकता, तो भी नेत्रों की तृप्ति नहीं हुई; बहुत सुगन्ध सूँघी, पर नासिका को तृप्ति न हुई; रसना मे भोजन बहुत प्रकार के खाये, पर शान्ति न हुई, बल्कि तृष्णा बढ़ती गई, कानों से बहुत प्रकार के शब्द
३६४ ✲ योगवाशिष्ठ ✲
और राग सुने और त्वचा में बहुत स्पर्श किये हैं, तो भी शान्ति न हुई ।
हे भगवन् ! में जिस ओर सुख जानकर जाता हूँ, उसी ओर दुःख प्राप्त होते हैं-जैसे मृग क्षुधा निवारने के लिए घाम खाने जाता है और राग सुनकर मूर्च्छित हो जाना है, तब उसको बधिक पकड़ लेता है तो मृग दुःख पाता है, वैसे ही मैं सुख जानकर विषयों को ग्रहण करता था और बड़े दुःखों को प्राप्त होता था। हे भगवन् ! मैंने चिरकाल तक पाँचों इन्द्रियों और छठे मन सहित दिव्यभोग भोगे हैं, जो कहे नहीं जा सकते, परन्तु मुझे शान्ति न हुई और न इन्द्रियाँ तृप्त हुईं । जैसे घृत से अग्नि तृप्त नहीं होती, वैसे ही दिन-दिन तृष्णा बढ़ती जाती है और हृदय जलाती है । जो पुरुष इन भोगों के निमित्त यत्न करता है कि में इनसे सुखी हूँगा, वह मूर्ख है और उसको धिक्कार है—वह समुद्र में तरंग को पकड़ता है। ये तब तक सुखरूप लगते हैं, जब तक इन्द्रियों और विषयों का संयोग है। जब इन्द्रियों से विषयों का वियोग होता है तब महादुःख होता है; क्योंकि तृष्णा हृदय में रहती है और भोग जाते रहते हैं। तब जो-जो विषय भोग होते हैं, वे दुःखदायक हो जाते हैं ।
हे भगवन् ! मैंने इसी से बहुत दुःख पाया है । यद्यपि इन्द्रियां कोमल हैं, तो भी सुमेरु की तरह कठिन हैं। कोमल लगती हैं, परन्तु ऐसी हैं जैसे सर्पिणी और खड्ग की धार कोमल होती है, पर स्पर्श करने से मनुष्य मर जाता है । जैसे जल में नाव पवन से घूमती है वैसे ही अज्ञानरूपी नदी में पवनरूपा इन्द्रियों ने मुझे दुःख दिया है हे भगवन् ! ऐसे पुरुष भी मैंने देखे, जो सारे दिन माँगते रहे और भोजन के निमित्त अन्न प्राप्त नहीं हुआ । और ऐसे भी देखे हैं कि उन्होंने ब्रह्मा से काष्ठ पर्यन्त सब भोग भोगे हैं। पर जिसको दिन में भोजनमात्र भी प्राप्त नहीं होता और जो सब इन्द्रियों के इष्टरूप भोगों को भोगता है; उन दोनों को भस्म होते देखा है । भस्म दोनों की तुल्य होती है-विशेषता कुछ नहीं । इन्द्रियों के बन्धन में बारम्बार जन्मते-मरते अज्ञानी पुरुष शान्ति नहीं पाते । जो तुम कहो कि तू तो सुखी देख पड़ता है
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३६५
तुझे क्या दुःख है तो हे भगवन् ! वह दुःख देखने में नहीं आता; परन्तु मेरा हृदय जलता है । हे भगवन् ! ब्रह्मा के लोक में मैंने बड़े सुख देखे हैं, परन्तु वहाँ भी दुःखी ही रहा हूँ; क्योंकि क्षय और अतिशय वहाँ भी रहता है । इससे वहाँ के निवासी भी जलते हैं । इन्द्रियों का शस्त्र से भी कठिन घाव होता है । ये जो संसार का नाना प्रकार की विषमता देख पड़ती हैं और उनमें सर्वदा रागद्वेष रहता है, इससे मैं बहुत जलता रहा हूँ । इससे मुझसे वही उपाय कहिये, जिससे मैं शान्ति पाऊँ । वह कौन सुख है, जिससे फिर दुःखी न होऊँ, जिसका कदापि नाश न हो और जो आदि अन्त से रहित हो । चाहे उसके पाने में कष्ट हो तो मैं यत्न करूँगा कि वह किसी प्रकार मुझे प्राप्त हो ।
हे मुनीश्वर ! इन्द्रियों ने मुझे बड़ा कष्ट दिया है । ये इन्द्रियाँ गुण-रूपी वृक्ष के लिए अग्नि हैं; शुभ गुणों को जलाती हैं । ये विचार, धैर्य, सन्तोष शान्ति आदिक गुणरूपी वृक्ष का नाश करनेवाली हैं । हे भगवन् ! इन्होंने मुझे दुःख दिया है । जैसे मृग का बच्चा सिंह के सामने पड़े तो वह उसका मर्दन करता है, वैसे ही इन्द्रियों ने मुझे मारा है । हे भगवन् ! जिस पुरुष ने इन्द्रियों को वश में किया है उसका पूजन सब देवता करते हैं और उसके दर्शन की इच्छा रखते हैं और जिसने मन को नहीं वश किया उसको दीन जानते हैं । जिस पुरुष ने इन्द्रियों को वश किया है, वह सुमेरु पर्वत की तरह अपनी गम्भीरता में स्थित है और जिसने इन्द्रियाँ वश नहीं कीं, वह तृण की तरह तुच्छ है । जिसको इन्द्रियों के विषयों में सदा तृष्णा रहती है, वह पशु है; उसको धिक्कार है । हे मुनीश्वर ! चाहे बड़ा महन्त भी हो, यदि उसके इन्द्रियाँ वश नहीं तो वह महानीच है । हे मुनीश्वर ! इन्द्रियों ने मुझे बड़ा दुःख दिया है । जैसे महाशून्य उजाड़ में चोर लूट लेते हैं, वैसे ही इन्द्रियों ने मुझे लूट लिया है । इन्द्रिय-रूपिणी सर्पिणी में तृष्णारूपी विष है । इससे इनके द्वारा सारा विश्व मोहित देख पड़ता है, कोई विरला ही इनमें न द्वारा होगा । ये इन्द्रियाँ दुष्ट हैं, जो अपने-अपने विषय को लेती हैं, और को नहीं देतीं । ये
