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योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

३४० ❊ योगवाशिष्ठ ❊

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ज्ञान की सप्त भूमिका हैं । इनमें ज्ञान की उत्पत्ति होती है । राम ने पूछा, हे भगवन् ! जिस भूमिका में जिज्ञासु पहुँचता है, उसका लक्षण क्या है और ये सप्तभूमिका क्या हैं, कैसे प्राप्त होती हैं, सो कहिये । वशिष्ठजी बोले, हे राम ! ये सप्तभूमिका जिस प्रकार प्राप्त होती हैं और जिस प्रकार इनमें ज्ञान प्राप्त होता है सो सुनो । हे राम ! जब बालक माता के गर्भ में होता है, तब उसकी दृढ सुषुप्ति जड़ अवस्था होती है—जैसे ज्ञानी को होती है—परन्तु बालक में संस्कार रहता है, इससे संस्कार की सत्यता आगे होती है । जैसे बीज में अंकुर होता है, उससे आगे चलकर वृक्ष होता है; वैसे ही बालक की भावी होती है । पर ज्ञानी का भावी नहीं होती । जैसे दग्ध बीज में अंकुर नहीं होता, वैसे ही ज्ञानी की भावी नहीं होती; क्योंकि वह संसार में सुप्त है, और स्वरूप में स्थित नहीं है । जब बालक को बाहर निकलकर कुछ काल व्यतीत होता है तब उसकी वह दृढ जड़ता निवृत्त हो जाती है और सुषुप्ति रहती है । कुछ काल के उपरान्त सुषुप्ति भी लय हो जाती है और चेतनता होती है । तब वह जानता है कि 'यह मैं हूँ' 'ये मेरे माता पिता हैं' । तब कुलवाले उसको सिखाते हैं कि यह मीठा है; यह कडुवा है; यह तेरी माता है; यह तेरा पिता है; यह तेरा कुल है; इससे पाप होता है; इससे पुण्य होता है; इससे स्वर्ग मिलता है, इससे नरक पाता है; इस प्रकार यज्ञ होता है, इस प्रकार तप होता है और इस प्रकार दान करते हैं ।

हे राम ! इस प्रकार कुल के उपदेश और शास्त्र के भय से वह धर्म में निरत होता और पाप का त्याग करता है । ऐसा शास्त्र के अनुसार आचरण करनेवाला पुरुष धर्मात्मा कहलाता है । वे धर्मात्मा पुरुष भी दो प्रकार के हैं—एक प्रवृत्ति की ओर है और दूसरा निवृत्ति की ओर । जो प्रवृत्ति की ओर है, वह पुण्य कर्मों से स्वर्ग के फल भोगता है और मोक्ष को उत्तम नहीं जानता, इससे संसार में जल के तृण की तरह भ्रमण करता है । कभी चिरकाल में वह इस संसार-चक्र से छुटकारा पाता है । जो निवृत्त की ओर होता है, उसको विषयभोग से वैराग्य

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ३४१

उपजता और वह कहता है कि यह संसार मिथ्या है; मैं इससे तरूँ और उस पद को प्राप्त होऊँ, जहाँ क्षय और अतिशय न हो—यह संसार सर्वदा चलरूप और दुःखदायी है। हे राम! उस पुरुष को इस क्रम से ज्ञान और विज्ञान उत्पन्न होता है। और जो पशुधर्मी मनुष्य है, उसको ज्ञान प्राप्त होना कठिन है। शास्त्र के अर्थ के न जाननेवालों को पशु-धर्मी कहते हैं। वे अपनी इच्छा के अनुसार आचरण कर अशुभ को ग्रहण करते और विचार से रहित होते हैं। मनुष्य भी दो प्रकार के हैं—एक प्रवृत्तिमार्गी और दूसरे निवृत्तिमार्गी।

जिसको शास्त्र शुभ कहे उसको ग्रहण करना और जिसे अशुभ कहे उसका त्याग करना और यह कामना करके फल के निमित्त यज्ञादिक शुभ कर्म करना कि स्वर्ग, धन, पुत्रादिक मुझे प्राप्त हों, प्रवृत्ति-मार्ग है। ऐसी कामना रखकर शुभ कर्म करके जो इस प्रकार संसारसमुद्र में बहते हैं, वे चिरकाल में निवृत्ति की ओर भी आते हैं और तब स्वरूप को जान पाते हैं। निवृत्तिमार्गी वह है, जो निष्काम होकर और शुभ कर्म करके अन्तःकरण को शुद्ध करता है, उसको वैराग्य उपजता है और वह कहता है कि मुझे कर्मों से क्या है और उनके फलों से क्या है; मैं किसी प्रकार आत्मपद को प्राप्त होऊँ। वह यही विचारता है कि मैं संसार से कब मुक्त हूँगा। यह संसार मिथ्या है और मुझे भोग से क्या है? यह भोग तो सर्प है।

हे राम! इस प्रकार वह भोगों की निन्दा करता है; संसार से उप-रत होता है; शम, दम आदिक जो ज्ञान के साधन हैं, उनका आचरण करता है; शुभ-अशुभ, देश, काल और पदार्थ को विचारता है; मर्यादा से बोलता है; संतजनों का संग करता और सत्शास्त्र और ब्रह्म-विद्या को बारम्बार विचारता है। इस प्रकार मन्तजनों के संग से उसकी बुद्धि बढ़ती जाती है। जैसे शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की कला दिन-प्रतिदिन बढ़ती है, वैसे ही उसकी बुद्धि बढ़ती है और विषयों के उपरत होती है। तब वह तीर्थ, ठाकुरद्वारों आदि शुभ स्थानों को पूजता है; देह और इन्द्रियों से मन्तों की टहल करता है और सबसे मित्रता रखकर दया,

