योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1193, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें⚛ निर्वाण प्रकरण ⚛ ३८५
है, जिसका बीज कर्म है । पाणि, पाद आदिक पत्ते हैं । रुधिर, स्वास और वासना रस और सुख-दुःख फल है । जाग्रत् कर्म वासनारूपी वसन्तऋतु है । उसमें वह प्रफुल्लित होता है । और सुषुप्ति पापकर्मरूपी शरत्काल है । उसमें सूख जाता है । ऐसा शरीररूपी वृक्ष है । जवानी-रूपी उसकी कली है, जो क्षण भर सुन्दर रहती है । जरारूपी फल इसको हँसते हैं और रागद्वेषरूपी वानर क्षण-क्षण में हिलाते हैं ।
जाग्रत् वसन्तऋतु है जो सुषुप्तिरूपी हिम उत्पन्न करती है । यह वृक्ष वासनारूपी रस से बढ़ता है । पुत्र, कलत्र आदिक तृण और बांस हैं । इन्द्रियों के छिद्ररूपी मुख हैं, जिनसे शरीर की चेष्टा होती है । ज्ञान इन्द्रियाँ पाँच स्तम्भ हैं, जिनसे यह वृक्ष सधा है । इच्छारूपी बेलि है, जो अपने-अपने को चाहती है । बड़ा स्तम्भ इसका मन है, जो सबको धारण करता है । पञ्चप्राण इसके रस हैं । उनसे यह प्रत्यक्ष सब विषयों को ग्रहण करता है । इसका बीज जीव है । जीव चैतन्योन्मुखत्व चेतन को कहते हैं । जीवत्व का बीज संवित् है, जिसका मात्रपद से उत्थान हुआ है । उस संवित् का बीज ब्रह्म है—जिसका बीज कोई नहीं है । हे भगवन् ! सबका मूल संवित् का फुरना है । जब इसका अभाव होता है, तब आत्मा ही शेष रहता है । हे भगवन् ! यह तो मैं जानता हूँ । आगे आप भी कुछ कृपा करके कहिये । हे भगवन् ! जब तक चित्त से सम्बन्ध है, तब तक संसार में जन्म-मरण होता है, और जब जीव चित्त से रहित होता है तब परब्रह्म हो जाता है—वह शिवपद अनिच्छित, शान्त और अनन्तरूप है । चिन्मात्र में जो अहं का उत्थान है, वही कर्मरूपी वृक्ष का कारण है । जब तक अनात्मा से मिलकर जीव कहता है कि 'मैं हूँ' तब तक वही संसार का कारण है । यह आपके वचनों से मैंने समझा है, सो सुना दिया । आगे कुछ कृपा करके आप भी कहिये ।
वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसी प्रकार कर्म का बीज सूक्ष्म संवित् है । जब तक संवित् है, तब तक कर्मों का बीज नष्ट नहीं होता । और ये सब संज्ञाएँ इसी की हैं । कर्मों का बीज इच्छा, तृष्णा, अज्ञान, चित्त और ग्रहणत्याग की बुद्धि इत्यादिक बहुत सी संज्ञाएँ हैं । क्या किसी