३६६ * योगवाशिष्ठ *
तुच्छ और जड़ है । जैसे बिजुली का प्रकाश होता है और फिर छिप जाता है; वैसे ही इन्द्रियों के सुख अणमात्र दिखाई देते हैं और फिर छिप जाते हैं ।
जबतक इन्द्रियों और विषयों का संयोग है, तबतक सुख मिलता है । जब इनका वियोग होता है, तब दुःख उत्पन्न होता है, क्योंकि तृष्णा रहती है । एक सेना है, उसमें इन्द्रियों के भोग उन्मत्त हाथी हैं, जिनके तृष्णारूपी जंजीर है । इन्द्रियाँ रथ हैं; नाना प्रकार के विषय घोड़े हैं । इस पर संकल्प-विकल्परूपी खड्गों को धारण किये अहंकार उस पर सवार है । ये जो काम अहंकार के साथ होते हैं, वे ही शस्त्रों के समूह हैं । हे मुनीश्वर ! जिस पुरुष ने इस सेना को नहीं जीता वह मोहरूपी अन्धे कुएँ में गिरकर कष्ट पाता है, और जिसने जीत लिया है, वह परमसुख को प्राप्त होता है । हे मुनीश्वर ! ये इन्द्रियाँ भोग की इच्छारूपी गाड़े में अहंकाररूपी राजा को डाल देती हैं । उसमें से निकलना कठिन होता है ।
जिस पुरुष ने इनको जीता है, उसकी त्रिलोकी में जय होती है, और जिसने नहीं जीता, वह महादीनता को प्राप्त होता है, और जन्म-जन्मान्तर पाता है । इन इन्द्रियों में रजोगुण और तमोगुण रहता है ये तबतक दाह देती हैं, जबतक रज-तम वृत्ति है । यह भी मन की वृत्ति है । जब इनका अभाव होता है, तब शान्ति प्राप्त होती है । यह खोज करके देखा है कि इन्द्रियाँ तप, यज्ञ, व्रत, तीर्थ और किसी औषध से वश नहीं होतीं और न इनके वश करने का कोई उपाय है । केवल सन्तों के संग से जब वासना को छोड़े, तब वश होती हैं । इससे मैं तुम्हारी शरण हूँ; कृपा करके मुझे आपदा के समुद्र से निकालो; क्योंकि मैं उसमें डूब रहा हूँ । मैं इस संसारसमुद्र में दीन हूँ, तुम पार करो । तुम्हारी महिमा मैंने सन्तों से भी सुनी है । हे भगवन् ! जो कोई सब आयु पर्यन्त विषयों के दिव्य भोग भोगता रहे और इनसे शान्ति चाहे तो न प्राप्त होगी । बड़े सुख और दुःख, दोनों समान हैं । आकाशचारी सिद्ध भी इन्द्रियों को वश नहीं कर सकते, इससे दीन और
३६८ * योगवाशिष्ठ *
हो जायगा । संसाररूपी वृक्ष के सुमेरु आदिक पर्वत पत्ते हैं; तारागण कली और फूल हैं; मानों समुद्र रस हैं; जन्म-मरण बेल है; सुख-दुःख फल हैं और वह आकाश, दिशा, पाताल को धारण किये स्थित है । अहंकाररूपी वृक्ष पृथ्वी पर उत्पन्न हुआ है; अहंकार ही उसका बीज है । यह वृक्ष मिथ्या भ्रममात्र, असत्य और सत्य की नाईं स्थित है । इससे अहंकाररूप बीज का नाश करो और निरहंकाररूपी अग्नि में इसको जलाओ, तब इसका अत्यन्त अभाव हो जावेगा । यह भ्रम के कारण भय देता है, जैसे रस्सी में सर्पभ्रम डराता है । इससे निरहंकार-रूपी अग्नि से उसका नाश करो ।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकद्वार्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३२ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह ज्ञान जैसे उत्पन्न होता है सो सुनो । ब्रह्मविद्या-शास्त्र के सुनने और आत्मविचार से यह उपजता है । उस आत्मज्ञानरूपी अग्नि में संसाररूपी वृक्ष को जलाओ । यह आगे भी नहीं था, असत्त्वहीन ही उदय हुआ है और मन के संकल्प से विद्यमान की नाईं स्थित है । जैसे पत्थर में शिल्पी कल्पना करता है कि इतनी पुतलियाँ निकलेंगी, सो हुई कुछ नहीं; वैसे ही मनरूपी शिल्पी यह विश्वरूपी पुतलियाँ कल्पना में लाता है । जब मन का नाश करोगे, तब संसारभ्रम मिट जावेगा; आत्मविचार करके परमपद को प्राप्त होगे और अपना रूप परमात्मारूप प्रत्यक्ष भासित होगा । इससे अहंता को त्याग कर अपने स्वरूप में स्थित होओ । हे विद्याधर ! यह संसाररूपी वृक्ष अहंतारूपी बीज से उपजता है । उसको जब ज्ञानरूपी अग्नि से जलाओगे, तब फिर यह जगत् न उपजेगा । यदि इसको विचार करके देखिये, तो अहं-त्व नहीं रहता ।
