योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1173, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३६५
शुभ कर्म हैं, इनके करने से स्वर्ग-सुख ही भोगते हैं और ये अशुभ कर्म हैं, इनके करने से नरकदुःख भोगते हैं। हे राम! जैसे वेद में निश्चय किया है, वैसे ही जीव अपनी वासना के अनुसार भोगता है। हे राम! यह रचित शक्ति नीति होकर ब्रह्मादिक में फुरी है। परन्तु उन देवों को सदा स्वरूप में निश्चय है, इससे वे संसार में नहीं बँधते। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र ने यह वेद रचा है कि जैसा कोई कर्म करे, वैसा ही फल वे देते हैं। यह वेद सबकी नीति है।
हे राम! जिन पुरुषों को संसार की सत्यता दृढ हुई है, वे शुभ अथवा अशुभ जैसे कर्म करते हैं, वैसे ही शरीर को धारण करते हैं। इसमें संशय नहीं कि जो शास्त्रमर्यादा का अपनी इच्छा से उल्लंघन करते हैं, वे शरीर त्यागकर कुछ काल तक मूर्च्छित हो जाते हैं और आत्मज्ञान बिना एक मुहूर्त में जागकर बड़े नरकों को चले जाते हैं। जिनको शून्यभावना हुई है कि आगे नरक-स्वर्ग कोई नहीं, और जो लोक-परलोक के भय को त्यागकर शास्त्र बाह्य आचरण करते हैं, वे मरकर पत्थर, वृक्षादिक की जड़योनि पाते हैं। चिरकाल से वासना बलवती होने के कारण वे फिर दुःख के भागी होते हैं। और जिनको आत्मभावना हुई है और संसार की भावना निवृत्त हुई है, वे शास्त्र-विहित करें, अथवा शास्त्रविरुद्ध करें, उनका कोई बन्धन नहीं होता। हे राम! मनुष्य चित्तरूपी भूमि में निश्चयरूपी जैसा बीज बोता है, वैसा ही काल पाकर उगता है—यह निःसंशय है। इससे तुम आत्म-भावणारूप बीज बोओ, समझो कि सब आत्मा ही है। ऐसी भावना करो, तब शुद्ध आत्मा ही भासित होगा और जिनका संसार का निश्चय हुआ है, उनको संसार है। हे राम! जो पुरुष धर्मात्मा हैं, उनको उसी वासना के अनुसार भासित होता है। धर्मात्मा भी दो प्रकार के हैं—एक सकाम और दूसरे निष्काम। जो धर्म करते हैं और पापरूपी कामना सहित हैं, वे स्वर्गभोग भोगकर फिर गिरते हैं। और जो निष्काम ईश्वरार्पण कर्म करते हैं, उनका अन्तःकरण शुद्ध होकर ज्ञान की प्राप्ति होती है।