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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

३६४ * योगवाशिष्ठ *

नाना प्रकारों में एक आत्मा ही दीखता है और अज्ञानी को नाना प्रकार का जगत् दीखता है । हे राम ! ब्रह्मरूपी एक शिला है, उसमें त्रिलोकीरूपी अनेक पुतलियाँ कल्पित हैं। जैसे एक शिला में शिल्पी जब पुतलियों की कल्पना करता है कि इसमें इतनी पुतलियाँ होंगी, तब वे पुतलियाँ उसके चित्त में हैं, और शिला में कुछ नहीं हुआ, तैसे ही आत्मरूपी शिला में चित्तरूपी शिल्पी जो नाना प्रकार के पदार्थ-रूपी पुतलियों की कल्पना करता है सो सब आत्मरूप हैं। इसमें पदार्थों की भावना त्यागकर आत्मा में स्थित हो । यह संसार भी निर्वाच्य है; क्योंकि यह ब्रह्म ही है, ब्रह्म से भिन्न नहीं । न कोई उपजता है, न कोई नष्ट होता है, ज्यों का त्यों आत्मा ही स्थित है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे जगदभावप्रतिपादनं नाम शताधिकैकोनविंशतितमस्सर्गः ॥ ११९ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! जो इस संसार का बीज अहंकार हुआ । उसका पिता अहंकार है तो मिथ्या संसार जो अविद्यमान ही विद्यमान लगता है सो भी भ्रमरूप हुआ ? और जो संसार भ्रमरूप है तो लोग और शास्त्र, श्रुतियाँ और स्मृतियाँ क्यों कहती हैं कि इसका शरीर पिण्ड में होता है ? और जो पिण्ड में होता है तो आप कैसे उसे भ्रम कहते हैं ? जो भ्रम है तो लोक, शास्त्र, श्रुतियाँ और स्मृतियाँ क्यों उसे पिण्ड में कहती हैं ? इस मेरे संशय को निवृत्त कीजिये । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मेरा कहना सत्य है । ब्रह्म में ब्रह्मत्व स्वभाव है और जगत् का स्वरूप भी वही है । हे राम ! आदि जो किञ्चित् हुआ और चित्तशक्ति फुरी, वही ब्रह्मरूप हुआ और उसको पदार्थों का मनोराज्य हुआ । यह आकाश है, यह पवन है, यह कर्तव्य है, यह अकर्तव्य है, यह सत्य है, यह झूठ है इत्यादि मनोराज्य जब तक है तब तक सब मर्यादा ऐसी ही है । फिर ब्रह्मा ने यह सोचा कि जगत् की मर्यादा के निमित्त वेद में कहूँ कि यह पदार्थ शुभ है और यह अशुभ है । हे राम ! आत्मा में कुछ द्वैत नहीं । मायारूप जगत् में मर्यादा है, तो अधः, ऊर्ध्व, नीच, ऊँच कौन कहे ? यह मर्यादा भी वेद में नीति निश्चय हुई है कि ये

निर्वाण प्रकरण३६५

शुभ कर्म हैं, इनके करने से स्वर्ग-सुख ही भोगते हैं और ये अशुभ कर्म हैं, इनके करने से नरकदुःख भोगते हैं। हे राम! जैसे वेद में निश्चय किया है, वैसे ही जीव अपनी वासना के अनुसार भोगता है। हे राम! यह रचित शक्ति नीति होकर ब्रह्मादिक में फुरी है। परन्तु उन देवों को सदा स्वरूप में निश्चय है, इससे वे संसार में नहीं बँधते। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र ने यह वेद रचा है कि जैसा कोई कर्म करे, वैसा ही फल वे देते हैं। यह वेद सबकी नीति है।

हे राम! जिन पुरुषों को संसार की सत्यता दृढ हुई है, वे शुभ अथवा अशुभ जैसे कर्म करते हैं, वैसे ही शरीर को धारण करते हैं। इसमें संशय नहीं कि जो शास्त्रमर्यादा का अपनी इच्छा से उल्लंघन करते हैं, वे शरीर त्यागकर कुछ काल तक मूर्च्छित हो जाते हैं और आत्मज्ञान बिना एक मुहूर्त में जागकर बड़े नरकों को चले जाते हैं। जिनको शून्यभावना हुई है कि आगे नरक-स्वर्ग कोई नहीं, और जो लोक-परलोक के भय को त्यागकर शास्त्र बाह्य आचरण करते हैं, वे मरकर पत्थर, वृक्षादिक की जड़योनि पाते हैं। चिरकाल से वासना बलवती होने के कारण वे फिर दुःख के भागी होते हैं। और जिनको आत्मभावना हुई है और संसार की भावना निवृत्त हुई है, वे शास्त्र-विहित करें, अथवा शास्त्रविरुद्ध करें, उनका कोई बन्धन नहीं होता। हे राम! मनुष्य चित्तरूपी भूमि में निश्चयरूपी जैसा बीज बोता है, वैसा ही काल पाकर उगता है—यह निःसंशय है। इससे तुम आत्म-भावणारूप बीज बोओ, समझो कि सब आत्मा ही है। ऐसी भावना करो, तब शुद्ध आत्मा ही भासित होगा और जिनका संसार का निश्चय हुआ है, उनको संसार है। हे राम! जो पुरुष धर्मात्मा हैं, उनको उसी वासना के अनुसार भासित होता है। धर्मात्मा भी दो प्रकार के हैं—एक सकाम और दूसरे निष्काम। जो धर्म करते हैं और पापरूपी कामना सहित हैं, वे स्वर्गभोग भोगकर फिर गिरते हैं। और जो निष्काम ईश्वरार्पण कर्म करते हैं, उनका अन्तःकरण शुद्ध होकर ज्ञान की प्राप्ति होती है।

३६६ ❇ योगवाशिष्ट ❇

यह भी संसार में मर्यादा है कि जैसा किमी को निश्चय होता है, वैसा ही वह संसार को देखता है। पिण्ड में भी शरीर होता है, क्योंकि यह भी आदि-नीति में निश्चय हुआ है। जैसे आदि-नीति में निश्चय हुआ है, वैसे ही होता है। जो पवन है सो पवन ही है और जो अग्नि है सो अग्नि ही है। इसी प्रकार कल्पपर्यन्त जैसे मनोराज्य हुआ है; वैसे ही स्थित है। जैसे जल नीचे ही को जाता है, ऊपर नहीं जाता, वैसे ही जो आदि में निश्चय हुआ है वही कल्पभर रहता है। हे राम! जगत् व्यवहार में तो ऐसे हैं और परमार्थ में दूसरा कुछ हुआ नहीं। इस जीव ने आकाश में मिथ्या देह रची है। परमार्थ दृष्टि से केवल निराकार अद्वैत आत्मा है, शरीर इसके साथ नहीं है। इससे जगत् कैसे हो?