हे विद्याधर ! यह अहं-त्व मिथ्या है—इसके अभाव की भावना करो यही उत्तम ज्ञान है । हे साधो ! जब गुरु के वचन सुनकर उनके अनु-सार पुरुषार्थ करे, तब परमपद को प्राप्त होता है और जय होती है । हे विद्यारूपी कन्दरा को धारण करनेवाले, पर्वत, और विद्यारूपी पृथ्वी को धारण करनेवाले शेषनाग ! यह संसार एक आडम्बर है । इसके
❋ निर्वाण प्रकरण ❋
३६६
सुमेरु जैसे कई खम्भे हैं जो रत्नों की पंक्ति से जड़े हुए हैं। बन, दिशा, पहाड़, वृक्ष, कन्दरा, वैताल, देवता, पाताल, आकाश, इत्यादिक सारा ब्रह्माण्ड उनके ऊपर स्थित है। रात्रि, दिन, भूत, प्राणी और इनके जो घर हैं सो चौपड़ के खाने हैं। जो जैसा कर्म करता है, वह उसके अनुसार दुःख-सुख भोगता है। ऐसे ही यह जो क्रियासंयुक्त सम्पूर्ण प्रपञ्च दिखाई देता है सो भ्रम से सिद्ध है—इसलिए मिथ्या है। जैसे स्वप्न की सृष्टि संकल्प से भासित होती है, वैसे ही यह सृष्टि भी भ्रम से भासित होती है और अज्ञान की रची हुई है। आत्मा के अज्ञान से भासित होती है और आत्मा के ज्ञान से लीन हो जाती है। जब सृष्टि है तब भी परमात्मतत्त्व ही है और जब सृष्टि न होगी तब भी परमात्मतत्त्व ही होगा। आगे भी वही था। यह जो कुछ प्रपञ्च तुझे दीखता है सो शून्य आकाश ही है। त्रिगुणमय प्रपञ्च गुणों का रचा हुआ अपने स्वरूप के प्रमाद से स्थित हुआ है। आत्मज्ञान से यह शून्य सदृश हो जावेगा। जब प्रपञ्च ही शून्य हुआ, तब आत्मा और अनात्मा का कहना भी न रहेगा। पीछे जो शेष रहेगा, वह केवल शुद्ध परमतत्त्व और तेरा अपना रूप है। उसमें स्थित हो रहे और दृश्य का त्याग-कर। यह विचार कि न मैं हूँ और न जगत् है। जब तू ऐसा होगा, तब तेरी जय होगी। आत्मपद सबसे उत्तम है। जब तू आत्मपद में स्थित होगा, तब सबसे उत्तम होगा और तेरी जय होगी—इससे आत्मपद में ही स्थित हो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे संगराडम्बरोत्पत्ति-
नाम शताधिकत्रयस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३३ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह प्रपञ्च भी आत्मा का चमत्कार है। आत्मा शुद्ध चैतन्य है, जिसमें जड़ और चेतन स्थित हैं। वह सबका अधिष्ठान है। वह सत्तामात्र तेरा अपना रूप है। वह अहं-त्वं शब्द-अर्थ से रहित आत्मतत्त्वमात्र है, पर सत्यस्वरूप होकर असत्य की भाँति स्थित है। हे विद्याधर ! तू इस जड़ और चेतन से अबोध हो रह। जब तू अबोध होगा, तब शान्त और चिद्घन होगा। ये जो
४०० ❊ योगवाशिष्ठ ❊
जड़ और चेतन हैं, इन दोनों का परमार्थ चैतन्य के ऊपर आवरण है। यद्यपि वह अदृश्य है तो भी इनके भीतर ही रहता है, जैसे समुद्र के भीतर बड़वाग्नि रहती है। इन जड़-चेतन रूपों का कारणरूप वही है। इनकी उत्पत्ति भी उर्मी में होती है, और नाश भी वही करता है। हे विद्याधर ! जब ऐसे जाना कि मैं चेतनरूप भी नहीं और जड़ भी नहीं तो पीछे जो रहेगा, वही तेरा स्वरूप है। जब तेरे भीतर इन जड़ और चेतन, दोनों का स्पर्श नहीं हुआ, तब सबके भीतर जो चैतन्य है, वही ब्रह्म तुझे भासित होगा। विश्व और आत्मा में कुछ अन्तर नहीं हुआ। जैसे सूर्य की किरणों का चमत्कार जलाभास होना है, वैसे ही शुद्ध चैतन्य का चमत्कार विश्व होकर दिखता है।