३४२ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

सत्य और कोमलता धारणकर विचरता है। वह ऐसे वचन बोलता है, जिनसे सब कोई प्रसन्न हों और जो यथाशास्त्र हों। इससे भिन्न किसी को कुद्ध नहीं कहता। वह अज्ञानी का संग त्यागता है; स्वर्ग आदि के सुखों की कामना नहीं करता—केवल आत्मपरायण होता है; सन्तों और शास्त्रों की दृढ़भक्ति करता है और उनके अर्थों में मन लगाकर और किसी ओर चित्त नहीं लगाता। जैसे कदर्य मूर्ख सर्वदा धन का चिन्तन करता है, वैसे ही वह सदा आत्मा का चिन्तन करता है। जो पुरुष इतने गुणों से युक्त है, उसको प्रथम भूमिका प्राप्त हुई है। वह पापरूपी सर्प को बाँस के समान नष्ट करता है; मन्तजन, मन्तशास्त्र और धर्मरूपी मेघ को गर्दन ऊँची करके देखता है और प्रसन्न होता है। इसका नाम शुभेच्छा है। उसको फिर दूसरी भूमिका प्राप्त होती है। तब जैसे शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की कला बढ़ती है, वैसे ही उसकी बुद्धि बढ़ती जाती है। उसका लक्षण है—मन्तशास्त्रों और ब्रह्मविद्या को विचार कर उनमें दृढ़ भावना करना। इस विचार का कवच जो गले में डालना है, उससे शस्त्रों का कोई घाव नहीं लगता। इन्द्रियरूपी चोर के हाथ में इच्छारूपी बरछी है। वह विचाररूपी कवच पहननेवाले को नहीं लगती।

हे राम ! इन्द्रियरूपी सर्प में तृष्णारूपी विष है, उससे वह मूर्ख को मारता है। विचारवान् पुरुष इन्द्रियों के विषयों का नाश कर डालता है, सब ओर से उदासीन रहता है और दुर्जनों की संगति को बल करके त्याग करता है। जैसे गधा तृण को त्यागता है, वैसे ही वह मूर्ख की संगति को त्यागता है। उसमें सब इच्छाओं का भी त्याग होता है; परन्तु एक यह इच्छा रहती है कि दया सब पर करता है और मन्तापवान रहता है। उसके निषिद्धदोष स्वाभाविक रूप से जाते रहते हैं—दम्भ, गर्व, मोह, लोभ आदि स्वभावतः नष्ट हो जाते हैं। जैसे सर्प कञ्चुकी (केंचुल) को त्यागकर शोभायमान होता है, वैसे ही विचार-वान् पुरुष इन्द्रियों के विषयों को त्यागकर शोभा पाता है। जो उसको क्रोध भी आता है तो क्षणमात्र रहता है, हृदय में स्थिर नहीं हो सकता। वह खाना, पीना, लेना, देना आदि कर्म विचारपूर्वक करता है और

✴ निर्वाण प्रकरण ✴ ३४३

सर्वदा शुद्धमार्ग में विचरणता है। मन्तजनों का संगकर और सतशास्त्रों का अर्थ विचारकर बोध को बढ़ाता और तीर्थों के स्नान से काल व्यतीत करता है। हे राम ! यह दूसरी भूमिका है।

जब तीसरी भूमिका आती है, तब श्रुति (वेद) और स्मृति (धर्म-शास्त्र) के अर्थ हृदय में स्थित होते हैं और जैसे कमल पर भँवरे आकर स्थित होते हैं, वैसे ही उस पुरुष के हृदय में शुभ गुण स्थित होते हैं। तब उसे फूलों की शय्या सुखदायी नहीं लगती, वन और कन्दरा सुख-दायक लगती हैं। निदान उसका वैराग्य दिन दिन बढ़ता जाता है। वह तालाबों, बावलियों और नदियों में स्नान करके शुभ स्थानों में रहता है। पत्थर की शिला पर शयन करता है। देह को तप से क्षीण करता है। धारणा से चित्त को किमी स्थान में नहीं लगाता। आत्म-भावना और ध्यान करके भोगों से सर्वदा निवृत्त होता है। भोगों को अन्तवन्त विचार कर अर्थात् ये बने नहीं रहते, यह सोचकर और देह के अहंकार को उपाधि जानकर वह त्यागता है। देह को रक्त, मांस, मल आदिक से पूर्ण जानकर उसमें अहंकार को त्यागता है। उसकी निन्दा करता है और सूखे तृण की नाईं तुच्छ जानकर त्याग देता है। जैसे विष्ठायुक्त तृण को पशु त्यागता है, वैसे ही देह के अहंकार को वह त्यागता है और कन्दराओं में विचर कर फल-फूलों का आहार करता है, मन्तजनों की टहल करके आयु बिताता है और सदा असंग रहता है। यह तीसरी भूमिका है।

इति श्रीयोगवासिष्ठे निर्वाणप्रकरणे प्रथमद्वितीयतृतीय भूमिकालक्षण-विचारो नाम द्वादशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११२ ॥

वसिष्ठजी बोले, हे राम ! ज्ञान का यह साधन है कि ब्रह्मविद्या को विचार के उसके अर्थ की बारम्वार भावना करे और पुण्यक्रियाओं का आचरण करे। इससे भिन्न ज्ञान का कोई साधन नहीं—इसी से ज्ञान की प्राप्ति होती है। जिस पुरुष को ऐसी भावना होती है, उसको यदि नाना प्रकार की सुगन्ध—अगर, चन्दन, चोये आदि और अप्सरा अनिच्छित प्राप्त हों तो उनका निगदर करता है और जो स्त्री को देखता

