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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1197, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1197

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असत्य है। आत्मा का साक्षात्कार होने पर परमात्मतत्त्व ही भासित होगा, तब अहंकार का उत्थान निवृत्त होगा। हे राम ! एक और युक्ति सुनो, जिससे आत्मज्ञान होगा। यह जो अहं-अहं क्षण-क्षण में फुरता है, सो जब फुरे तभी उस क्षण में जानो कि मैं नहीं हूँ। जब ऐसे दृढ़ होगे, तब अहंकाररूपी पिशाच का नाश हो जावेगा और आत्मतत्त्व का साक्षात्कार होगा। इससे अहंकार के नाश का यत्न कर सोचो कि 'न मैं हूँ' 'न जगत् है'। हे राम ! ज्ञान इसी का नाम है कि 'अहं', 'मम' न रहे। उसको मुनीश्वर परब्रह्म और सम्यक्पद कहते हैं। और जहाँ अहं-मम है, वहाँ अविद्यारूपी तम है। हे राम ! अज्ञानी के हृदय में सब पदार्थों का भाव स्थित है, इससे उसको देश, काल, घर, नगर, मनुष्य, पशु, पक्षी आदिक त्रिगुणमय संसार भासित होता है। जब इनका अभाव हो जाय, तब शान्तिपद की प्राप्ति हो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे अहंकारनाशविचारो नाम शताधिकत्रिंशत्तमस्सर्गः ॥ १३० ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिसके मन से 'मैं' और 'मेरे' का अभिमान चला गया है, उसको शान्ति हुई है। जिसके हृदय में 'मैं' 'देह' 'मेरे सम्बन्धी', 'गृह' आदिक का अभिमान है, उसको कदापि शान्ति नहीं, और शान्ति बिना सुख नहीं। हे राम ! प्रथम आप बनता है, तब जगत् है। जो आप न बने तो जगत् कहाँ हो ? इसका होना ही अनर्थ का कारण है। जिस पुरुष ने अहंकार का त्याग किया है, वह सर्वत्यागी है। जिसने अहंकार का त्याग नहीं किया, उसने कुछ नहीं त्यागा। जिसने क्रिया का त्याग किया और अपने को सर्वत्यागी मानता है, उसका यह विचार मिथ्या है। जैसे वृक्ष की डालें काटिये तो वह फिर उगता है, उसका नाश नहीं होता, वैसे ही कर्म के त्याग से त्याग नहीं होता। जो त्यागने योग्य अहंकार नहीं नष्ट होता तो कर्म फिर उपजते हैं। इससे अहंकार का त्याग करो, तब सर्वत्यागी होगे। इसका नाम महात्याग है। तब स्वप्न में भी संसार न भासित होगा। जाग्रत् का क्या कहना है। उसको संसार का ज्ञान कदापि