हे अङ्ग ! जैसे दीवाल पर पुतलियाँ लिखी होती हैं तो वे दीवाल में भिन्न चितेरे ने नहीं लिखी हैं, वैसे ही शून्य आकाश में चित्तरूपी चितेरे ने विश्वरूपी पुतलियों की कल्पना की है। जैसे सुवर्ण कल्पित भूषण सुवर्ण से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा में अज्ञान से जो विश्व देखते हैं, वह आत्मा से भिन्न नहीं। जगत, ब्रह्म, आत्मा, आकाश, देश, काल सब उर्मी तत्त्व की संज्ञा है। वही शुद्ध चैतन्य आकाश है, जिसका चमत्कार ऐसे स्थित है। उर्मी तत्त्व में तू भी स्थित हो रह। यह जगत् ऐसे है, जैसे दूर-दृष्टि से आकाश में बादल हाथी की सूँड़ से लगते हैं। यह जो अहँ-त्वं-रूप जगत् है सो अबोध से भासित होता और बोध से लीन हो जाना है—जैसे मरुस्थल में सूर्य की किरणों में जल दिखता है, वैसे ही यह जगत् है—इससे इसका त्याग करो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्तचमत्कारो नाम शताधिकचतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३४ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह सब स्थावर जङ्गम जगत् आत्मा में उत्पन्न हुआ है और आत्मा ही में स्थित है। आत्मा ही विश्व में स्थित है। जैसे स्वप्न का विश्व स्वप्न देखनेवाले में स्थित होता है। आत्मा किसी का कारण नहीं; क्योंकि अद्वैत है। हे अङ्ग ! जो तू उस पद के पाने की इच्छा करता है तो तू ऐसा निश्चय कर कि न मैं हूँ और
❉ निर्वाण प्रकरण ❉
४०१
न यह जगत् है। जब तू ऐसा जानेगा, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी, जो कि देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है। सर्वत्र सब वही परमात्मतत्त्व है। जगत् का कर्त्ता संकल्प ही है; क्योंकि संकल्प से जगत् उत्पन्न होता है। जैसे पवन से अग्नि उत्पन्न होता है और पवन ही से दीपक का निर्वाण होता है, वैसे ही जब संकल्प बहिर्मुख फुरता है, तब संसार उदय हो भासित होता है, और जब संकल्प अन्तर्मुख होता है, तब आत्मपद प्राप्त होता है, सब प्रपञ्च उर्मी में लय हो जाता है। इस प्रकार संसार की नाना प्रकार की संज्ञाएँ फुरने से ही होती हैं, स्वरूप में कुछ नहीं है। न सत्य है, न असत्य है, न स्वतः है, न अन्य से है। यह सब कल्पनामात्र है। सत्, असत् और स्वतः, अन्य का जब अभाव हुआ, तब वहाँ अहं-त्व कहाँ मिलेंगे? वह है नहीं और बालक के यक्षवत् भ्रममात्र है।
हे साधो ! जहाँ अहं-त्व नष्ट हो गये, वहाँ जो सत्ता बची वही परमपद है। जहाँ जगत् का भ्रम है, वहाँ वह विचार से लीन हो जाता है। वास्तव में पूछो तो ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं—नाम-मात्र दो हैं—जैसे घट और कुम्भ—परन्तु भ्रम से नानात्व भासित होता है। जैसे समुद्र में उठनेवाले आवर्त्त और तरङ्ग जल से कुछ भिन्न नहीं और पवन के संयोग से उनके आकार भासित होते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् कुछ भिन्न नहीं। संकल्प के उठने से नाना प्रकार का जगत् भासित होता है। हे अङ्ग ! संकल्प के साथ मिलकर चित्त जैसी भावना करता है, वैसा ही अपना रूप देखता है स्वरूप में कुछ भिन्न नहीं, परन्तु जीव भावना से और का और देखता है। जैसे शुद्ध मणि के निकट कोई रङ्ग रखिये, वैसा ही रंग भासित होता है, पर मणि में कोई रङ्ग नहीं होता, वैसे ही चित्त शक्ति में कुछ हुआ नहीं, पर हुए की नाईं स्थित है। इससे अपने स्वरूप की भावना करो और जड़ चैतन्य को छोड़कर शुद्ध चैतन्य में स्थित होओ। जब ऐसे जानकर अपने स्वरूप में स्थित होगे, तब तुम्हें उत्थान में भी अपना स्वरूप दिखेगा। जैसे स्थिर समुद्र में जो तरङ्ग उठते हैं, वे कारणरूप जल के
४०२ ❇ योगवाशिष्ठ ❇
विना नो नहीं होते, वैसे ही कारणरूप ब्रह्म विना जगत् नहीं है; परन्तु ब्रह्मसत्ता अकर्ता, अद्वैत और अच्युत है। इसी से कहा है कि ब्रह्म अकर्ता है और जगत् अकारणरूप है। जो जगत् अकारणरूप है सो वह न उपजता है और न नाश होता है—मरुस्थल के जल की तरह भ्रममात्र है। इसी से कहा है कि जगत् कुछ वस्तु नहीं, केवल अज, अच्युत और शान्तरूप आत्मतत्त्व ही अखण्डित स्थित है और शिला कोश की तरह अद्वैत चिन्मात्र है। जिसके हृदय में चिन्मात्र की भावना नहीं, उस मूर्ख को हम क्या कहें ! हे साधो ! वास्तव में परमार्थ दृष्टि से कुछ भी नहीं बना, पर जहाँ-जहाँ मन है, वहाँ-वहाँ अनेक जगत् हैं। तृण से सुमेरु तक सब जगत् में हैं। जो विचारकर देखिये तो सब वही ब्रह्मरूप है, और कुछ नहीं। जैसे सुवर्ण को जान लेने से भूषण भी सुवर्ण भासित होता है, वैसे ही केवल सत्ता समानपद एक अद्वैत है, भिन्न कुछ नहीं। और भिन्न-भिन्न संज्ञाएँ भी वही हैं।