३४४ ✵ योगवाशिष्ठ ✵

है तो माता समान जानता है; पराये धन को पत्थर के बट्टे समान देखकर वाञ्छा नहीं करता और सब प्राणियों पर दया करता है। जैसे अपने सुख को प्रसन्न करनेवाला है और दुःख को अनिष्ट जानता है, वैसे ही और को भी अपने सदृश जानकर सुख देता है, दुःख किसी को नहीं देता। इस प्रकार वह पुण्य कर्म करता रहता है। सतशास्त्रों के अर्थ का अभ्यास करता है और सर्वदा असंग रहता है। असंग भी दो प्रकार का है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! संग-असंग का लक्षण क्या है, इनका भेद समझाकर कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! असंग दो प्रकार का है—एक समान और दूसरा विशेष। उनका लक्षण सुनो। समान असंग यह है कि मैं कुछ नहीं करता, न मैं किसी को देता हूँ और न मुझे कोई देता है। सब ईश्वर की आज्ञा है। जिसको धन देने की इच्छा होती है उसको वह धन देता है और जिससे लेना होता है उससे लेता है; अपने अधीन कुछ नहीं। समान असंगवाला जो कुछ दान, तप, यज्ञादि करता है, वह ईश्वरार्पण करता है और अपना अभिमान कुछ नहीं करता। कहता है कि सब ईश्वर की शक्ति से होता है। इस प्रकार निरभिमान होकर वह धर्मचेष्टा में स्वाभाविक विचरणता है। जो कुछ इन्द्रियों के भोग की सम्पदा है उसको आपदा जानता है, और भोगों को महाआपदारूप मानता है। सम्पदा आपदारूप है; संयोग वियोग-रूप है और जितने पदार्थ हैं वे सब सन्निपातरूप हैं—विचार से नष्ट हो जाते हैं। इससे सबको वह नाशरूप जानता है।

यह संयोग-वियोग को दुःखदायी जानता है। परस्त्री को विष का बेलि समान रस से रहित जानता है और सब पदार्थों को परिणामी जान कर किसी की इच्छा नहीं करता। सम्पूर्ण विश्व का जो ईश्वर है, उसे जिसको सुख देना है, उसको वह सुख देता है और जिसको दुःख देना है उसको दुःख देता है। अपने हाथ कुछ नहीं। करने करानेवाला ईश्वर है। न मैं करता हूँ; न मैं भोक्ता हूँ; और न मैं वक्ता हूँ—सब ईश्वर की सत्ता से होता है। ऐसे निरभिमान होकर वह पुण्यकर्म करता है। यह समान असंग है। उसके वचन सुनने में श्रवण को अमृत की प्राप्ति होती

निर्वाण प्रकरण । ३४५

है । इस प्रकार सन्तों के मिलने और तीसरी भूमिका की प्राप्ति से जिसकी बुद्धि बढ़ी है और जो निरभिमान है, उसके उपदेश में अनुभव से तब तक अभ्यास करे, जब तक हाथ पर रखे आँवले की नाईं आत्मा का अनुभव साक्षात्कार प्रत्यक्ष हो । विशेष असंगवाला कहता है कि न मैं कुछ करता हूँ, न कराता हूँ; केवल आकाशरूप आत्मा हूँ । न मुझमें करना है, न कराना है। न कोई और है, न मेरा है। मैं केवल आकाशरूप अद्वैत आत्मा हूँ।

हे राम ! वह पुरुष न भीतर, न बाहर, न पदार्थ, न अपदार्थ, न जड़, न चेतन, न आकाश, न पाताल, न देश, न पृथ्वी, न मैं न मेरे को देखता है । वह निर्वाण, अज, अविनाशी, सब शब्द-अर्थों से रहित, केवल शून्य आकाश में स्थित है । चित्त से रहित चेतन में जो प्रस्थित है, उसको श्रेष्ठ असंग कहते हैं । उसकी चेष्टा देख भी पड़ती है तो भी उसमें हृदय में पदार्थों की भावना का अभाव है । जैसे जल में कमल दिखता है । परन्तु जल से ऊपर ही रहता है, वैसे ही वह कर्म करता देख पड़ने पर भी असंग रहता है । उसको कोई कामना नहीं रहती कि यह हो और यह न हो; क्योंकि उसको संसार का अभाव निश्चय हुआ है और वह सब कल्पनाओं से रहित है । उसको आत्मा से भिन्न किसी पदार्थ की सत्ता नहीं फुरती । यह श्रेष्ठ असंग कहाता है । कार्य करने से उसका कुछ अर्थ सिद्ध नहीं होता और न करने में कुछ हानि नहीं होती । वह सर्वदा असंग है और संसार में कभी नहीं डूबता, क्योंकि वह तो संसारसमुद्र के पार हुआ है, उसने अनात्म में आत्म-भावना त्यागी है; अहंभाव का त्याग किया है । इष्ट-अनिष्टरूप जितने पदार्थ हैं, उनके सुख-दुःख की वेदना उसे नहीं फुरती और वह सदा मौनरूप हैं। उसके लेखे धन पत्थर के समान है । यह श्रेष्ठ असंग कहाता है ।

हे राम ! एक कमल है, जो अज्ञानरूपी कीचड़ से निकलकर आत्मरूपी जल में विराजता है । उसका बीज संसार की अभावना है । उस जल में तृष्णारूपी मछलियाँ हैं, जो उस कमल के चहुँ ओर

