योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1191, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३८३
है कि तृष्णा का नाश करो। कर्म के फल की तृष्णा न हो और कर्म के करने की भी इच्छा न हो। इन दोनों को त्यागकर स्वरूप में स्थित हो रहो। बल्कि ऐसा भी निश्चय न हो कि मैंने त्याग किया है। हे राम! जिस पुरुष ने कर्म को त्याग दिया है और अहंकारसहित है, उसने पुण्य और पाप सब कुछ किया है, और जिसमें अहंभाव नहीं है, वह चाहे जैसे कर्म करे तो भी कुछ नहीं करता। वह बन्धन को नहीं प्राप्त होता। जो न करने में अभिमानसहित है, उसको कर्त्ता देखते हैं, वह बन्धन में पड़ा है। हे राम! ऐसे आत्मा को जानकर अहं-मम का त्याग करो। ऐसे संवेदन के त्यागने में कुछ यत्न नहीं करना पड़ता। स्मृति उसकी होती है, जिसका अनुभव होता है। पर जिसका अनुभव नहीं, उसका त्याग करना सुगम है। अनुभव प्रत्यक्ष देखने को कहते हैं। तुम्हारे स्वरूप में विश्व नहीं है तो अनुभव क्या हो। ये पदार्थ जो तुमको भासित होते हैं, उनके कारण को जानो। इनका कारण अनुभव है। जब इनका अनुभव ही मिथ्या है, तब स्मृति कैसे सत् हो? रस्सी में सर्प का अनुभव हुआ और फिर स्मरण किया कि वहाँ सर्प देखा था। तो जब सर्प का अनुभव ही मिथ्या है, तब फिर उसका स्मरण कैसे सत् हो? इससे जो वस्तु मिथ्या है, उसके त्यागने में क्या यत्न है?
जब प्रपञ्च को मिथ्या जाना, तब तुमको कोई कर्म बन्धन का कारण न होगा; चेष्टा स्वाभाविक होगी और रागद्वेष जाता रहेगा। जैसे शरत्काल की वेलि सूख जाती है और उसका आकार देख पड़ता है, वैसे ही तुम्हारा चित्त देखने में आयेगा और चित्त का धर्म जो रागद्वेष है, वह जाता रहेगा—वह चित्त सत्पद को प्राप्त होगा। जब सबका विस्मरण (बाध) होता है, उसको शिवपद कहते हैं। वह परमपद ब्रह्म-शब्द-अर्थ से रहित केवल चिन्मात्र अद्वैत पद है। उसमें अहं-मम का त्याग करके स्थित रहो। संसार इसी का नाम है कि मैं हूँ और यह मेरा है। इसको त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो। हे राम! जब तक अहं-मम का संवेदन है, तब तक दुःख नहीं मिटते। जब यह संवेदन मिटता