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे पिण्डनिर्णयो नाम शताधिकविंशतितमस्सर्गः ॥ १२० ॥

वशिष्टजी बोले, हे राम! अपने प्रश्न पर बृहस्पति और राजा बलि का एक इतिहास सुनो। जब छः कल्प व्यतीत हुए तो दूसरे परार्द्ध में राजा बलि हुआ। वह महापराक्रमी था। उस राजा बलि ने सम्पूर्ण दैत्यों और राक्षसों को जीतकर अपने वश में किया और उन पर अपनी आज्ञा चलाई। इन्द्र को भी जीतकर अपने वश में किया और उसका सम्पूर्ण ऐश्वर्य ले लिया। देवताओं और किन्नरों पर उसकी आज्ञा चली और भूलोक भी उसने ले लिया। जब वह सब ले चुका, तब उसने धर्म-आचार को ग्रहण किया। एक समय सब सभा जुड़ी थी, उसमें यह चर्चा चली कि जन्म कैसे होता है और मरण कैसे होता है? तब राजा बलि ने देवगुरु बृहस्पति से प्रश्न किया कि हे ब्राह्मण! यह पुरुष जब मृतक होता है, तब शरीर तो भस्म हो जाता है, फिर कर्मों के फल यह कैसे भोगता है और शरीर बिना कैसे आता-जाता है, सो कहिये?

बृहस्पति बोले, हे राजन! जीव के देह नहीं है। जैसे मरुस्थल में जल भासित होता है पर वास्तव में होता नहीं, वैसे ही जीव के साथ शरीर भासित होता है, पर है नहीं। जीव न जन्मता है, न मरता है,

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३६७

न भस्म होता है, न दुःखी होता है। यह सदा अच्युतरूप है। पर स्वरूप के प्रमाद से अपने को दुःखी जानता है कि मैं दुःख भोगता हूँ और जन्मा हूँ; इतना काल हुआ है; यह मेरी माता है; यह पिता है; मैं इनसे उपजा हूँ। फिर अपने को मृतक हुआ जानता है। हे राजन्! भ्रम से ऐसे देखता है, जैसे निद्राभ्रम में स्वप्न में देखता है, वैसे ही अज्ञान में जीव आपको मानता है। जब मृतक होता है, तब जानता है कि मेरा शरीर पिण्ड में हुआ है और अब मैं दुःख-सुख भोगूँगा। जैसे स्वप्न में आकाश होता है और वहाँ वासना से अपने साथ शरीर देखता है और सुख-दुःख भोगता है, वैसे ही मरकर जीव अपने साथ शरीर देखता है और दुःख-सुख का भागी होता है। परमार्थ से इसके साथ शरीर ही नहीं तो जन्म-मरण कैसे हों? स्वरूप में प्रमाद करके देहधारी की तरह स्थित हुआ है और उस देह में मिलकर जैसी-जैसी भावना करता है, वैसा ही फल भोगता है और वासना के अनुसार जैसी भावना होती है, वैसे ही आगे शरीर देखता है और पञ्चभौतिक संसार को देखता है, इस प्रकार भ्रमता है और अपने को जन्मता-मरता देखता है। जैसे समुद्र से तरङ्ग उठता और मिट जाता है, वैसे ही शरीर उपजता और नष्ट होता है। शरीर के सम्बन्ध से ही उपजता और नष्ट होता जान पड़ता है। वह आश्चर्य है कि आत्मा ज्यों का त्यों स्वाभाविक स्थित है, उसमें वासना के अनुसार विश्व देखता है।

हे राजन्! विश्व इसके हृदय में स्थित है और यह भावना के अनुसार आगे देखता है। इस जीव में विश्व है, पर विश्व में जीव नहीं। जैसे तिल में तेल है पर तेल में तिल नहीं; सुवर्ण में भूषण कल्पित है, भूषण में सुवर्ण कल्पित नहीं, वैसे ही विश्व सत् भी नहीं और असत् भी नहीं। सत् इस कारण नहीं कि चलरूप है स्थिर नहीं और असत् इस कारण नहीं कि विद्यमान लगता है। इससे इसकी भावना त्यागो। यह दृश्य मिथ्या है, इसका अनुभव मिथ्या है और इसका जाननेवाला अहंकारी जीव भी मिथ्या है। जैसे मरुस्थल में जल मिथ्या है, वैसे ही आत्मा में अहंकार और जीव भी मिथ्या है। हे राजन्! जबतक शास्त्रों

३६८ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

के अर्थ में चपलता है और वह स्थित में गहित है, तबतक संसार की निवृत्ति नहीं होती। जब दृश्य के फुरने में अहंकार में यह जड़ सा हो जाय, तब इसको आत्मपद की प्राप्ति हो। जबतक यह जीव दृश्य की ओर फुरता है और चेतन सावधान है, तबतक यह संसार में भ्रमता है।

हे राजन् ! आत्मा न कहीं जाता है, न आता है; न जन्मता है, न मरता है। जब चैत्य और चित्त का सम्बन्ध मिट जाय तब यह आनन्द-रूप ही है। चैत्य दृश्य को कहते हैं और चित्त अहंकारसंवित् का नाम है। जब दोनों का सम्बन्ध आपस में मिट जायगा, तब शेष आत्मा ही रहेगा। वह ब्रह्म आत्मा और शिवपद है, जिसमें वाणी की गति नहीं। यह अनुभव-निर्वाच्य पद है, इसी में स्थित होओ। हे राम ! जिस युक्ति में इसकी इच्छा-अनिच्छा निवृत्त हो, वही युक्ति श्रेष्ठ है। जबतक यह स्फुरण होता है कि, यह भाव है यह अभाव है, तबतक इसको जीव कहते हैं; और जब भाव-अभाव का स्फुरण मिट जाता है, तब जीवसंज्ञा भी जाती रहती है। और वह शिवपद आत्मा को प्राप्त होता है, जहाँ वाणी की गति नहीं।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे बृहस्पतिबलिसंवादवर्णनं नाम शताधिकेकविंशतितमस्सर्गः ॥ १२१ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार बृहस्पति ने राजा बलि से कहा था, वह तेरे प्रश्न के उत्तर निमित्त मैंने कहा है। जबतक हृदय में संसार की सत्यता है, तबतक जैसे कर्म करेगा वैसा ही शरीर धरेगा। हे राम ! जिस वस्तु को चित्त देखता है, उसकी ओर अवश्य जाता है, उसका संस्कार उसके हृदय में होता है। और जिस पदार्थ को सत जानता है, उस पदार्थ का संस्कार स्थिर हो जाता है जैसे मोर के अण्डे में शक्ति होती है और जब समय आता है तब नाना प्रकार के रङ्ग उसमें प्रकट होते हैं, वैसे ही चित्त का संस्कार भी समय पाकर जगता है। हे राम ! चित्त अज्ञान में उपजता है। फिर बृहस्पति ने कहा, हे राजन् ! बीज पृथ्वी पर उगता है, आकाश में नहीं। जैसा बीज

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ३६६

पृथ्वी में बोया जाता है, वैसा ही फल होता है। यहाँ अहंरूप अपना होना ही पृथ्वी है। जीव जैसी-जैसी भावना से कर्म करता है, वैसा-वैसा चित्तरूपी शरीर पृथ्वी पर उत्पन्न होता है और फिर उसमें फल होता है। उन कर्मों के अनुसार देह रख वह सुख-दुःख भोगता है। ज्ञानवान् आकाशरूप है। आकाश में बीज कैसे उपजे ? बीज भावना से अज्ञानरूपी पृथ्वी में उगता है। बलि ने पूछा, हे देवगुरु ! आपने कहा कि जीव जीता हो अथवा मृतक, इसे अपनी भावना ही से अनुभव होता है, तो जब यह मृतक हुआ और इसकी पिण्डादिक में भावना न हुई तब फिर इसका शरीर कैसे होता है ?