३४६ योगवाशिष्ठ ।

फिरती है और उसके साथ कुकर्म दुःखरूपी काँटे हैं। अज्ञानरूपी रात्रि में उस कमल का मुख मूँदा रहता है और विचाररूपी सूर्य का उदय होने से वह खिलता और शोभा पाता है। उसमें सुगन्ध सन्तोष है। वह हृदय के बीच लगता है। उसका फल असंग है। यह तीसरी भूमिका में उगता है। हे राम! सन्तों की संगति और सतशास्त्रों के विचार से मनुष्य सार को प्राप्त करता है और अमृत मोक्ष को पाता है। बड़ा कष्ट है कि ऐसे स्वरूप को भूलकर जीव दुःखी होते हैं। इनका स्वरूप आनन्दरूप है, जो दुःखों का नाश करता है और जिसमें कोई दुःख नहीं। वह इन भूमिकाओं के द्वारा प्राप्त होता है। हे राम! यह तीसरी भूमिका ज्ञान के निकटवर्ती है और विचारवान् पुरुष इन भूमिकाओं में स्थित होकर बुद्धि को बढ़ाते हैं। जब इस प्रकार मनुष्य बोध को बढ़ाता है तो शास्त्र की युक्ति से रक्षा करता है और क्रमशः इस तीसरी भूमिका को प्राप्त होता है, जहाँ असंगता प्राप्त होती है। जैसे किसान खेती की रक्षा करके उसे बढ़ाता है, वैसे ही वह विचाररूपी जल से बुद्धि को बढ़ाना है। तब बुद्धिरूपी बेल बढ़ती है। फिर चतुर्थ भूमिका प्राप्त होती है और अहंकार, मोहादिक शत्रुओं से रक्षा होती है।

हे राम! इस भूमिका को प्राप्त होकर मनुष्य ज्ञानवान् होता है। सो यह भूमिका क्रमशः प्राप्त होती है, अथवा बड़े पुण्य कर्म किये हों तो फुरती है या अकस्मात् भी फुरती है। जैसे नदी के तट पर कोई आ बैठा हो और नदी के वेग से बीच में जा पड़े, वैसे ही जब पहली भूमिका प्राप्त होती है, तब बुद्धि को बढ़ाती है, और जब बुद्धिरूपी बेलि बढ़ती है, तब ज्ञानरूपी फल लगता है। जब ज्ञान उपजता है, तब उसमें प्रत्यक्ष क्रिया दिखे तो भी उसका वह अभिमान नहीं करता, जैसे शुद्धमणि प्रतिबिम्ब को ग्रहण भी करती है, परन्तु उसमें कोई रङ्ग नहीं चढ़ता।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे तृतीयाभूमिकाविचारो नाम त्रयोदशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११३ ॥

राम बोले, हे भगवन्! आपने भूमिका का वर्णन किया, पर उसमें

* निर्वाण प्रकरण * ३४७

मुझे यह संशय है कि जो भूमिका से रहित और प्रकृति के सम्मुख हैं उनको भी कदाचित् ज्ञान उपजेगा अथवा न उपजेगा ? जो एक, दो वा तीन भूमिका पाकर शरीर छूटे और आत्मा का साक्षात्कार न हुआ हो और उसको स्वर्ग की भी कामना न हो, तो वह कौन गति पाता है ? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जो पुरुष विषयी हैं, उनको ज्ञान प्राप्त होना कठिन है । वे वासना करके घटीयन्त्र की तरह कभी स्वर्ग की ओर कभी पाताल को जाते और दुःख पाते हैं । कभी अकस्मात् काकतालीय न्याय से ही उनको सन्तों के संग और सत्शास्त्रों को सुनने की वासना फुरती है । जैसे मरुस्थल में बेलि लगना कठिन है, वैसे ही जिस पुरुष को आत्मा का प्रमाद और भोग की भावना है उसको ज्ञान प्राप्त होना कठिन है । परन्तु जब अकस्मात् उसे सन्तों के संग से वैराग्य उपजता है और उसकी बुद्धि निवृत्ति की ओर आती है, तब भूमिका के द्वारा उसे ज्ञान प्राप्त होता है और तभी वह मुक्त होता है ।

हे राम ! अकस्मात् की यही भावना उपजे बिना जीव नाना योनियों में भ्रमता है । जिसको एक अथवा दो भूमिका प्राप्त हुई हैं और शरीर छूट गया तो वह और जन्म पाकर ज्ञान को प्राप्त होता है, उसका पिछला संस्कार जाग जाता है और दिन-दिन बढ़ता जाता है । जैसे बीज से प्रथम वृक्ष का अंकुर होता है, फिर डाल, फूल और फल से वह बढ़ता जाता है, वैसे ही उसका अभ्यास बढ़ता जाता है और ज्ञान प्राप्त होता है । जैसे पहलवान कसरत कर रात्रि को सो जाता है और फिर दिन हुए उठता है तब पहलवानी का अभ्यास आप फुरता है और वह कसरत करने लगता है, अथवा जैसे कोई मार्ग चलता-चलता सो जावे और जागकर चलने लगे, वैसे ही वह फिर पूर्व के अभ्यास में लगता है । हे राम ! जिसको यह भावना होती है कि मुझे विशेषता प्राप्त हो, वह जन्म पाता है । ब्रह्मा से चींटीपर्यन्त जिसको विशेष होने की कामना है, वह भी जन्म पाता है । ज्ञानी को भोगों की और विशेष प्राप्त होने की इच्छा नहीं होती । जिसको भोग की इच्छा होती है, वह भोग में अपने को विशेष जानता है और अनिष्ट की निवृत्ति की

३४८ * योगवाशिष्ठ *

इच्छा करता है । ज्ञानी को कोई वासना नहीं होती कि यह विशेषता मुझे प्राप्त हो, इसी से वह फिर जन्म नहीं पाता । जैसे भुना बीज नहीं उगता, वैसे ही वासना से रहित ज्ञानी जन्म नहीं पाता ।

