योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
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है, तब आनन्द मिलता है। यह मेरा उपदेश है। अब तुम्हारी जो इच्छा हो सो करो।
इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे इच्छाचिकित्सोपदेशन्नाम शताधिकाष्टविंशतितमस्सर्गः ॥ १२८ ॥
वशिष्ठजी बोले, हे राम! अद्वैत आत्मा—जिसको एक या दो नहीं कह सकते—अपने आप स्वभाव में स्थित है। अन्तःकरण-चतुष्टय बाह्य पदार्थ सब चेतनमात्र हैं, आत्मा से कुछ भिन्न नहीं। रूप, इन्द्रियाँ और मन का फुरना, देश और काल, सब आत्मरूप ही हैं। जैसे बालक मिट्टी की सेना बनाकर हाथी, घोड़े, राजा, प्रजा, आदि नाम रखता है, सो सब मिट्टी है—भिन्न कुछ नहीं; वैसे ही अहं-मम आदिक भी सब आत्मरूप हैं—कुछ पृथक् नहीं। जैसे मिट्टी में हाथी, घोड़ा आदि नाम कल्पित हैं, वैसे आत्मा में ही जगत् कल्पित है—आत्मा से भिन्न कुछ नहीं। इस अहंकार को त्याग करो कि आत्मपद से भिन्न कुछ न फुरै। हे राम! रूप, अवलोक और नमस्कार, ये सब शिवरूपी मृत्तिका के नाम हैं। जब मापक, मान, मेय आदि सब वही रूप हुए तब किसमें किसको संचित कहिये? यह अहं-मम आदिक भी चिदाकाश से कुछ भिन्न वस्तु नहीं। इनको ऐसे जानकर संवेदनहीन शिला की तरह निःसंग हो रहो।
राम ने पूछा, हे भगवन्! आपने कहा कि अहं-मम फुरने का त्याग करो, यह मिथ्या है, और अहं-मम असत् है। ज्ञानी ऐसी भावना करते हैं कि इनकी सत्ता कुछ नहीं और तुम असंग हो रहो। यह असंग निष्कर्म से होता है अथवा कर्म से होता है, यह कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह तुम्हीं कहो कि कर्म क्या है और निष्कर्म क्या है; इनका कारण कौन है और इनका नाश कैसे हो और नाश होने से क्या सिद्धि होगी। जो तुम जानते हो तो कहो। राम बोले, हे भगवन्! जैसे आपसे सुना है और समझा है वही में कहता हूँ। वस्तु-नष्ट करनी हो, उसका निश्चय करके मूल से नाश कीजिये, तभी उसका नाश होता है। शाखा और पत्र काटने से उसका नाश नहीं होता। इससे इनका क्रम सुनो। इस संसाररूपी वन में देहरूपी वृक्ष