योगवाशिष्ठ महारामायण
Yog Vashishta Maha Ramayan
महर्षि वाल्मीकि द्वारा
स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)
पृष्ठ 1171, कुल 1734 में से
संदर्भ में पढ़ें❇ निर्वाण प्रकरण ❇ ३६३
हे राम ! जो ब्रह्मसत्ता ही है तो आकाश क्या है, पृथ्वी क्या है, मैं क्या हूँ, यह जगत् क्या है, ये प्रश्न उठते नहीं। एक मन को स्थिर करके देखो कि ब्रह्मा से चींटी तक जो कुछ भी पदार्थ हैं वे सब सत् भासित हों तो प्रश्न कीजिये। इसलिए जैसे भ्रम से दूसरा चन्द्रमा दिखता है, वैसे ही जगत् भी भ्रम से भासित होता है। रूप अर्थात् दृश्य, अवलोक अर्थात् इन्द्रियाँ, मनस्कार अर्थात् मन की स्फूर्ति ये शब्द कल्पना में फुरे हैं। ये सब मिथ्या हैं—आत्मा में इनका अस्तित्व नहीं है। हे राम ! आकाश आदि पदार्थ भावना में स्थित हैं। जीव जैसी भावना करता है, वैसे पदार्थ सिद्ध और भासित होते हैं। जब संसार की भावना उठ जाय, तब कोई पदार्थ न भासित हो। हे राम ! सुषुप्ति में ही जब इसका अभाव हो जाता है, तो तुरीयावस्था में कैसे भान हो ? जब जीव अपने स्वरूप से गिरता है, तब उसको संसार भासित होता है और वह संसार में वासना और प्रमाद से घटीयन्त्र की तरह घूमता फिरता है। स्वरूप से उतरकर अनात्म में अभिमान करने को—मैं हूँ, मैं ही करता हूँ, इस भावना को प्रमाद कहते हैं। यही अज्ञान है जिससे दुःख मिलता है। जब अज्ञान नष्ट होगा तब संसार के शब्द-अर्थ का अभाव हो जायगा। अहंकार से संसार होता है। संसार का बीज अहंकार ही है। अहंकार अनात्मा देह में आत्म अभिमान करने को कहते हैं।
हे राम ! शुद्ध आत्मा अहंकार के उत्थान से रहित केवल शान्त-रूप है। विश्व का भी वही रूप है, इस भावना में दुःख है। यह संवित् शक्ति आत्मा के आश्रय से फुरती है। जैसे तेल की बूँद जल में डालिये तो चक्र की नाईं फिरती है, वैसे ही संवेदनशक्ति आत्मा के आश्रित फुरती है। ब्रह्म एक स्वरूप है। उसका स्वभाव ऐसा है जैसे मोर का अण्डा और उसका वीर्य एकरूप है। अपने स्वभाव से वीर्य ही नाना प्रकार के रङ्ग रखता है, तो भी मोर से कुछ भिन्न नहीं; वैसे ही आत्मा के संवेदन स्वभाव से नाना प्रकार का विश्व भासित होता है, परन्तु आत्मा से कुछ भिन्न नहीं—सब आत्मरूप ही है। सम्यक्दर्शी को