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे शताधिकपञ्चत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥१३५॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! जब आत्मपद प्राप्त होता है, तब ऐसी अवस्था होती है कि जो नग्न शरीर हो और उस पर बहुत शस्त्रों की वर्षा हो तो भी उसमें जीव दुःखी नहीं होता और सुन्दर अप्सरा कण्ठ से लगे तो हर्ष नहीं होता, अर्थात् दोनों ही में समदर्शी रहता है। हे विद्याधर ! तब तक आत्मपद का अभ्यास करे, जब तक संसार में सुषुप्ति की नाईं न हो जाय। अभ्यास ही से आत्मपद प्राप्त होगा। जब आत्मपद की प्राप्ति होगी, तब पाञ्चभौतिक शरीर को ताप या ज्वर स्पर्श न करेंगे, और यदि शरीर के हों भी, तो भी उनके अन्तःकरण में प्रवेश नहीं करते। वह केवल शान्तपद में स्थित रहता है—जैसे जल कमल को स्पर्श नहीं करता। हे देवपुत्र ! जब तक देहादि में अभ्यास है, तब तक आत्मा के प्रमाद से सुख-दुःख स्पर्श करते हैं। जब आत्मा का साक्षात्कार होता है, तब सब प्रपञ्च भी आत्मरूप हो जाते हैं। हे विद्याधर ! जैसे कोई पुरुष विष-पान करता है तो उसको जलन और खाँसी होती है—यह अवस्था विष की है—विष से भिन्न और कुछ
☸ निर्वाण प्रकरण ☸
४०३
नहीं परन्तु यह नामसंज्ञा हुई है । विष न जन्मता, न मरता है और जलन-स्वांमी उसमें देख पड़ती है, वैसे ही आत्मा न जन्मता है, न मरता है, और गुणों के साथ मिलकर भिन्न अवस्थाओं को प्राप्त हुआ देख पड़ता है ।
आत्मा जन्ममरण से रहित है, पर गुणों के साथ मिलने से जन्मता-मरता भासित होता है और अन्तःकरण, देह, इन्द्रियादिक भिन्न-भिन्न जान पड़ते हैं । हे साधो ! यह जगत् भ्रम से प्रतीत होता है । जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, वे इस जगत् को गाय के पैर के गढ़े की तरह अपने पुरुषार्थ से नाँघ जाते हैं, और जो अज्ञानी हैं, उनको अल्प भी समुद्र समान हो जाता है । इससे आत्मपद पाने का यत्न करो, जिसके जानने से संसारसमुद्र तुच्छ हो जायगा । वह आत्मतत्त्व सबमें अनुस्यूत और सबसे अतीत है । उसके जानने से अन्तःकरण शीतल हो जाता है और सब ताप नष्ट हो जाते हैं । हे साधो ! फिर उसका त्याग करना अविद्या और बड़ी मूर्खता है । हे साधो ! ये सब पदार्थ ब्रह्मस्वरूप ही हैं । जब ब्रह्मस्वरूप हुए तब मन, अहंकार, कलङ्क आदिक भी वही हैं—किसी से किसी को कुछ सुखदुःख नहीं । हे विद्याधर ! जब आत्मपद को जाना, तब अन्तःकरण आदि भी ब्रह्मस्वरूप भासित होंगे । जो संकल्प से भिन्न-भिन्न जाने जाते हैं, वे संकल्प के होते भी ब्रह्मस्वरूप भासित होंगे । इसलिए संकल्प हीन होकर स्थित हो, सोचो—न में हूँ, न यह जगत् है और न इदम् है । इन शब्दों और अर्थों से रहित होकर स्थित हो रहो, सब संशय मिट जावें ।
हे विद्याधर ! जब तू ऐसा निरहंकार और निःसंकल्प होगा, तब उत्थानकाल में भी बुद्धि, बोध, लज्जा, लक्ष्मी, स्मृति, यश, कीर्ति इत्यादिक जो शुभाशुभ अवस्था हैं, सब आत्मस्वरूप भासित होंगी और सबमें आत्मबुद्धि रहेगी । इनके प्राप्त होने पर भी केवल परमार्थ सत्ता से भिन्न न भासित होगा—जैसे अन्धकार में सर्प के पैर का चिह्न नहीं जान पड़ता क्योंकि वह है ही नहीं, वैसे ही तुमको सब अवस्थाएँ न भासित होंगी—सब आत्मा ही भासित होगा—
४०४ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
और जितने कुछ भावरूप पदार्थ स्थित हैं, वे अभाव हो जावेंगे। हे
अङ्ग! जिस पुरुष ने विचारकर आत्मपद पाने का यत्न किया है, वह
पावेगा और जिसने कहा कि मैं मुक्त हो रहूँगा और ईश्वर मुझ पर दया
करेंगे, वह पुरुष कभी मुक्त न होगा। पुरुष के प्रयत्न बिना कभी
मुक्ति न होगी। आत्मस्वरूप में न कोई दुःख है और न किसी गुण में
मिला हुआ सुख है। वह केवल शान्तरूप है। किसी से किसी को कुछ
सुख-दुःख नहीं; न सुख है और न दुःख है, न कोई कर्त्ता है और न
