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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1207, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1207

४०० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

जड़ और चेतन हैं, इन दोनों का परमार्थ चैतन्य के ऊपर आवरण है। यद्यपि वह अदृश्य है तो भी इनके भीतर ही रहता है, जैसे समुद्र के भीतर बड़वाग्नि रहती है। इन जड़-चेतन रूपों का कारणरूप वही है। इनकी उत्पत्ति भी उर्मी में होती है, और नाश भी वही करता है। हे विद्याधर ! जब ऐसे जाना कि मैं चेतनरूप भी नहीं और जड़ भी नहीं तो पीछे जो रहेगा, वही तेरा स्वरूप है। जब तेरे भीतर इन जड़ और चेतन, दोनों का स्पर्श नहीं हुआ, तब सबके भीतर जो चैतन्य है, वही ब्रह्म तुझे भासित होगा। विश्व और आत्मा में कुछ अन्तर नहीं हुआ। जैसे सूर्य की किरणों का चमत्कार जलाभास होना है, वैसे ही शुद्ध चैतन्य का चमत्कार विश्व होकर दिखता है।

हे अङ्ग ! जैसे दीवाल पर पुतलियाँ लिखी होती हैं तो वे दीवाल में भिन्न चितेरे ने नहीं लिखी हैं, वैसे ही शून्य आकाश में चित्तरूपी चितेरे ने विश्वरूपी पुतलियों की कल्पना की है। जैसे सुवर्ण कल्पित भूषण सुवर्ण से भिन्न नहीं, वैसे ही आत्मा में अज्ञान से जो विश्व देखते हैं, वह आत्मा से भिन्न नहीं। जगत, ब्रह्म, आत्मा, आकाश, देश, काल सब उर्मी तत्त्व की संज्ञा है। वही शुद्ध चैतन्य आकाश है, जिसका चमत्कार ऐसे स्थित है। उर्मी तत्त्व में तू भी स्थित हो रह। यह जगत् ऐसे है, जैसे दूर-दृष्टि से आकाश में बादल हाथी की सूँड़ से लगते हैं। यह जो अहँ-त्वं-रूप जगत् है सो अबोध से भासित होता और बोध से लीन हो जाना है—जैसे मरुस्थल में सूर्य की किरणों में जल दिखता है, वैसे ही यह जगत् है—इससे इसका त्याग करो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्तचमत्कारो नाम शताधिकचतुस्त्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३४ ॥

भुशुण्डिजी बोले, हे विद्याधर ! यह सब स्थावर जङ्गम जगत् आत्मा में उत्पन्न हुआ है और आत्मा ही में स्थित है। आत्मा ही विश्व में स्थित है। जैसे स्वप्न का विश्व स्वप्न देखनेवाले में स्थित होता है। आत्मा किसी का कारण नहीं; क्योंकि अद्वैत है। हे अङ्ग ! जो तू उस पद के पाने की इच्छा करता है तो तू ऐसा निश्चय कर कि न मैं हूँ और