योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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में हेयोपादेय बुद्धि करे ? हे राम ! जब तक अज्ञान है, तब तक इच्छा नष्ट नहीं होती और कर्म भी नष्ट नहीं होते। नाश दोनों का नहीं होता, परन्तु भेद इतना ही है कि अज्ञानी को भासित होता है कि यह इच्छा है, यह कर्म है। ज्ञानवान को सब ब्रह्म ही भासित होता है, इससे वह सुखी रहता है और अज्ञानी को कर्म में कर्म भासित होता है, इसलिए वह बन्धन में पड़ता है। कर्म में कर्मबुद्धि जाने को त्याग कहते हैं; क्रिया का त्याग करने को त्याग नहीं कहते। हे राम ! बड़ी उपाधि अहंकार है। जिसका अहंकार नष्ट हुआ है, वह पुरुष कर्म करता है तो भी उसने कर्त्ता कुछ नहीं किया। और जो अहंकारसहित है, वह पुरुष जो चुप हो बैठता है तो भी सब कर्म करता है। इस अहं के त्याग का नाम सर्वत्याग है; क्रिया के त्याग का नाम सर्वत्याग नहीं। सब कर्मों के बीज अहंकार को त्यागना और परम शान्ति को पाना ही पुरुषप्रयत्न है।
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे कर्मबीजदाहोपदेशं नाम शताधिकनवविंशत्तमस्सर्गः ॥ १२९ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस संवेदन का होना ही अनर्थ है कि जीव अपने को कुछ जानता है। जब यह निवृत्त हो, तभी इसको आनन्द प्राप्त हो। हे राम ! ज्ञानी की चेष्टा अहंकार से रहित स्वाभाविक होती है। जैसे अर्धनिद्रित पुरुष होता है वैसे ही ज्ञानी अपने स्वरूप में मग्न रहता है। जैसे हाथी मद में उन्मत्त होता है, वैसे ही ज्ञानवान् स्वयंब्रह्म चिदानन्द में मग्न रहता है। जैसे कामी को काम का व्यसन होता है, वैसे ही सुन्दरूपी स्त्री को पाकर ज्ञानी मग्न रहता है क्योंकि वह निरहंकार है। सब दुःखों का बीज अहंकार है। जब अहंकार नष्ट हो तब आनन्द हो। हे राम ! संसाररूपी विष की बेलि का बीज अहंकार है। जब अहंकार का अभाव हो, तब संसार का भी अभाव होता है। हे राम ! अहंकार ही दुःख का मूल है। इस संवेदन का विस्मरण बड़ा कल्याणकारक है। अनात्मा में मिलकर अपने को मानना या अहंभाव ही अनर्थ है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो वस्तु असत