भोक्ता है, केवल ब्रह्मसत्ता अपने आपमें स्थित है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे शताधिकषट्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३६ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर! जैसे कोई कल्पना करे कि आकाश
में अन्य आकाश स्थित है तो वह मिथ्या प्रतीति है, वैसे ही आत्मा में
जो अहङ्कार उठता है वह मिथ्या है। जैसे आकाश में अन्य आकाश
कुछ वस्तु नहीं; परमार्थ तत्त्व ऐसा सूक्ष्म है कि उसमें आकाश भी
स्थूल है। वह ऐसा स्थूल है कि उसके आगे सुमेरु आदिक भी सूक्ष्म
आगुण है। राग-द्वेष से रहित चैतन्य केवल शान्तरूप है—गुण और
तत्त्व के क्षोभ से रहित है। हे देवपुत्र! निजानुभवरूपी चन्द्रमा अमृत
का बरसानेवाला है। हे अङ्ग! जितने दृश्य पदार्थ दिखते हैं, वे हुए
कुछ नहीं। हे अङ्ग! आत्मरूप अमृत की भावना कर, जिससे तू जन्म-
मरण के बन्धन से मुक्त हो। जैसे आकाश में दूसरे आकाश की कल्पना
मिथ्या है, वैसे ही निराकार चिदात्मा में अहं मिथ्या है। और जैसे
आकाश अपने आपमें स्थित है वैसे ही आत्मसत्ता अपने आपमें स्थित
और अहं-त्वं आदि से रहित है। जब उसमें अहं का उत्थान होता है,
तब जगत फैल जाता है—जैसे वायु जब फुग्ने में रहित होती है, तब
आकाशरूप हो जाती है, वैसे ही गंगित उत्थान अहं में रहित होने पर
आत्मरूप हो जाती है और जगत का भ्रम मिट जाता है।
फुग्ने में जगत फुर आया है; वास्तव में कुछ नहीं है। ज्ञानवान् को
आत्मा ही भासित होता है। देश, काल, बुद्धि, लज्जा, लक्ष्मी, स्मृति,
कांति सब आकाशरूप हैं—ब्रह्मरूपी चन्द्रमा के प्रकाश से प्रकाशमान
❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ४०५
होते हैं। जैसे बादलों के संयोग से आकाश धूमिल होता है, वैसे ही प्रमाद से संवित् दृश्यभाव को प्राप्त होती है; परन्तु और कुछ नहीं हो जाती। जैसे तरङ्ग उठने से जल और कुछ नहीं हो जाता और जैसे काष्ठ काटने से और कुछ नहीं हो जाता, वैसे ही द्रष्टा से दृश्य भिन्न नहीं होता। जैसे केले के खम्भे में पत्ते के सिवा और कुछ नहीं निकलता और पत्ते शून्यरूप हैं, वैसे ही यह जगत् भासित होता है, परन्तु आत्मा से भिन्न नहीं, शून्यरूप है। शीश, भुजा, नेत्र, चरण आदिक नाना अंग जो भिन्न-भिन्न भासित होते हैं, वे सब शून्यरूप केले के पत्तों की नाईं हैं और सब असाररूप हैं। हे विद्याधर ! चित्त में रागरूपी मलीनता है। जब वैराग्यरूपी झाडू से झाड़िये, तब चित्त निर्मल हो। जैसे दीवार पर चित्र लिखे जाते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् भासित होता है। देवता, मनुष्य, नाग, दैत्य आदि का यह सब जगत् संकल्परूपी चितेरे ने चित्र सदृश लिखे हैं। ये स्वरूप के विचार से निवृत्त हो जाते हैं। जब स्नेहरूप संकल्प फुरता है, तब भाव-अभावरूप जगत् फैल जाता है। जैसे जल में तेल के बूंद फैल जाते हैं और जैसे बाँस में अग्नि निकल-कर बाँस को दग्ध करती है, वैसे ही संकल्प इससे उपजकर इसी को खाते हैं। आत्मा में जो देश-काल-पदार्थ भासित होते हैं, वही अविद्या है-पुरुषार्थ से इसका अभाव करो। दो भाग साधुओं के संग और सत् कथा सुनकर नष्ट करो; तृतीय भाग को शास्त्र का विचार करके और चतुर्थ भाग को आत्मज्ञान का आप ही अभ्यास करके मिटाओ। इस उपाय से अविद्या नष्ट हो जावेगी और अशब्द, अरूपपद की प्राप्ति होगी।
विद्याधर ने पूछा, हे मुनीश्वर ! जिन चार भागों के नाश से अशब्द-पद प्राप्त होता है, वह काल का क्रम क्या है ? और नाम-अर्थ का अभाव होने पर शेष क्या रहता है ? भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! संसार-समुद्र के तरने को ज्ञानवानों का संग करना और जो विकृत-निर्वैर पुरुष हैं, उनका भली प्रकार टहल करना। इसमें अविद्या का अर्थ-भाग नष्ट होगा। तीसरा भाग मनन करके और चतुर्थ भाग अभ्यास
५०६ ☸ योगवाशिष्ठ ☸