बृहस्पति बोले, हे राजन् ! पिण्डदान आदिक क्रिया न हों, पर इसके हृदय में भावना हो और उसी समय किसी ने पिण्डदान किया तो भी वह जो हृदय में भावना है वही कर्मरूप है और उसी से देह भासित होती है। और जो इसके हृदय में भावना नहीं और किसी बान्धव ने इसके निमित्त पिण्डदान किया तो भी इसको देह भासित होती है, क्योंकि वह भी इसकी वासना में स्पन्दन है। हे राजन् ! जो अज्ञानी जीव हैं और जिनको अनात्म में आत्मबुद्धि है, उनके कर्म कहाँ गये ? वे जो कर्म करते हैं; वे ही उनके चित्तरूपी भूमि में उगते हैं। उनके शरीरों की क्या संख्या है ? वे वासनारूपी अनेक शरीर ज्ञान बिना स्वप्नवत् रचते हैं। बलि बोले, हे देवगुरु ! यह निश्चय करके मैंने जाना है कि जिसको निष्किंचन की भावना होती है, वह निष्किंचन पद को प्राप्त है और संसार की ओर से शिला की नाईं हो जाता है। जिसकी जैसी भावना होती है, वैसा ही स्वरूप हो जाता है। जब संसार से पत्थर सा संवेदनरहित हो, तब मुक्त हो। बृहस्पति बोले, हे राजन् ! निष्किंचन को जब जानता है, तब जीव संसार की ओर से जड़ हो जाता है। संसार के न फुरने ही का नाम जड़त्व है। ऐसा जीव केवल सारपद में स्थित होता है। जिसे गुण डिगा न सकें, उसे जानिये कि निष्किंचन पद को प्राप्त हुआ है। वही निःसंदेह मुक्त है। हे राजन् ! जब तक संसार की सत्यता चित्त में है तब तक वासना है

३७० ❈ योगवाशिष्ठ ❈

और जब तक वासना है, तब तक संसार है। संसार के अभाव बिना शान्ति नहीं होती। स्वरूप के प्रमाद से चित्त हुआ है, चित्त में वासना हुई है और वासना से संसार हुआ है। इससे वासना का त्याग करो। जब कोई वासना न उठे, तब निष्किञ्चनभाव हो और शान्ति मिले। हे राजन् । जिस युक्ति और क्रम से यह निष्किञ्चनरूप हो, वही करना चाहिए। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस प्रकार से सुरपुर में असुर-नायक को सुरगुरु ने जो पिण्डदानादि क्रिया बनाई, वह मैंने तुमको सुनाई।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे बृहस्पतिबलिसंवादो नाम शताधिकद्वाविंशतितमस्सर्गः ॥ १२२ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! चाहे जीता हो, चाहे मृतक, जो कुछ इसके चित्त के साथ रह जायगा, उसका अनुभव यह अवश्य करेगा। जैसे बाँस के अगड़े में रस होता है तो वह समय पाकर विस्तार पाता है, वैसे ही इसके भीतर जो वासना का बीज है, वह चाहे प्रकट नहीं भासित होता तो भी समय पाकर विस्तृत होता है। जब तक चित्त है, तब तक संसार है और जब चित्त नष्ट होता है, तब सब भ्रम मिट जाता है। हे राम ! चित्त असत् है तो विश्व भी असत् है। जैसे आकाश में नीलापन भ्रम से दीखता है, वैसे ही आत्मा में विश्व का भ्रम है। हे राम ! हमको न चित्त भासित होता है, न विश्व भासित होता है। मैं भी आकाश हूँ और तुम भी आकाशरूप हो। यह चित्त स्वरूप के प्रमाद से उपजता है। जैसे जहाँ काजल होता है, वहाँ श्यामता भी होती है। वैसे ही जहाँ चित्त होता है, वहाँ वासना भी होती है। जब ज्ञानरूपा अग्नि से वासना दग्ध हो तब चित्त सत्यपद को प्राप्त होता है और जीवितसंज्ञा निवृत्त होती है। हे राम ! चित्त के उपशम का उपाय मुझसे सुनो। उससे चित्त का निर्वाण हो जायगा। ज्ञान की जो सात भूमिकाएँ हैं, उनसे चित्त नष्ट हो जायगा। उनमें से तीन भूमिकाएँ तो मैंने तुमसे क्रम से कही हैं, और चार कहने को बाकी हैं। हे राम ! प्रथम तीन भूमिकाओं में से एक भी जिसको प्राप्त होती है, उसको

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३७१

महापुरुष जानो । उसके मान और मोह निवृत्त हो जाते हैं, उसे संग दोष नहीं लगता । विचार-स्थिति से उसकी कामना नष्ट हो जाती है, राग-द्वेष नहीं रहता और वह सुख-दुःख में सम रहता है । ऐसा अमूढ़ पुरुष अव्ययपद को प्राप्त होता है । तीसरी भूमिका में इतने गुण प्राप्त होते हैं और चित्त नष्ट हो जाता है । तब संसार नहीं देख पड़ता, जैसे दीपक लेकर देखिये तो अन्धकार नहीं मिलता ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे चित्ताभावप्रतिपादनं नाम शताधिकत्रयोविंशतितमसर्गः ॥ १२३ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जब तृतीय भूमिका पूर्ण दृढ़ होकर दृढ़ अभ्यास से चौथी भूमिका उदय होती है, तब अज्ञान नष्ट हो जाता है और चित्त में सम्यक् ज्ञान उदय होता है । तब वह पूर्णमासी के चन्द्रमा की तरह शोभा पाता है । उस योगी का चित्त आदि-अन्त से रहित, निर्विभाग, चैतन्य तत्त्व में स्थित होता है और वह सबको सम देखता है । जिस योगी को चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है, उसके नाना प्रकार के भेदभाव निवृत्त हो जाते हैं और अभेद सर्व-आत्मभाव उदय होता है । उसको जगत् स्वप्न सा भासित होता है और इन्द्रियों का व्यवहार स्वप्नवत् हो जाता है । जैसे जिसको सुषुप्ति होती है, उसे उस काल में खाना-पीना रस से रहित हो जाता है, वैसे ही चतुर्थ भूमिकावाले का व्यवहार रस से रहित होता है । जैसे सूर्य अपने प्रकाश से प्रकाशित होता है, वैसे ही उसको आत्मा का प्रकाश उदय होता है और उसकी सब कल्पना नष्ट हो जाती है; न किसी पदार्थ में राग रहता है, न किसी में द्वेष । राग और द्वेष संसार समुद्र में डुबानेवाले हैं । इष्ट पदार्थ में न राग होता है और न अनिष्ट में द्वेष । इससे वह संसार समुद्र में गोते नहीं खाता, उसके चित्त को कोई मोहित नहीं कर सकता । हे राम ! जब तक तृतीय भूमिका होती है, तब तक उसकी जाग्रत अवस्था होती है । जब चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है, तब जगत् स्वप्न हो जाता है । तब वह सारे जगत् को क्षणभंगुर और नाशवान् देखता है और द्रष्टा, दर्शन, दृश्य की भावना का अभाव हो जाता है ।