हे राम ! जन्म का कारण वासना है । जैसी-जैसी वासना होती है, वैसी-वैसी अवस्था को जीव प्राप्त होता है । वासना नाना प्रकार की हैं । जब शरीर छूटने का समय आता है, तब जो वासना प्रबल दृढ़ होती है और जिसका सर्वदा अभ्यास होता है, वही अन्तकाल में दिखाई देती है, चाहे वह पाठ की, तप की, कर्म की, देवता इत्यादिक की हो, सबको दबाकर वही उस समय उठती है । हे राम ! उस समय जो सामने पदार्थ होते हैं, वे भी नहीं भासित होते; पाँचों इन्द्रियों के विषय विद्यमान हों तो भी नहीं भासित होते; वही पदार्थ भासित होता है, जिसका दृढ़ अभ्यास किया हुआ होता है । वासनाएँ तो अनेक होती हैं, परन्तु जैसी वासना दृढ़ होती है, उसी के अनुसार शरीर धारण करता है । जब देह छूटती है, तब मुहूर्तपर्यन्त सुषुप्ति की नाईं जड़ता रहती है, उसके उपरान्त चेतनता होती है । तब जीव वासना के अनुसार शरीर देखता है और जानता है कि यह मेरा शरीर है; मैं उत्पन्न हुआ हूँ । कोई ऐसे होते हैं कि उसी क्षण में युग का अनुभव करते हैं । कोई ऐसे होते हैं कि चिरकाल पर्यन्त जड़ रहते हैं, तब उनको चेतनता फुरती है, और उसके अनुसार संसार भ्रम देखते हैं । और कोई, जो संस्कारवान् होते हैं, उनको शीघ्र ही एक क्षण में चेतनता होती है और वे जानते हैं कि हम उस जगह मरे थे और इस जगह जन्मे हैं; यह हमारी माता है, यह पिता है और यह कुल है ।

इस प्रकार एक मुहूर्त में जागकर वे देखते हैं और बड़े कुल को देखते हैं । इसी प्रकार वे परलोक और यमराज के दूतों को देखते हैं और जानते हैं कि ये हमें लिये जाते हैं और हमारे पुत्रों ने पिण्ड दिये हैं, उन पिण्डों से हमारा शरीर बना है और दूत ले चले हैं । तब आगे ये धर्मराज को देखते हैं और उनके निकट जाके खड़े होते हैं । पुण्य और पाप दोनों मूर्ति धारण कर उनके आगे स्थित

* निर्वाण प्रकरण * ३४६

होते हैं । तब धर्मराज अन्तर्यामी से एक-एक का हाल पूछते हैं कि इसने क्या कर्म किये हैं ? यदि पुण्यवान् होता है तो स्वर्गभोग भोगा-कर फिर योनि में डाला जाता है और जो पापी होता है तो नरक में डाल देते हैं । निदान सब प्रकार के जन्म लेने पड़ते हैं । सर्प की योनि में कहता है कि मैं सर्प हूँ । ऐसे ही जब जीव बैल, वानर, तीतर, मछली, बगला, गर्दभ, बेलि, वृक्ष इत्यादि की योनि पाता है, तो जानता है कि मैं यही हूँ । अकस्मात् काकतालीय न्याय से कभी मनुष्यशरीर पाता है तो माता के गर्भ में जानता है कि यहाँ मैंने जन्म लिया है; यह मेरी माता है, मैं पिता से उत्पन्न हुआ हूँ और यह मेरा कुल है । फिर बाहर निकलता है और बालक होता है तब जानता है कि मैं बालक हूँ । यौवन अवस्था होती है तब जानता है कि मैं जवान हूँ । फिर वृद्ध होता है तब जानता है कि मैं वृद्ध हूँ ।

इस प्रकार काल बिताकर जब मरता है तो सर्प, तोता, तीतर, वानर, मच्छ, कच्छ, वृक्ष, पशु, पक्षी, देवता इत्यादिक जन्म धारण करता है । हे राम ! संसार में वह घटीयन्त्र की तरह फिरता है । कभी ऊपर और कभी नीचे को जाता है । इसी प्रकार स्वरूप के प्रमाद से जीव दुःख पाता है । हे राम ! इतना विस्तार जो तुमसे कहा है, सो बना कुछ नहीं, केवल अद्वैत आत्मा है; पर चित्त के संयोग से इतना भ्रम देखता है । वासना द्वारा विमानों को देखता है और आकाश में जाता है । जैसे पवन गन्ध को ले जाता है, वैसे ही पुर्यष्टका को साथ ले जाता है और शरीर देखता है । हे राम ! आत्मा से भिन्न कुछ नहीं । परन्तु चित्त के संयोग से जीव इतने भ्रम देखता है । इससे चित्त को स्थिर करो तो भ्रम मिट जायगा और आत्मतत्त्वमात्र ही शेष रहेगा । जो शुद्ध और आनन्दरूप है, उसी में स्थित हो रहो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्ववासनारूपवर्णनं नाम चतुर्दशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११४ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह तो प्रवृत्तिवाले का क्रम कहा । अब निवृत्ति का क्रम सुनो । जिसको भूमिका प्राप्त हुई है और आत्मपद