करके नष्ट होगा। जो यह उपाय न कर सको तो यह युक्ति करो कि जिसमें चित्त अभिलाषा करके आसक्त हो, उसी का त्याग करो। एक भाग अविद्या इस प्रकार नष्ट होगी। तीन भाग शास्त्र-विचार और अपने यत्न से शनैः-शनैः नष्ट होवेगा। साधुसंग, सत्शास्त्र-विचार और अपना यत्न हो तो एकबारगी अविद्या नष्ट हो जावेगी। ये समकाल कहे हैं। एक-एक के सेवने में एक-एक भाग निवृत्त होता है। पीछे जो शेष रहता है, उसमें काम-अर्थ सब असतरूप हैं और वे अजर, अनन्त, एकरूप हैं। संकल्प के उपजने से पदार्थ भासित होते हैं और संकल्प के लीन होने पर लीन हो जाते हैं। हे विद्याधर! यह जगत् संकल्प ने रचा है-जैसे आकाश में सूर्य निराधार स्थित होता है, वैसे ही देश-काल की अपेक्षा से रहित यह मननमात्र स्थित है। तीनों जगत् मन के फुरने से प्रकट होते हैं और मन के लय होने में लय हो जाते हैं-जैसे स्वप्न के पदार्थ जागने में मिट जाते हैं। हे विद्याधर! ब्रह्मरूपी वन में एक कल्पवृक्ष है, जिसकी अनेक शाखाएँ हैं। उसकी एक शाखा में जगतरूपी गूलर का फल है, जिसमें देवता, दैत्य, मनुष्य, पशु आदिक मच्छर हैं। वासनारूपी रस से पूर्ण मज्जा पहाड़ है। पञ्चभूत सूत द्वारा उनका निकलने का खुला मार्ग इत्यादिक सुन्दर रचना बनी है।
उसमें त्रिलोकी का ईश्वर एक इन्द्र हुआ और गुरु के उपदेश से उसका आवरण नष्ट हो गया। फिर इन्द्र और दैत्यों का युद्ध होने लगा और इन्द्र अपनी सेना को ले चला। पर उसकी निर्बलता हुई, इसलिए वह भागा और दशों दिशाओं में घूमता रहा। पर जहाँ जावे, वहीं दैत्य उसके पीछे चले आवें। जैसे पापी परलोक में शोभा नहीं पाता, वैसे ही इन्द्र ने जब शान्ति न पाई, तब अणुमात्ररूप करके सूर्य के त्रसरेणु में प्रवेश कर गया। जैसे कमल में भृंग प्रवेश करे, वैसे ही उसने प्रवेश किया तो वहाँ उसको युद्ध का वृत्तान्त भूल गया। तब उसने एक मन्दिर में बैठा अपने को देखा। जैसे निद्रा से स्वप्न-सृष्टि प्रकट हो, वैसे ही उसने वहाँ रत्न और मणियों संयुक्त नगर देखा
✹ निर्वाण प्रकरण ✹
४०७
वह उसमें गया और पृथ्वी, पहाड़, नदियाँ, चन्द्र, सूर्य, त्रिलोकी उसको वहाँ दिखाई देने लगी। उस जगत् का इन्द्र अपने को उसमें देखा कि दिव्य भोग और ऐश्वर्य से सम्पन्न में इन्द्र स्थित हूँ। वह इन्द्र कुछ काल के उपरान्त शरीर को त्यागकर निर्वाण को प्राप्त हुआ—जैसे तेल से रहित दीपक निर्वाण होता है। तब कुन्द नाम उसका पुत्र इन्द्र हुआ और राज्य करने लगा। फिर उसके एक पुत्र हुआ। तब कुन्द भी इन्द्र शरीर को त्यागकर परमपद को प्राप्त हुआ और उसका पुत्र राज्य करने लगा। फिर उसके भी एक पुत्र हुआ। इसी प्रकार सहस्र पुत्र होकर राज्य करते रहे। उन्हीं के कुल में यह हमारा इन्द्र राज्य करता है। इससे यह जगत् संकल्पमात्र है और उस त्रसरेणु से यह सृष्टि है। इसलिए इस जगत् को संकल्पमात्र जानकर इसकी आस्था त्यागो।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे इन्द्रोपाख्याने त्रसरेणुजगत्-वर्णनन्नाम शताधिकसप्तत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३७ ॥
भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर! फिर उनके कुल में एक बड़ा श्रीमान् इन्द्र हुआ, जो त्रिलोकी का राज्य करता रहा और फिर निर्वाण को प्राप्त हुआ। उसके एक पुत्र था, जिसको बृहस्पतिजी के वचनों से ज्ञानरूप प्रतिभा उदय हुई। तब वह विदितवेद होकर स्थित हुआ। यथाप्राप्ति में इन्द्र होकर राज्य करने लगा और दैत्यों को जीता। एक समय वह किमी कार्य के लिए कमल के तन्तु में घुस गया तो वहाँ उसको नाना प्रकार का जगत् दिखने लगा और अपनी इन्द्र की प्रतिभा हुई। इससे उसे इच्छा हुई कि मैं ब्रह्मतत्त्व को पाऊँ और दृश्य पदार्थ की तरह उसे प्रत्यक्ष देखूँ। इसलिए वह एकान्त में बैठकर समाधि में स्थित हुआ। तब उसको भीतर-बाहर ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ और प्रतिभा के उदय होने से यह निश्चय हुआ कि सब ब्रह्म ही है और वही पूजने योग्य है। सब उर्मी को पूजते भी हैं। केवल शुद्ध आत्मपद सब शब्द, रूप, अवलोक और मनस्कार से रहित है। सब ओर उसी के पाणिपाद हैं। सब सिर और मुख उर्मी के हैं।
४०८ ❈ योगवाशिष्ठ ❈