३०२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

राम ने पूछा, हे भगवन् ! जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति का लक्षण कहिये। तुरीयावस्था और तुरीयातीत पद मुझमे कहिये। गुरु शिष्य को उपदेश करने नहीं ऊबते। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तत्त्व का विस्मरण, पदार्थों की भावना और नाशवान् पदार्थों को सत की तरह जानना ही जाग्रत है। पदार्थों में भाव-अभाव की सत्यता और जगत् को मिथ्या भावनामात्र जानना स्वप्न कहाता है और जाग्रत और स्वप्न जिसमें लय हो जावें, वह सुषुप्ति है। जब ज्ञान में भेद की शान्ति हो जाय और जाग्रत-स्वप्न-सुषुप्ति तीनों का अभाव हो, ऐसी निर्मल स्थिति तुरीयावस्था है। हे राम ! अज्ञानी जीव संसार को वर्षाकाल के मेघ की तरह देखते हैं; क्योंकि संसार उनको दृढ़ होकर भासित होता है। पर जिसको चतुर्थ भूमिका प्राप्त हुई है, वह संसार को शरत्काल के मेघ की तरह क्षणभंगुर देखता है। जिसको पञ्चम भूमिका प्राप्त हुई है, वह शरत्काल के मेघ नष्ट हुए की तरह देखता है। जैसे शरत् में निर्मल आकाश होता है, वैसे ही उसको निर्मल दीखता है। इन तीनों का वृत्तान्त सुनो। अज्ञानी जगत् को जाग्रत की तरह देखता है और उसको जगत् की दृढ़ सत्यता भासित होती है, इससे उसे रागद्वेष उपजता है। चतुर्थ भूमिकावाला जगत् को ऐसे देखता है, जैसे शरत्काल का मेघ वर्षा से रहित होता है। जैसे स्वप्न की सृष्टि होती है, वैसे ही उसको जगत् की सत्यता नहीं भासित होती; क्योंकि उसकी स्मृति स्वप्न की होती है। वह जगत् को स्वप्नवत् देखता है, इससे उसको राग, द्वेष नहीं उपजता।

पञ्चम भूमिका पर पहुँचनेवाला जगत् को सुषुप्ति की तरह देखता है। जैसे शरत्काल का मेघ नष्ट होकर फिर नहीं देख पड़ता, वैसे ही उसको संसार का भान नहीं होता, और उसकी चेष्टा स्वाभाविक होती है जैसे कमल स्वाभाविक ही खुलता और मुँद जाता है, वैसे ही वह कुछ यत्न नहीं करता—चेष्टा में जैसा प्रतियोगी स्वाभाविक प्राप्त होता है, वही करता है। जैसे कमल के खुलने का प्रतियोगी सूर्य जब उदय हुआ, तब कमल खुल गया, और जब मुँदने की प्रतियोगी

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३७३

रात्रि हुई, तब मुँद जाता है—उसको कोई खेद नहीं, वैसे ही उस पुरुष की अहंममता से रहित स्वाभाविक चेष्टा होती है। हे राम! अहंता-ममतारूप जाग्रत् से वह पुरुष सुषुप्त हो जाता है, और सम्पूर्ण भावरूप जो शब्द और अर्थ है, उनका उसको अभाव हो जाता है। उसका अशेष-शेष का मनन नष्ट हो जाता है। उसको पशु, पक्षी, मनुष्य, देवता, भला, बुरा इत्यादि भिन्न-भिन्न पदार्थों की भावना नहीं रहती। उसकी द्वैतकलना नष्ट हो जाती है। उसे एक ब्रह्मसत्ता ही भासित होती है—संसार नहीं भासित होता।

हे राम! अहंतारूपी तिल से संसाररूपी तेल उपजता है और अहंतारूपी फूल से संसाररूपी गन्ध उपजती है। संसार का कारण अहंता ही है। जिस पुरुष की अहंता नष्ट हो जाती है, वह इन्द्रियों के इष्ट को पाकर हर्षित नहीं होता और अनिष्ट के प्राप्त होने पर द्वेष नहीं करता। वह ऐसे अपने को नहीं जानता कि मैं खड़ा हूँ बैठा हूँ अथवा चलता हूँ; वह अपने को सर्वदा आकाशरूप जानता है। वह न भीतर देखता है, न बाहर देखता है; न आकाश को देखता है और न पृथ्वी को देखता है, सर्वत्र ब्रह्म ही देखता है। उसको भिन्न कुछ नहीं दीखता। वह द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, तीनों का साक्षी रहता है। वह अहंकार का भी साक्षी, इन्द्रियों का भी साक्षी और विश्व का भी साक्षी है। इनके साथ उसका स्पर्श कभी नहीं होता। जैसे ब्राह्मण चाण्डाल को स्पर्श नहीं करता। जैसे बीज से अंकुर होता है और फिर अंकुर से डालें होती हैं, इसी प्रकार सब पदार्थों का परिणाम है। पर उनमें आकाश ज्यों का त्यों रहता है; क्योंकि उनके साथ उसका स्पर्श नहीं होता। वैसे ही वह पुरुष द्रष्टा, दर्शन, दृश्य से अतीत रहता है। जैसे मरुस्थल में जल असत् है, वैसे ही उस पुरुष की दृष्टि में त्रिपुटी असत्य है। उस पुरुष की त्रिपुटी और अहंता नष्ट हो जाती है, इससे भेदबुद्धि भी नहीं रहती। इसी से वह शान्त, निर्मल संसार से सुषुप्त, चैतन्य-घनता से पूर्ण और सर्वदा शान्तरूप रहता है। जिन नेत्रों से लोग संसार देखते हैं, उनसे वह अन्धा हुआ है—अर्थ यह कि जिस मन में फुरना होता

३७४ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

है, उसका उसने नाश किया है । और यदि भय, क्रोध, अहंकार, मोह इत्यादि विकार उस पुरुष में दीखते भी हैं, तो उसके हृदय को वे स्पर्श नहीं करते । जैसे पक्षी आकाश में उड़ता है, परन्तु आकाश को स्पर्श नहीं कर सकता, वैसे ही उस पुरुष को कोई विकार स्पर्श नहीं करता । हे राम ! उस पुरुष के सब संशय नष्ट हो गये हैं और वह सर्वदा स्वरूप में स्थित और शान्तरूप है, आत्मा से भिन्न वह किसी सुख की वाञ्छा नहीं करता और उसके सब संकल्प मिट चुके हैं । उसे आत्मा से भिन्न कुछ नहीं भासित होता । वह जाग्रत की तरह देख पड़ता है, पर सर्वदा जाग्रत से सुपुप्त है ।

