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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1208, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1208

❉ निर्वाण प्रकरण ❉

४०१

न यह जगत् है। जब तू ऐसा जानेगा, तब आत्मपद की प्राप्ति होगी, जो कि देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से रहित है। सर्वत्र सब वही परमात्मतत्त्व है। जगत् का कर्त्ता संकल्प ही है; क्योंकि संकल्प से जगत् उत्पन्न होता है। जैसे पवन से अग्नि उत्पन्न होता है और पवन ही से दीपक का निर्वाण होता है, वैसे ही जब संकल्प बहिर्मुख फुरता है, तब संसार उदय हो भासित होता है, और जब संकल्प अन्तर्मुख होता है, तब आत्मपद प्राप्त होता है, सब प्रपञ्च उर्मी में लय हो जाता है। इस प्रकार संसार की नाना प्रकार की संज्ञाएँ फुरने से ही होती हैं, स्वरूप में कुछ नहीं है। न सत्य है, न असत्य है, न स्वतः है, न अन्य से है। यह सब कल्पनामात्र है। सत्, असत् और स्वतः, अन्य का जब अभाव हुआ, तब वहाँ अहं-त्व कहाँ मिलेंगे? वह है नहीं और बालक के यक्षवत् भ्रममात्र है।

हे साधो ! जहाँ अहं-त्व नष्ट हो गये, वहाँ जो सत्ता बची वही परमपद है। जहाँ जगत् का भ्रम है, वहाँ वह विचार से लीन हो जाता है। वास्तव में पूछो तो ब्रह्म और जगत् में कुछ भेद नहीं—नाम-मात्र दो हैं—जैसे घट और कुम्भ—परन्तु भ्रम से नानात्व भासित होता है। जैसे समुद्र में उठनेवाले आवर्त्त और तरङ्ग जल से कुछ भिन्न नहीं और पवन के संयोग से उनके आकार भासित होते हैं, वैसे ही आत्मा में जगत् कुछ भिन्न नहीं। संकल्प के उठने से नाना प्रकार का जगत् भासित होता है। हे अङ्ग ! संकल्प के साथ मिलकर चित्त जैसी भावना करता है, वैसा ही अपना रूप देखता है स्वरूप में कुछ भिन्न नहीं, परन्तु जीव भावना से और का और देखता है। जैसे शुद्ध मणि के निकट कोई रङ्ग रखिये, वैसा ही रंग भासित होता है, पर मणि में कोई रङ्ग नहीं होता, वैसे ही चित्त शक्ति में कुछ हुआ नहीं, पर हुए की नाईं स्थित है। इससे अपने स्वरूप की भावना करो और जड़ चैतन्य को छोड़कर शुद्ध चैतन्य में स्थित होओ। जब ऐसे जानकर अपने स्वरूप में स्थित होगे, तब तुम्हें उत्थान में भी अपना स्वरूप दिखेगा। जैसे स्थिर समुद्र में जो तरङ्ग उठते हैं, वे कारणरूप जल के