सब ओर उसके श्रवण हैं। सब ओर उसके नेत्र हैं। आत्मतत्त्व में वही मनमें स्थित हो रहा है। सब इन्द्रियों और विषयों को वही प्रकाशित करता है। वह सब इन्द्रियों से रहित है और असक्त हुआ भी सबको धारण कर रहा है। वह निर्गुण है और इन्द्रियों के साथ मिलकर गुणों को भोगता है। वही सब प्राणियों के भीतर बाहर व्याप्त रहा है। सूक्ष्म है, इससे दुर्विज्ञेय है, और इन्द्रियों का विषय नहीं है। अज्ञानियों का अज्ञान के कारण दूर है और आत्मत्व द्वारा ज्ञानी को ज्ञान के कारण निकट है। वह अनन्त, सर्वव्यापी केवल शान्तरूप है, जिसमें दूसरा कोई नहीं। घट, पट, दीवार, गाय, आँदा, नाग, नर सबमें वही तत्त्व भाषित है। पर्वत, पृथ्वी, चन्द्र, सूर्य, देश, काल, वस्तु, सब ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न नहीं।
हे विद्याधर ! इस प्रकार इन्द्र को ज्ञान हुआ और वह जीवन्मुक्त हुआ। तब वह सब चेष्टा करता, परन्तु अन्तःकरण में नहीं बँधता। जब कुछ काल बीता, तब इन्द्र उस निर्वाणपद को प्राप्त हुआ, जिसमें आकाश भी स्थूल है। फिर उस इन्द्र का एक बड़ा शूरवीर पुत्र सब दैत्यों को जीतकर देवताओं और त्रिलोकी का राज्य करने लगा। फिर उसको भी ज्ञान उत्पन्न हुआ। मनशास्त्र और गुरु के वचनों से कुछ काल में वह भी निर्वाण को प्राप्त हुआ। तब उसका जो पुत्र था, वह राज्य करने लगा। इसी प्रकार कई इन्द्र राज्य करते और नाना प्रकार के व्यवहारों को देखते रहे। फिर उसके कुल में कोई पुत्र था, उसको यह हमारी सृष्टि भासित हुई तो वह भी ब्रह्मध्यानी हुआ और इस त्रिलोकी का राज्य करने लगा। अब तक विश्व का इन्द्र वही है। हे विद्याधर ! इस प्रकार विश्व की उत्पत्ति संकल्पमात्र है और सब मैंने तुमसे कही। पहले उसको त्रसरेणु में सृष्टि दिखी, फिर उस सृष्टि के एक कमल के तन्तु में दिखी। फिर उसमें कई वृत्तान्त, जो संकल्पमात्र थे, उसने देखे। फिर उस अणु में अनेक अवस्थाएँ देखीं। हे विद्याधर ! पर वास्तव में वह कुछ हुई नहीं। जैसे आकाश में नीलिमा भासित होती है, पर है नहीं वैसे ही यह विश्व है। आत्मा में विश्व का अत्यन्त अभाव
४१० ☸ योगवाशिष्ठ ☸
हे विद्याधर ! जो वायु हुई तो जल से भिन्न कुछ न हुआ और जो न हुई तो भी जल से भिन्न कुछ नहीं, जल ही है। वैसे ही अज्ञान के होने और निवृत्त होने पर भी आत्मपद ज्यों का त्यों है । परन्तु सम्यक्दर्शन से आत्मपद और अज्ञान से जगत् भासित होता है। अहं का होना ही अज्ञान है। जब अहं हुआ तब मम भी होता है। सो 'अहं' 'मम' नाम संसार का है। जब अहं-मम मिटता है, तब जगत् का अभाव होता है। अहं के होने दृश्य भासित होता है और दृश्य में अहं होता है। इसमें संवेदन को त्यागकर निर्वाणपद में प्राप्त हो । इतना कह भुशुण्डिजी ने मुझसे कहा कि हे वशिष्ठजी ! इस प्रकार जब मैंने विद्या-धर को उपदेश किया तो वह समाधि में स्थित होकर निर्वाणपद को प्राप्त हुआ। जैसे दीपक बुझ जाता है, वैसे ही उसका चित्त क्षोभ से रहित शान्ति को प्राप्त हुआ। हे ब्राह्मण ! उसका हृदय शुद्ध था, इस कारण मेरे वचन शीघ्र ही उसके हृदय में प्रवेश कर गये । जब वह समाधि में स्थित हुआ तो मैंने उसको बारम्बार जगाया परन्तु वह न जागा—जैसे कोई जलता-जलता शीतल समुद्र में जाकर बैठे और उसमें कहिये कि तू निकल तो वह नहीं निकलता; वैसे ही संसारताप से जलता हुआ जीव जब आत्मसमुद्र में गोता लगाता है, तब वह संसार के अज्ञानरूपी प्रवाह को नहीं देखता। हे वशिष्ठजी ! जिसका अन्तःकरण शुद्ध होता है, उसको थोड़े वचन भी बहुत हो लगते हैं। जैसे तेल की एक बूँद जल में बहुत फैल जाती है, वैसे ही जिसका अन्तःकरण शुद्ध होता है, उसको थोड़ा वचन भी बहुत होकर लगता है। पर जिसका अन्तःकरण मलिन होता है, उस पर वचन प्रभाव नहीं डालते। जैसे आरसी पर मोती नहीं ठहरता वैसे ही गुरुशास्त्र के वचन उसको नहीं लगते। जब विषयों से वैराग्य उपजे, तब जानिये कि हृदय शुद्ध हुआ।
हे वशिष्ठजी ! जब मैंने विद्याधर को उपदेश किया, तब वह शीघ्र ही आत्मपद को प्राप्त हुआ; क्योंकि उसका चित्त निर्मल था। हे मुनीश्वर ! जो तुमने मुझसे पूछा था सो मैंने कहा कि उस