३५०

  • योगवासिष्ठ *

नहीं प्राप्त हुआ, उसके सब पाप भस्म हो जाते हैं। जब उसका शरीर छूटता है; तब वह वासना के अनुसार शून्याकार हुआ। फिर अपने साथ शरीर देखता है और फिर बड़े परलोक को देखता है, जहाँ स्वर्ग के सुख भोगता है। फिर विमान पर चढ़कर लोकपालों के पुरों में विचरता है, जहाँ मन्द मन्द पवन चलता है, सुन्दर वृक्षों की सुगन्ध है और पाँचों इन्द्रियों के रमणीय विषय हैं। देवताओं में क्रीड़ा करता है और भोगों को भोगकर संसार में उपजता है। फिर भूमिका क्रम को प्राप्त होता है। जैसे मार्ग चलता कोई सो जाय तो वह जागकर फिर चलता है, वैसे ही शरीर पाकर वह फिर भूमिका के क्रम को प्राप्त होता है और जैसी जैसी भावना दृढ़ होती है, वैसे ही वैसे भाषित होता है। यह सब जगत् संकल्पमात्र है। संकल्प के अनुसार ही यह भाषित होता है और वासना के अनुसार परलोक के भ्रम जन्य सुख-दुःख देखता है। वहाँ से उन्हें भोगकर फिर संसार में आ पड़ता है। इसी प्रकार संकल्प से भटकता है। फिर जब कभी आत्मा की ओर उन्मुख होता है, तब संसार का भ्रम मिट जाता है। जब तक आत्मा की ओर नहीं आता, तब तक अपने संकल्प से संसार को देखता है। प्रति जीव को अपनी अपनी सृष्टि भाषित होती है। देवता, दैत्य, भूमिलोक, स्वर्ग, सब संकल्प के रचे हुए हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र से लेकर तृण तक, जो कुछ संसार दिखता है, वह सब मनोमात्र है, मन के संकल्प से उदय हुआ है और असद्रूप है। जैसे मनोराज्य, गन्धर्वनगर और स्वप्नसृष्टि भ्रम है, वैसे ही यह जगत् भ्रम है। सब सृष्टि परस्पर अदृष्ट है; कहीं उदय होती दिखती है और कहीं लय हो जाती है।

जैसे मूर्च्छ और देश को जाता है, वैसे ही देह को त्यागकर जीव परलोक को जाता है। पर स्वरूप की स्थिति में आना जाना, अहं त्व की कोई कल्पना नहीं है—केवल सत्तामात्र अपने आपमें स्थित है। और जगत् भी वही है। हे राम! यह विश्व आत्मस्वरूप है। जैसे मणि में चमक का चमत्कार होता है, वैसे ही विश्व-आत्मा का चमत्कार है। जो कुछ तुमको दिखता है, सो आत्मा ही है। आत्मा के

निर्वाण प्रकरण३५१

विना आभास नहीं होता । जैसे ईख मधुरता और मिरचों में कड़वाहट होती है, वैसे ही आत्मा में विश्व है । जो कुछ भी देखो, सुनो, स्पर्श करो और सुगन्ध लो, उसे सब आत्मा ही जानो । अथवा जो इनको जाननेवाला अनुभवरूप है, उसमें स्थित हो इन्द्रियों को जीत-कर और उनके विषयों को त्यागकर अनुभवरूप में स्थित होओ । हे राम ! यह विश्व संवित्‌रूप है और संवित् ही विश्वरूप है । जब संवित् बहिर्मुख होकर रस लेती है, तब जाग्रत् को देखती है । जब अन्तर्मुख होकर रस लेती है, तब स्वप्न होता है और जब शान्त हो जाती है तब सुषुप्ति होती । संसार को सत्य जानकर जब रस लेती है, तब जाग्रत्, स्वप्न और सुषुप्ति अवस्था होती है और जब संवित् में रस की सत्यता जाती रहती है, तब तुरीयपद होता है । यह पदार्थ है, या नहीं; जब यह भावना नष्ट हो, तब तुरीयपद समझो । हे राम ! यह विश्व स्फुरणमात्र है; जब स्फुरण नष्ट हो जाता है, तब विश्व देखने में नहीं आता । जैसे स्वप्न के देश, काल, पदार्थ जागने से मिथ्या होते हैं, वैसे ही यह जाग्रत् जगत् भी मिथ्या है । जीव-जीव प्रति जो अपनी-अपनी सृष्टि होती है, उसमें आप भी कुछ बन जाता है, इससे दुःखी होता है । जब इस अहंकार को त्याग कर अपने स्वरूप में स्थित हो, तब विश्व कहीं नहीं है ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे सृष्टिनिर्वाणैकताप्रति- पादनं नाम पञ्चदशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! इस सृष्टि का स्वरूप संकल्पमात्र है, और संकल्प भी आकाशरूप है । आकाश और स्वर्ग में कुछ भेद नहीं; जैसे पवन और स्पन्दन में भेद नहीं होता । सृष्टि में अनेक पदार्थ हैं, परन्तु परस्पर नहीं बाधा डालते । वास्तव में विश्व भी आत्मा का चमत्कार और आत्मरूप है । जो आत्मरूप है तो राग और द्वेष किसमें कीजिये । चेतन धातु में कोटि ब्रह्माण्ड स्थित हैं, और यह आश्चर्य है कि आत्मा में कुछ नहीं हुआ । भिन्न-भिन्न संवेदन दृष्टि आती है, और नाना प्रकार के पदार्थ भासित होते हैं । हे राम ! जीव-जीव प्रति

