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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1195, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1195

✴ निर्वाण प्रकरण ✴ ३८७

है, वह नहीं होती और जो सत्य है उसका अभाव नहीं होता । फिर आप कैसे कहते हैं कि अहं संवेदन का नाश करो ? ये तो सत् भासित होते हैं, इनका नाश कैसे हो ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तुम सच कहते हो कि जो वस्तु असत्य है, वह नहीं होती और जो सत्य है, उसका नाश नहीं होता । हे राम ! यह जो अहंकार दृश्य तुमको भासित होता है, सो कभी नहीं हुआ, मिथ्या कल्पित है । जैसे रस्सी में सर्प होता है, वैसे ही आत्मा में अहंकार है और जैसे सूर्य की किरणों में जलाभास होता है, वैसे ही आत्मा में अहंकार का शब्द अर्थ फुरता है । यह शब्द और अर्थ मिथ्या है । इसका लक्षण यह है कि मैं हूँ सो कल्पित है; आत्मा केवल शुद्धस्वरूप है; उसमें अहं-त्वं का शब्द अर्थ कोई नहीं । ये अबोध से भासित होते हैं और बोध में लीन हो जाते हैं । वेदना का बोध अनर्थ का कारण है और अबोध तम है । जब यह निर्वाण हो, तब कर्म का बीज मूल से कटे । हे राम ! जो कर्मों का त्यागकर एकान्त में जाकर बैठता है, और ऐसे मानता है कि मैं कर्म नहीं करता, वह केवल मुख से कहता ही है, पर वास्तव में अहंकारयुक्त है, इससे फल को भोगता ही है; क्योंकि अहंकार सहित जीव फिर कर्म करेगा । वह आत्मज्ञान बिना अनात्म में मिलकर अपने को कर्ता भोक्ता आदि मानता है । जो पुरुष कर्म-इन्द्रियों से चेष्टा करता है और आत्मा को लिप्त नहीं जानता, वह अकर्ता ही है—उसके करने से कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होते और न करने से भी नहीं होते । ऐसा पुरुष परम निर्वाणपद को प्राप्त होता है, जिस पद में वाणी की गति नहीं । हे राम ! उसमें स्फुरण कोई नहीं—केवल चमत्कार है, अर्थात् हुआ कुछ नहीं और भासित होता है । जैसे बेल की मज्जा बेल से भिन्न नहीं, वैसे ही यह जगत् है । जैसे सोने से भूषण भिन्न नहीं, वैसे ही निज शब्द का अर्थ है; पर ये भिन्न-भिन्न शब्द अर्थ तब तक भासित होते हैं, जब तक अहं वेदना है । हे राम ! आत्मपद सदा अपने आपमें स्थित है । जैसे पत्थर अपनी जड़ता में स्थित है, वैसे ही आत्मा चैतन्य घनता में स्थित है ।

योगवाशिष्ठ महारामायण · पृष्ठ 1195, कुल 1734 में से · BharatKosha