इति० नि० पञ्चमभूमिकावर्णनंनामचतुर्विंशताधिकतमस्सर्गः ॥ १२४ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! तीसरी भूमिका पर्यन्त वह जाग्रत है और चतुर्थ भूमिका में जाग्रत् अवस्था को स्वप्नवत् देखता है । पञ्चम भूमिका-वाला संसार में सुपुप्त होता है और छठी भूमिकावाला तुरीयपद में स्थित होता है और सर्वदा अक्रिय है, अर्थात् किसी क्रिया में नहीं बंधता । वह सर्वदा आनन्दरूप है । भिन्न होकर आनन्द को नहीं भोगता, आप ही आनन्दरूप है । केवल अपने आप स्वतः अपने में ही स्थित है और सर्वदा निर्वाणरूप है । हे राम ! सब कर्म वह यथाशास्त्र करता देख पड़ता है, परन्तु हृदय में शून्य है—उसका किसी में लगाव नहीं । जैसे आकाश में सब पदार्थ हैं, पर आकाश का स्पर्श किसी में नहीं, वैसे ही सब क्रिया उसमें विद्यमान देख पड़ती हैं, तो भी वह हृदय में किसी का स्पर्श नहीं करता; क्योंकि उसको कर्मबन्धन में डालनेवाला अहंकार नष्ट हो गया है—वह केवल शान्तरूप है । चिन्मात्र में अहंभाव का उत्थान ही अज्ञान है, और वही दुःखदायी है । जब अहंभाव निवृत्त होता है, तब कोई कर्म स्पर्श नहीं करता । यद्यपि उसको विश्व देख पड़ता है, तो भी वास्तव में वह नहीं देखता; क्योंकि उसको सर्वत्र ब्रह्म ही भासित होता है । वह खाता है, पर नहीं खाता; देता भी है, पर कभी नहीं देता । लेता है तो भी कभी किसी से कुछ नहीं लेता । चलता है, परन्तु कभी नहीं चला ।

☸ निर्वाण प्रकरण ☸ ३७५

हे राम ! जो देश-काल वस्तु पदार्थ है, उन सबमें वह आत्मभाव रखता है। यद्यपि उसमें प्रत्यक्ष चेष्टा दीखती है, तो भी उसमें हृदय में कुछ नहीं। जैसे सपने में खाता, पीता, लेता, देता अपने को देखता है और जागे पर सबका अभाव हो जाता है, वैसे ही जो पुरुष परमार्थ-सत्ता में जागा है, उसको गुण व क्रिया अपने में नहीं भासित होती । वह जो करता है, उसमें अभिलाषा नहीं रखता । उसकी सब चेष्टा स्वाभाविक होती है । अपने निमित्त उसे कुछ कर्तव्य नहीं । ऐसे भगवान् ने भी कहा है कि वह सर्वत्र आत्मा को ही देखता है। आकाश, पृथ्वी, सूर्य, ब्राह्मण, हाथी, श्वान, चाण्डाल आदिक सबमें वह आत्मभाव देखता है, सब आकारों को मृगतृष्णा के जलवत् देखता है कि इनका अत्यन्त अभाव है। द्रष्टा, दर्शन, दृश्य, भी उसको आकाशवत् भासित होते हैं और वह निर्मल आकाशवत् शान्तरूप है । अहं-भाव से रहित वह केवल चिन्मात्र में स्थित है । वह ग्रहण व त्याग से अतीत सर्वकल्पना से रहित, निर्वाण, स्वच्छ, निर्मल आकाशरूप स्थित है । अहं-मम आदिक चिद्ग्रन्थि उसकी कट गई हैं । अनात्म में अहं अभिमान उसका नष्ट हो जाता है, वह केवल शान्तरूप हो रहता है ।

जैसे क्षीरसमुद्र से मन्दराचल पर्वत निकलकर शान्तरूप हुआ, वैसे ही वह रागद्वेषरूपी क्षोभ करनेवाले अन्तःकरणरूपी समुद्र से निकल गया, तब शान्तरूप अक्षोभ्य होकर परम शोभा से शोभित होता है । जैसे विश्वकर्मा ने सूर्य का मण्डल रचा है और वह प्रकाश से शोभा पाता है, वैसे ही ज्ञानरूपी प्रकाश से वह प्रकाश पाता है । जैसे चक्र फिरता-फिरता रह जाता है और शान्त होता है, वैसे ही वह अज्ञान में फिरता-फिरता ठहरकर सदा शान्ति को प्राप्त होकर अपने आप से प्रकाशित होता है । जैसे पवन से रहित दीपक प्रकाशित होता है, वैसे ही कलनारूपी पवन से रहित पुरुष अपने आपमें प्रकाशमान होता है और सर्वदा निर्मल और एकरस रहता है । जैसे घट के भीतर और बाहर शून्य है, वैसे ही देह के भीतर-बाहर आत्मा है । जैसे जल में घट रखिये तो उसके भीतर-बाहर जल होता है, वैसे ही वह पुरुष अपने रूप में

३७६ ❋ योगवाशिष्ठ ❋

भीतर-बाहर पूर्ण हो रहा है और एकरस है। वह द्वैतकल्पना को नहीं प्राप्त होता और उस पद को पाकर आनन्दित होता है। जैसे कोई मारे जाने के निमित्त पकड़ा गया हो और उसकी रक्षा हो तो वह बड़े आनन्द को प्राप्त होता है; वैसे ही वह पुरुष आनन्द को प्राप्त होता है। जैसे कोई आधि-व्याधि से छूटा आनन्द को प्राप्त होता है, वैसे ही वह ज्ञानवान् आनन्द को प्राप्त होता है। जैसे कोई मंजिल चलने मे थका हुआ शय्या पर विश्राम करे और आनन्द को प्राप्त हो, वैसे ही ज्ञानवान् को आनन्द मिलता है। जैसे पूर्णमासी का चन्द्रमा अमृत से आनन्दमय होता है, वैसे वह पुरुष अपने आनन्द से परिपूर्ण रहता है। जैसे काष्ठ के बिना अग्नि धुएँ से रहित प्रज्वलित होती है, वैसे ही ज्ञानवान् अज्ञानरूपी धुएँ से रहित शोभा पाता है। हे राम! जब वह संसार की ओर देखता है तो उसे अग्नि से जलता हुआ अपने से भिन्न देखता है। वह ज्ञानरूपी पर्वत के ऊपर स्थित होकर संसार को जलता देखता है।

