योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1174, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें३६६ ❇ योगवाशिष्ट ❇
यह भी संसार में मर्यादा है कि जैसा किमी को निश्चय होता है, वैसा ही वह संसार को देखता है। पिण्ड में भी शरीर होता है, क्योंकि यह भी आदि-नीति में निश्चय हुआ है। जैसे आदि-नीति में निश्चय हुआ है, वैसे ही होता है। जो पवन है सो पवन ही है और जो अग्नि है सो अग्नि ही है। इसी प्रकार कल्पपर्यन्त जैसे मनोराज्य हुआ है; वैसे ही स्थित है। जैसे जल नीचे ही को जाता है, ऊपर नहीं जाता, वैसे ही जो आदि में निश्चय हुआ है वही कल्पभर रहता है। हे राम! जगत् व्यवहार में तो ऐसे हैं और परमार्थ में दूसरा कुछ हुआ नहीं। इस जीव ने आकाश में मिथ्या देह रची है। परमार्थ दृष्टि से केवल निराकार अद्वैत आत्मा है, शरीर इसके साथ नहीं है। इससे जगत् कैसे हो?
इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे पिण्डनिर्णयो नाम शताधिकविंशतितमस्सर्गः ॥ १२० ॥
वशिष्टजी बोले, हे राम! अपने प्रश्न पर बृहस्पति और राजा बलि का एक इतिहास सुनो। जब छः कल्प व्यतीत हुए तो दूसरे परार्द्ध में राजा बलि हुआ। वह महापराक्रमी था। उस राजा बलि ने सम्पूर्ण दैत्यों और राक्षसों को जीतकर अपने वश में किया और उन पर अपनी आज्ञा चलाई। इन्द्र को भी जीतकर अपने वश में किया और उसका सम्पूर्ण ऐश्वर्य ले लिया। देवताओं और किन्नरों पर उसकी आज्ञा चली और भूलोक भी उसने ले लिया। जब वह सब ले चुका, तब उसने धर्म-आचार को ग्रहण किया। एक समय सब सभा जुड़ी थी, उसमें यह चर्चा चली कि जन्म कैसे होता है और मरण कैसे होता है? तब राजा बलि ने देवगुरु बृहस्पति से प्रश्न किया कि हे ब्राह्मण! यह पुरुष जब मृतक होता है, तब शरीर तो भस्म हो जाता है, फिर कर्मों के फल यह कैसे भोगता है और शरीर बिना कैसे आता-जाता है, सो कहिये?
बृहस्पति बोले, हे राजन! जीव के देह नहीं है। जैसे मरुस्थल में जल भासित होता है पर वास्तव में होता नहीं, वैसे ही जीव के साथ शरीर भासित होता है, पर है नहीं। जीव न जन्मता है, न मरता है,