३५२ ☸ योगवाशिष्ठ ☸

अपनी-अपनी सृष्टि है। एक सृष्टि ऐसी है कि उसका रूप एक-सा देख पड़ता है, परन्तु सृष्टि अपनी-अपनी है। और कई सृष्टियाँ ऐसी हैं कि भिन्न-भिन्न हैं, पर समानता से एक ही दिखती हैं। जैसे जल की बूँदें इकट्ठी होती हैं और धूल के कण भिन्न-भिन्न होते हैं, परन्तु एक ही धूल प्रतीत होती है। जैसे नदी में नदी पड़ती है तो एक ही जल हो जाता है, वैसे ही समान अधिकरण में सब संकल्प एक ही भासित होते हैं; एक एक के साथ मिलते हैं और नहीं भी मिलते। जैसे क्षीर-समुद्र में घृत डालिये तो नहीं मिलता, वैसे ही कुछ संकल्प ऐसे हैं कि और में नहीं मिलते—जैसे सूर्य, दीपक और मणि का प्रकाश भिन्न-भिन्न दिखता है पर एक-सा होता है, वैसे ही कई सृष्टियाँ एक-सी भासित होती हैं और भिन्न-भिन्न भी होती हैं। हे राम! इतनी सृष्टियाँ जो मैंने तुमसे कही हैं सो सब अधिष्ठान में फुरने से कई कोटि उत्पन्न होती हैं और कई कोटि लीन हो जाती हैं। जैसे जल में तरङ्ग और बुलबुले उठकर लीन हो जाते हैं, वैसे ही सृष्टियाँ उत्पन्न और लीन होती हैं। पर अधिष्ठान ज्यों का त्यों है; क्योंकि उसमें कुछ भिन्न नहीं। ब्रह्म, आत्मा आदिक जो सब हैं, सो भी स्फुरण में हुए हैं। जब तक शब्द-अर्थ की भावना है, तबतक वे भासित होते हैं। जब भावना निवृत्त हो जायगी, तब शब्द या अर्थ कुछ न भासित होगा; केवल शुद्ध चैतन्यमात्र ही शेष रहेगा और संसार का भाव किसी जगह न होगा। जैसे पवन जब तक चलता है; तब तक जाना जाता है कि पवन है और गन्ध भी पवन ही से जानी जाती है कि सुगन्ध आई अथवा दुर्गन्ध आई, और जब पवन नहीं चलता तब उसका वेग नहीं मालूम होना और गन्ध भी नहीं ज्ञात होती, वैसे ही जब स्फुरण निवृत्त होता है, तब संसार और संसार का अर्थ, दोनों नहीं भासित होते। फुरने में जीव जीव प्रति सृष्टि है, उस सृष्टि में सत्तासमान ब्रह्म स्थित है। वही सबका अपना रूप है—वह द्वैत भाव को कभी नहीं प्राप्त हुआ।

हे राम! इस कारण ऐसा जानो कि आकाश, पृथ्वी, जल, अग्नि आदि सब पदार्थ आत्मा ही हैं, अथवा ऐसे जानो कि सब मिथ्या हैं,

❉ निर्वाण प्रकरण ❉ ३५३

इनका साक्षी ब्रह्म ही अपने आपमें स्थित है। उससे कुछ भिन्न नहीं और उसी ब्रह्म के अंश में अनेक सुमेरु और मन्दराचल आदिक स्थित हैं। आत्मा में अंशांशीव भी स्थूलता के निमित्त कहे हैं, वास्तव नहीं हैं-समझाने के लिए कहे हैं। आत्मा एकरस है। हे राम! ऐसा कोई पदार्थ नहीं, जो आत्मसत्ता बिना हो। जिसको सत्य जानते हो, वह भी आत्मा है और जिसको असत्य जानते हो वह भी आत्मा है। आत्मा में जैसे सत्य फुरता है, वैसे ही असत्य भी फुरता है-फुरना दोनों का तुल्य है। जैसे मनुष्य स्वप्न में एक को सत्य और दूसरे को असत्य जानता है, वैसे ही जो इन्द्रियों के विषय होते हैं, उनको सत्य जानता है, और आकाश के फूल और शश के सींग को असत्य कहता है। ये सब अनुभव से जागे हैं, इससे अनुभवरूप हैं। ऐसा पदार्थ कोई नहीं, जो आत्मा में असत् नहीं। जो कुछ पदार्थ भासित होते हैं, सो सब फुरने से हुए हैं। क्या सत्य और क्या असत्य, सब मिथ्या और स्वप्न के सत् और असत् की तरह हैं। जो अनुभव से सिद्ध है सो सब सत्य है और अनुभव से भिन्न असत्य है। हे राम! तुम गुणातीत परमात्मस्वरूप में स्थित होओ। हे राम! ज्ञानवान् पुरुष भूत, भविष्य, वर्तमान, तीनों काल में सम रहता है। दसो दिशा, आकाश, जल, अग्नि आदिक सब पदार्थ उसको आत्मा ही देख पड़ते हैं-आत्मा से भिन्न कुछ नहीं जान पड़ता। ये सूर्य, चन्द्रमा और तारे, सब आत्मा हैं। यह विश्व आकाशरूप, शुद्ध और निर्मल है। आकाश में आकाश स्थित है, कुछ भिन्न नहीं। जो तुम्हें भिन्न लगे, उन्हें मिथ्या जानो। वे भ्रम से सिद्ध हुए हैं, कोई सत् नहीं। पर परमार्थ से देखो तो सब आत्मा ही है।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्वाकाशैकताप्रतिपादनं नाम षोडशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह विश्व स्वप्न के समान है। जैसे स्वप्न की सेना नाना प्रकार की दीखती है और शस्त्र चलते देख पड़ते हैं, पर आत्मा में इनका रूप देखना और मानना मिथ्या है। शब्द और अर्थ