हे राम! यह जो कहा है कि संसार को जलता देखता है, सो ऐसे भी नहीं फुरता कि मैं ज्ञानी हूँ और यह संसार है। स्वरूप की अपेक्षा से यह कहा है कि संसार उसको दुःखदायी लगता है। वह आनन्द से भी परे परमानन्द को प्राप्त हुआ है और सत्-असत् से रहित जो अपना आपा है उसमें स्थित है। जैसे पर्वत भीतर-बाहर अपने आपमें स्थित और एकरस है, वैसे ही वह पुरुष एकरस है। वह संसार में जाग्रत होकर चेष्टा करता है, पर हृदय में संसार की भावना से रहित है। उस पद में वाणी की गति नहीं। फिर भी कुछ कहता हूँ, सुनो। कोई उसे ब्रह्म कहते हैं; कोई चैतन्य कहते हैं; कोई आत्मा कहते हैं; कोई साक्षी कहते हैं। कालवाले उसी को काल कहते हैं, ईश्वरवादी ईश्वर कहते हैं; सांख्यवाले प्रकृति इत्यादिक संज्ञाओं से निर्देश करते हैं। सब उसी के नाम हैं—उसमें भिन्न नहीं। उस पद को सन्तजन जानते हैं। हे राम! ऐसे पद को पाकर वह अपने आपमे शोभित होता है। जैसे मणि के भीतर-बाहर प्रकाश होता है, वैसे ही वह पुरुष भीतर-बाहर

  • निर्वाण प्रकरण * ३७७

सोहता है और अपने स्वरूप में सदा सन्तुष्ट रहता है। जो पुरुष छठी भूमिका में स्थित है, उसके ये लक्षण होते हैं—वह संसार में सुपुप्त होकर स्वरूप में सावधान रहता है और उसका जीवभाव जाता रहता है। जैसे घट की उपाधि से घटाकाश परिच्छिन्न भासित होता है और जब घट भग्न हुआ तब घटाकाश महाकाश एक हो जाता है, वैसे ही अहङ्काररूपी घट के भग्न होने पर आत्मा ही भासित होता है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे षष्ठभूमिकोपदेशो नाम शताधिकपञ्चविंशतितमस्सर्गः ॥ १२५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इसके अनन्तर जब उस पुरुष को सप्तम भूमिका प्राप्त होती है, तब वह अपने को आत्मा ही जानता है। उसे पंचभूतों का ज्ञान नहीं रहता। तब केवल आत्मत्वमात्र होता है और दृश्य का ज्ञान नहीं रहता; बल्कि यह भी ज्ञान नहीं रहता कि विश्व मेरे आश्रय में फुरता है। देहसहित हो, अथवा विदेह हो, उसकी आत्मा में उत्थान कभी नहीं होता। जैसे आकाश अपनी शून्यता में स्थित है, वैसे ही वह आत्मस्वरूप में स्थित होता है और उसकी चेष्टा भी स्वाभाविक होती है। जैसे बालक पालने में अपने अङ्ग स्वाभाविक हिलाता है, वैसे ही उसकी खान, पान आदिक चेष्टाएँ स्वाभाविक ही होती हैं। जैसे काष्ठ की पुतली तागे के हिलने में चेष्टा करती है, वैसे ही प्रारब्ध-वेग के तागे से उसकी चेष्टाएँ होती हैं—उसको अपनी कुछ इच्छा नहीं रहती। हे राम ! सप्तम भूमिकावाला जैसी अवस्था को प्राप्त होता है; उसे वही जानता है, और कोई नहीं जान सकता। जिसका चित्त सत्पद को प्राप्त हुआ है, वह भी उस अवस्था को नहीं जान सकता। जिसको वह पद प्राप्त हुआ है, वही उसे जानता है। हे राम ! जीवन्मुक्त का चित्त सत्पद को प्राप्त होता है और वह तुरीय-पद में स्थित होता है। उसका चित्त निर्वाण को प्राप्त हो जाता है और तुरीयातीत पद को प्राप्त होकर विदेहमुक्त होता है। उसमें अहंभाव का उत्थान कदापि नहीं होता। वह मनरूप है, पर असत् की नाईं स्थित है। हे राम ! वह पुरुष उस पद को प्राप्त होता है, जिसमें वाणी की

३७८ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

गति नहीं; परन्तु फिर भी कुछ कहता हूँ। वह शुद्ध, निर्मल, अद्वैत, चैतन्य ब्रह्म, काल का भी काल, केवल चिन्मात्र और त्यों का त्यों अच्युत पद है। उस पद को पाकर जीव ऐसा हो जाता है, जैसे वस्त्र के ऊपर मूर्ति लिखी हो, वैसे ही यह उत्थान से रहित होता है और उसको अहंब्रह्म का उत्थान भी नहीं रहता। इति० नि० सप्तभूमिकालक्षण विचारः षड्‌विंशाधिकशततमस्सर्गः॥ १२६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! ये सप्तभूमिकाएँ जो तुमसे कहीं हैं इन्हीं से ज्ञान की प्राप्ति होती है, अन्य साधनों से ज्ञान की प्राप्ति नहीं होती। हे राम! जब गुरु ज्ञानवान् हो, तब जानिये कि उसकी वृत्ति प्रथम भूमिका में स्थित हुई है। इससे तुम भूमिका की ओर चित्तरूप चरण रखोगे, तब तुमको स्वरूप की प्राप्ति होगी। हे राम! तीसरी भूमिका तक सब कामनाएँ निवृत्त होती हैं, केवल एक आत्मपद की कामना रहती है। यदि उस अवस्था में शरीर छूट जाय तो मनुष्य और जन्म पाकर ज्ञान का पात्र होता है। और यदि चतुर्थ भूमिका में प्राप्त होकर शरीर छूटे तो फिर जन्म नहीं होता; क्योंकि आत्मपद की प्राप्ति होने पर फिर कुछ पाने की इच्छा नहीं रहती। जन्म का कारण इच्छा है; जब कुछ इच्छा नहीं रही, तब जन्म भी नहीं रहा। जिसको चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है, उसको स्वरूप की प्राप्ति होती है, तब फिर इच्छा कैसे हो? जैसे भुना बीज नहीं उगता, वैसे ही उसका चित्त ज्ञान-अग्नि में दग्ध हो जाता है; क्योंकि वह सत्यपद को प्राप्त होता है। इससे वह जन्म नहीं लेता और मरता भी नहीं—संसार को स्वप्नवत् देखता है। पञ्चम भूमिकावाला सुषुप्त की तरह होता है। छठी भूमिका साक्षारूप तुरीयापद है। सप्तम तुरीयातीत निर्वाच्यपद है। हे राम! इतना कहने का प्रयोजन यही है कि वासना का त्याग करो और अचितपद को प्राप्त हो! इसका अभिमान होना ही वासना है। जब इसका अभिमान निवृत्त हो, तब शान्ति होगी, परिच्छिन्न अहंकार न रहेगा। आत्मा के अज्ञान से अहंभाव हुआ है और आत्मज्ञान से यह लीन हो जाता है।

❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३७६

हे राम ! संसार एक नदी है। उसमें आधि-व्याधि उपाधि रोग तरङ्ग हैं; राग-द्वेषरूपी छोटे मच्छ हैं और तृष्णारूपी बड़े मच्छ हैं। उसमें जीव दुःख पाते हैं। जैसे जल नीचे को चला जाता है, वैसे ही मृत्यु के मुख में संसार चला जाता है। उसमें अज्ञान ही जल भरा है। हे राम ! तृष्णा से पुरुष बँधे हैं। इससे तुम हाथी की तरह वैराग्य और अभ्यासरूपी दाँतों से तृष्णारूपी जंजीर को काटो। हे राम ! तृष्णारूपी सर्पिणी विषयरूपी फूत्कार से विचाररूपी बेल को जलाती है, इससे जीवरूपी किसान दुःख पाता है। इससे तुम वैराग्यरूपी अग्नि से उस सर्पिणी को जलाओ। हे राम ! तृष्णा दुःखदायी है। जब तक तृष्णा है, तब तक सन्तों के वचन हृदय में स्थान नहीं पाते। जैसे दर्पण पर मोती नहीं ठहरता। वैसे ही तृष्णावान के हृदय में सन्तों के वचन नहीं ठहरते। तृष्णा के इतने नाम हैं—तृष्णा, अभिलाषा, इच्छा, फुरना, संस्मृति। ये सब इसी के नाम हैं। इच्छारूपी मेघ ने ज्ञानरूपी सूर्य को ढका है, इससे वह नहीं चमकता। जब विचाररूपी पवन चले, तब इच्छारूपी मेघ नष्ट हो जावे और आत्मरूपी सूर्य का साक्षात्कार हो।

हे राम ! यह जीव आकाश का पक्षी है, पर कर्म में इच्छारूपी तागे से बँधा है, इससे नहीं उड़ सकता और परमात्मपद को भी प्राप्त नहीं होता। यह इच्छा ही से दीन है। जब इच्छा नष्ट हो, तब आत्मस्वरूप प्राप्त हो। इसमें तुम इच्छा का नाश कर आत्मपरायण हो, अर्थात् विषय संसार से वैराग्य और आत्माभ्यास करो। हे राम ! यह जो मैंने तुमसे भूमिका का क्रम कहा है, इसमें जब आवे तब ज्ञान की प्राप्ति हो। पर इनको तब प्राप्त होता है, जब कि एक हथिनी को जीते, जो एक वन में रहती है। महातमरूप उसके दो पुत्र हैं। जो अनेक जीवों को मारकर अनर्थ करते हैं। उसके जीतने से सब जगत् जीता जाता है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! ऐसी मतरूपी हथिनी कौन है और कहाँ रहती है? उसके दाँत और पुत्र कौन हैं? कैसे वह मरती है, कैसे उत्पन्न हुई है और कौन वन है? यह सब मुझसे कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इच्छारूपी हथिनी और शरीररूपी वन है। वह मन-

३८० ✴ योगवाशिष्ठ ✴

रूपी गुफा में रहती है । इन्द्रियाँ उसके बच्चे और संकल्प-विकल्प दाँत हैं, उनमें वह छेदती है । हे राम ! एक नदी है, जिसका प्रवाह सदा चला जाता है । उसमें दो मच्छ रहते हैं, जो कभी नष्ट नहीं होते । संसृति ही नदी है, जिसमें राग-द्वेष मच्छ रहते हैं, वे नष्ट नहीं होते ।

हे राम ! वे मच्छ तब नष्ट हों, जब संस्मरणरूपी जल नष्ट हो । उसके सुकृत और दुष्कृतरूपी दो किनारे हैं । उसमें चिन्तारूपी ग्राह रहता है । कर्मरूपी लहरें हैं, उनमें जीवरूपी तृण आकर भटकता है । इस तृष्णा-रूपी विषवेलि का नाश करो । हे राम ! तृष्णारूपी अंकुर को बढ़ाना-घटाना अपने ही अधीन है । जो अंकुर को जल दीजिये तो बढ़ता जाता है और जो न दीजिये तो जल जाता है । स्फुरणरूपी जल देने में तृष्णारूपी अंकुर बढ़ता जाता है, और न देने से स्वरूप के अभ्यास द्वारा जल जाता है । हे राम ! तृष्णारूपी बड़ा मच्छ है, जो धैर्य आदि के मांस को भक्षण करनेवाला है । उसे वैराग्यरूपी कगडी और अभ्यासरूपी दाँतों से नष्ट करो । हे राम ! इच्छा का नाम बन्धन है और निरिच्छा का नाम मुक्ति । हे राम ! एक सुगम उपाय कहता हूँ, जिसमें तृष्णा नष्ट हो जायगी । निज अर्थ की भावना करो । तो उस भावना से शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होगी, तुम्हारी जय होगी और तुम सबसे उत्तम पद को प्राप्त होगे । फिर तुम्हें वासना न रहेगी, शरीर की चेष्टा स्वाभाविक होगी और सब संकल्प नष्ट हो जावेंगे ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे संस्मरणभावप्रतिपादनं नाम शताधिकसप्तविंशतितमसर्गः ॥ २२७ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! आप कहते हैं कि निज अर्थ की भावना में वासना नष्ट हो जावेगी और शीघ्र ही आत्मपद की प्राप्ति होगी । सो वासना तो चिरकाल से चित्त में स्थित है । वह एकवारगी कैसे नष्ट होगी ? आप कहते हैं कि वासना के नष्ट होने से जीव जीवन्मुक्त होता है । पर जिसकी वासना नष्ट होगी, उसका शरीर कैसे रहेगा ? वासना बिना चेष्टा क्योंकर होगी और जीवन्मुक्त पद कैसे प्राप्त होगा ?

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! मेरे वचनों को, जो कानों के भूषण हैं, सुनने

☸ निर्वाण प्रकरण ☸

<p align="right">३८१</p>

से दरिद्र न रहेगा। निज अर्थ के धारण से संशय नष्ट हो जावेंगे और आत्मपद की प्राप्ति होगी। उस निज अक्षर के तीन अर्थ हैं—एक तो अन्य के अर्थ हैं कि पाञ्चभौतिक शरीर से तुम्हारा स्वरूप विलक्षण है, और दूसरा अर्थ विरुद्ध है, अर्थात् शरीर जड़ और तमरूप है और तुम्हारा स्वरूप आदित्यवर्ण और तम से परे है। हे राम! जब तुमने ऐसी धारणा की कि मैं आत्मा हूँ और यह देहादिक अनात्मा है, तब देह में मिलकर अभिलाषा कैसे रहेगी? मतलब यह कि अभिलाषा न करोगे; क्योंकि जब तक जाना नहीं, तब तक अभिलाषा है। तीसरा अर्थ यह है कि सबका अभाव है, अर्थात् न मैं हूँ और न कोई जगत् है। जब ऐसे जाना तब किसकी इच्छा रहेगी? अर्थात् किसी की न रहेगी। अथवा जो तुम अपने को देह से विलक्षण आत्मा जानोगे, तो भी अविद्याकृत तमरूप शरीर की अभिलाषा न रहेगी।

