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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1172, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1172

३६४ * योगवाशिष्ठ *

नाना प्रकारों में एक आत्मा ही दीखता है और अज्ञानी को नाना प्रकार का जगत् दीखता है । हे राम ! ब्रह्मरूपी एक शिला है, उसमें त्रिलोकीरूपी अनेक पुतलियाँ कल्पित हैं। जैसे एक शिला में शिल्पी जब पुतलियों की कल्पना करता है कि इसमें इतनी पुतलियाँ होंगी, तब वे पुतलियाँ उसके चित्त में हैं, और शिला में कुछ नहीं हुआ, तैसे ही आत्मरूपी शिला में चित्तरूपी शिल्पी जो नाना प्रकार के पदार्थ-रूपी पुतलियों की कल्पना करता है सो सब आत्मरूप हैं। इसमें पदार्थों की भावना त्यागकर आत्मा में स्थित हो । यह संसार भी निर्वाच्य है; क्योंकि यह ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न नहीं । न कोई उपजता है, न कोई नष्ट होता है, ज्यों का त्यों आत्मा ही स्थित है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगदभावप्रतिपादनं नाम शताधिकैकोनविंशतितमस्सर्गः ॥ ११९ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो इस संसार का बीज अहंकार हुआ । उसका पिता अहंकार है तो मिथ्या संसार जो अविद्यमान ही विद्यमान लगता है सो भी भ्रमरूप हुआ ? और जो संसार भ्रमरूप है तो लोग और शास्त्र, श्रुतियाँ और स्मृतियाँ क्यों कहती हैं कि इसका शरीर पिण्ड में होता है ? और जो पिण्ड में होता है तो आप कैसे उसे भ्रम कहते हैं ? जो भ्रम है तो लोक, शास्त्र, श्रुतियाँ और स्मृतियाँ क्यों उसे पिण्ड में कहती हैं ? इस मेरे संशय को निवृत्त कीजिये । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मेरा कहना सत्य है । ब्रह्म में ब्रह्मत्व स्वभाव है और जगत् का स्वरूप भी वही है । हे राम ! आदि जो किञ्चित् हुआ और चित्तशक्ति फुरी, वही ब्रह्मरूप हुआ और उसको पदार्थों का मनोराज्य हुआ । यह आकाश है, यह पवन है, यह कर्तव्य है, यह अकर्तव्य है, यह सत्य है, यह झूठ है इत्यादि मनोराज्य जब तक है तब तक सब मर्यादा ऐसी ही है । फिर ब्रह्मा ने यह सोचा कि जगत् की मर्यादा के निमित्त वेद में कहूँ कि यह पदार्थ शुभ है और यह अशुभ है । हे राम ! आत्मा में कुछ द्वैत नहीं । मायारूप जगत् में मर्यादा है, तो अधः, ऊर्ध्व, नीच, ऊँच कौन कहे ? यह मर्यादा भी वेद में नीति निश्चय हुई है कि ये