सामग्री पर जाएँ
भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1196, कुल 1734 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1196

३८८ ( योगवासिष्ठ )

उसको मुनीश्वर चैतन्य मात्र कहते हैं। उस अपने स्वरूप के प्रमाद से ही जीव दुख पाता है।

हे राम ! जो पुरुष गृहस्था में स्थित है, पर अहंकार से रहित है, उसको वनवासी जानो, उसे सदा एकान्त है। और जो वनवासी अहँ-कार-सहित है, वह सदा जनों में स्थित है। प्रथम तो वह एक गढ़े में था, फिर उसको त्यागकर दूसरे गढ़े में पड़ा है; अर्थात् वेषधारी है और बनवास लिया है। ईश्वर चाहे तो निकाले नहीं, क्योंकि बड़े कूप में पड़ा है। हे राम ! जो पुरुष अर्थत्याग करता है या एक अङ्ग का त्याग करता है और दूसरे को अङ्गीकार करता है, ऐसा पुरुष अपने को निष्काम मानता है, पर उसको यह त्यागरूपी पिशाचिनी भोगती है। हे राम ! यह जीव निष्कर्म तभी होता है, जब इसकी अहँवेदना नष्ट होती है, अन्यथा नहीं होता। इससे कर्म को मूल से उखाड़ो। जैसे कुल्हाड़ा बेलि और वृक्ष को मूल से काटता है, वैसे ही काटो। अहँवेदना ही मूल है, उसको काटना चाहिए।

हे राम ! पुरुषप्रयत्न उसी का नाम है कि अपने अहँ का नाश करना और आपही शेष रहना। देह से भिन्न हुआ जीव अपने को कर्त्ता-भोक्ता जानता है। उस अहँ का नाश करना और शिवपद को प्राप्त होना एक ही बात है। जो सर्वदा मङ्गलरूप अद्वैत है—यह विश्व भी उसका चमत्कार है। जैसे नारियल में खोपड़ा होता और उसके बहुत नाम रखते हैं, सो नारियल से कुछ भिन्न नहीं, वैसे ही संसार आत्मा से भिन्न नहीं। जैसे खम्भे में काष्ठ से भिन्न कुछ नहीं, वैसे ही यह संसार है। यह नानात्व भी चैतन्य घन आत्मा ही है। निज अक्षर का जो अर्थ कहा है, वह भी जब यही है, तब विधि-निषेध किसका कीजिये ? सब परमात्मतत्त्व है, दूसरा नहीं। हे राम ! ऐसे आत्मा को जानकर सुख से विचरो। जैसे अर्द्धनिद्रित की चेष्टा होती है और जैसे बालक पालने में सोकर स्वाभाविक अङ्ग हिलाता है, वैसे ही तुम्हारी चेष्टा होगी, अपने देह का अभिमान तुम न करो। हे राम ! जो कुछ भाव-अभाव पदार्थ भिन्न-भिन्न भासित होते हैं, वे