देह तमरूप है और तुम आदित्यवर्ण अर्थात् प्रकाशरूप हो। तुम्हारा और इसका क्या संयोग। जैसे सूर्य के मण्डल में रात्रि नहीं दिखती, वैसे ही जब तुम अपने को प्रकाशरूप जानोगे, तब तमरूप संसार न दिखेगा। तब शरीर की चेष्टा स्वाभाविक होगी और तुममें कुछ चेष्टा न होगी। जैसी अर्धनिद्रावाले की चेष्टा होती है, वैसी ही चेष्टा होगी और तुमको बालक की तरह अभिमान न होगा। जैसे बालक की उन्मत्त चेष्टा होती है, वैसे ही तुम्हारी चेष्टा भी स्वाभाविक होगी। हे राम! यदि तुम यह इच्छा करोगे कि यह सुख हो और यह दुःख न हो तो कदापि वह न होवेगा। जो कुछ शरीर का प्रारब्ध है, सो अवश्य होता है परन्तु ज्ञानवान् के हृदय में संसार की सत्यता जाती रहती है और स्वाभाविक चेष्टा होती है; इच्छा नहीं रहती। हे राम! जैसे कोई पुरुष किसी देश को जाता है और पहुँचने का समय थोड़ा हो तो वह मार्ग के स्थान देखता भी जाता है परन्तु किसी में लिप्त नहीं होता, वैसे ही चित्त को आत्मपद में लगाओ। ऐसा शरीर पाकर यदि आत्मपद न पाया तो कब पावोगे? जो आत्मपद से विमुख है, वह वृक्षादि के जन्मों को पावेगा। इससे हे राम! चित्त

३८२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

आत्मपद में रखो और स्वाभाविक इच्छा बिना चेष्टा करो। इच्छा ही दुःखदायक है। जब इच्छा नष्ट होती है, तब उर्मी को ज्ञानवान् तुरीयपद कहते हैं। जहाँ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति का अभाव हो, वही तुरीयपद है।

हे राम ! ये जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्थाएँ जहाँ न पाइये, वही तुरीयपद है। जब संवेदन, स्फुरण या अहंकार का अभाव हो जावे, तब तुरीयपद प्राप्त होता है। हे राम ! अहंकार का होना दुःखदायक है। जब इसका नाश हो, तभी आनन्द मिलता है। आत्मपद से भिन्न जो माया की रचना है, उसमें मिलकर जीव अपने को जानता है कि 'मैं हूँ'। यही अनर्थ है। इसमें अहंकार का त्याग करो। जिसको देखकर यह अहंकार स्फुरता है, उसका निज अर्थ की भावना से नाश करो। और जो आत्मपद से भिन्न भासित होता है, उसे मिथ्या जानो। यही निज असत् का अर्थ है। जो कुछ संसार भासित होता है, उसको स्वप्न-मात्र जानो। इसको सत्य जानकर इसकी इच्छा करना ही अनर्थ और मिथ्या जानकर इच्छा न करना कल्याण है। हे राम ! में ऊँची बाह करके पुकारता हूँ, पर मेरे वचन कोई नहीं सुनता कि इच्छा ही संसार का कारण है और इच्छा से रहित होना ही परमकल्याण है। जब जीव इच्छा से रहित होता है, तब शान्तपद को प्राप्त होता है। निश्चलत होने पर आत्मा ही भासित होता है, जो आनन्दरूप, सम और अद्वैत है। उसमें जगत् का अभाव है। हे राम ! मोह की बड़ी महिमा है। हृदय में जो आत्मरूपी चिन्तामणि स्थित है, उसको विस्मरण करके मूर्ख अहंकाररूपी काँच को ग्रहण करते हैं।

हे राम ! तुम निरभिमान होकर चेष्टा करो। जैसे यन्त्र की पुतली में अभिमान नहीं होता और वह चेष्टा करती है, वैसे ही प्रारब्ध वेग से तुम्हारी चेष्टा होगी। यह अभिमान तुम न करो कि ऐसे हो और ऐसे न हो। जब ऐसे होगे, तब शान्तपद को प्राप्त होगे; जहाँ वाणी की गति नहीं ऐसे आनन्द को प्राप्त होगे। जब तक इन्द्रियों के विषयों की तृष्णा है, तब तक जन्म-मृत्यु का बन्धन है। इसमें पुरुषप्रयत्न यही

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३८३

है कि तृष्णा का नाश करो। कर्म के फल की तृष्णा न हो और कर्म के करने की भी इच्छा न हो। इन दोनों को त्यागकर स्वरूप में स्थित हो रहो। बल्कि ऐसा भी निश्चय न हो कि मैंने त्याग किया है। हे राम! जिस पुरुष ने कर्म को त्याग दिया है और अहंकारसहित है, उसने पुण्य और पाप सब कुछ किया है, और जिसमें अहंभाव नहीं है, वह चाहे जैसे कर्म करे तो भी कुछ नहीं करता। वह बन्धन को नहीं प्राप्त होता। जो न करने में अभिमानसहित है, उसको कर्त्ता देखते हैं, वह बन्धन में पड़ा है। हे राम! ऐसे आत्मा को जानकर अहं-मम का त्याग करो। ऐसे संवेदन के त्यागने में कुछ यत्न नहीं करना पड़ता। स्मृति उसकी होती है, जिसका अनुभव होता है। पर जिसका अनुभव नहीं, उसका त्याग करना सुगम है। अनुभव प्रत्यक्ष देखने को कहते हैं। तुम्हारे स्वरूप में विश्व नहीं है तो अनुभव क्या हो। ये पदार्थ जो तुमको भासित होते हैं, उनके कारण को जानो। इनका कारण अनुभव है। जब इनका अनुभव ही मिथ्या है, तब स्मृति कैसे सत् हो? रस्सी में सर्प का अनुभव हुआ और फिर स्मरण किया कि वहाँ सर्प देखा था। तो जब सर्प का अनुभव ही मिथ्या है, तब फिर उसका स्मरण कैसे सत् हो? इससे जो वस्तु मिथ्या है, उसके त्यागने में क्या यत्न है?

जब प्रपञ्च को मिथ्या जाना, तब तुमको कोई कर्म बन्धन का कारण न होगा; चेष्टा स्वाभाविक होगी और रागद्वेष जाता रहेगा। जैसे शरत्काल की वेलि सूख जाती है और उसका आकार देख पड़ता है, वैसे ही तुम्हारा चित्त देखने में आयेगा और चित्त का धर्म जो रागद्वेष है, वह जाता रहेगा—वह चित्त सत्पद को प्राप्त होगा। जब सबका विस्मरण (बाध) होता है, उसको शिवपद कहते हैं। वह परमपद ब्रह्म-शब्द-अर्थ से रहित केवल चिन्मात्र अद्वैत पद है। उसमें अहं-मम का त्याग करके स्थित रहो। संसार इसी का नाम है कि मैं हूँ और यह मेरा है। इसको त्यागकर अपने स्वरूप में स्थित हो। हे राम! जब तक अहं-मम का संवेदन है, तब तक दुःख नहीं मिटते। जब यह संवेदन मिटता