३५४ 卐 योगवाशिष्ठ 卐

कोई आत्मा में नहीं है। आत्मा जगत् में रहित है। पर जगतरूप में उसका भान होता है। अहं-त्वं जो कुछ भासित होता है सो सब स्वप्नवत् है और भ्रम से सिद्ध हुआ है। जो सब का अधिष्ठान है, वह सत्य है और सब उसी में कल्पित हैं। जो अनुभव में देखिये तो सब आत्मस्वरूप हैं, और भिन्न देखिये तो कुछ नहीं। जैसे स्वप्न के देश, काल, पदार्थ सब अर्थाकार भासित होने पर भी मिथ्या हैं, वैसे ही यह विश्व भ्रम में प्रकट होता है। शब्द-अर्थ की अपेक्षा से वह ओर त् है और उनकी अपेक्षा से वह अहं है, वास्तव में दोनों नहीं—जो है सो आत्मा ही है। राम ने पूछा, हे भगवन् ! आपने कहा कि त्वं से अहं तक और अहं से त्वं तक सब स्वप्न की सेना की तरह मिथ्या हैं और अनुभव से देखिये तो आत्मरूप है, तो बताइए हम स्वप्न सेना में हैं अथवा हमारा अहं आत्मा है? वशिष्ठजी बोले, हे राम ! अनात्म देहादिक में यह अहं-भावना करना कि मैं हूँ, स्वप्न-सेना के तुल्य है, और अधिष्ठान चिन्मात्र दृश्य और अहंकार से रहित अहंभावना करना आत्मरूप है। हे राम ! तुम आत्मरूप हो। यह विश्व सत् भी नहीं और असत् भी नहीं। जो अधिष्ठानरूप से देखिये तो आत्मरूप है और जो अधिष्ठान से रहित देखिये तो मिथ्या है। वह अधिष्ठान शुद्ध, आनन्दरूप, चित्त से रहित चिन्मात्र परब्रह्म है। उसमें अज्ञान से दृश्य देख पड़ता है। जैसे असम्यक् दृष्टि से सीपी में रूपा भासित होता है, वैसे ही आत्मा में अज्ञानी दृश्य की कल्पना करते हैं।

हे राम ! दृश्य अविचार से सिद्ध है। विचार करने से कुछ वस्तु नहीं होती। पर जिसके आश्रय में वह कल्पित है वह अधिष्ठान सत्य है। जैसे सीपी के हट जाने से रूपे की बुद्धि जाती रहती है, वैसे ही आत्मविचार से विश्वबुद्धि जाती रहती है। जैसे समुद्र में पवन से तरङ्ग-चक्र उठते और प्रत्यक्ष होते हैं, पर विचार करने से तरङ्ग-चक्र में भी जलबुद्धि होती है, वैसे ही आत्मरूपी समुद्र में मन के उठने से विश्वरूपी तरंग चक्र उठते हैं और विचार करने से तुमको मन के उठने में भी आत्मरूप भासित होगा, विश्वरूपी तरंग-चक्र न भासित

* निर्वाण प्रकरण * [३५५]

होंगे और भ्रम निवृत्त हो जायगा। जो वस्तु स्फुरण में उपजी है वह स्फुरण न होने पर निवृत्त हो जाती है। यह विश्व अज्ञान मे उपजा है और ज्ञान से लीन हो जायगा। इससे विश्व को भ्रममात्र जानो। राम ने पूछा, हे भगवन्! आपने कहा कि ब्रह्मा, रुद्र आदि और उत्पत्ति संहार करने तक सब विश्व भ्रममात्र है। इस ज्ञान से क्या सिद्ध होता है? यह तो प्रत्यक्ष दुःखदायक लगता है? वशिष्ठजी बोले, हे राम! जो कुछ देखते हो सो सम्यक् दृष्टि से सब आत्मरूप है—कुछ भिन्न नहीं—और असम्यक् दृष्टि से विश्व है। यह दृष्टि का भेद है। सम्यक्-असम्यक् देखने में भी अधिष्ठान ज्यों का त्यों है। जैसे अन्धकार में रस्सी सर्प जान पड़ती है और भयदायक होती है, और जो प्रकाश में देखिये तो रस्सी ही देख पड़ती है, वैसे ही जिसने आत्मा को जाना है, उसको दृश्य संसार भी आत्मरूप है। अज्ञानी को विश्व प्रतीत होता है और दुःखदायी होता है। जैसे मूर्ख बालक अपनी परछाहीं में वैताल की कल्पना कर डरता है, और अपने अज्ञान से दुःख पाता है। तो अगर यथार्थ ज्ञान हो तो भय क्यों पावे?

हे राम! जीव अपने ही संकल्प से आप बँधता है। जैसे कुमवारी नाम का कीड़ा अपने बैठने का स्थान बनाकर आपही उसमें कैद होकर मरता है, वैसे ही अनात्मा में अहं प्रतीत करके जीव आप ही दुःख पाता है। हे राम! जीव आप ही संसारी और आप ही ब्रह्म होता है। जब दृश्य की ओर जाता है, तब संसारी होता है और जब स्वरूप की ओर जाता है तब ब्रह्म आत्मा होता है। इसमें जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो। जो संसारी होने की इच्छा हो तो संसारी बनो और जो ब्रह्म होने की इच्छा हो तो ब्रह्म हो जाओ। मुझसे पूछो तो दृश्य अहंकार को त्यागकर आत्मा में स्थित हो रहो। यह विश्व भ्रममात्र है, वास्तव नहीं। यही पुरुषार्थ है कि संकल्प से संकल्प को काटो। जब बाहर से अन्तर्मुख होगे, तब ब्रह्म ही भासित होगा और दृश्य की कल्पना मिट जावेगी; क्योंकि यह दृश्य आगे भी नहीं था। हे राम! जो सत् वस्तु आत्मा है, उसका अनेक यत्नों से भी नाश नहीं होता, और जो असत्य

३५६ ❊ योगवाशिष्ठ ❊

अनात्मा है, उसके निमित यत्न कीजिये तो मन नहीं होता। जो सत्य वस्तु है, उसका कदापि अभाव नहीं, और जो असत है, उसका भाव नहीं होता। असत वस्तु तबतक भासित होती है, जबतक उसको भली प्रकार नहीं जाना जाता। जब विचार में देखिये, तब नष्ट हो जाती है। अविद्या के पदार्थ विद्या में नष्ट हो जाते हैं—जैसे स्वप्न का सुमेरु पर्वत सत्य हो तो जाग्रत में भी दिखे—इसमें वास्तव में वह है ही नहीं। यह संसार जो तुमको दिखता है, सो स्वरूप के ज्ञान से नष्ट हो जावेगा। इसमें पूछो तो हमको आत्मा से भिन्न कुछ नहीं दिखता, सब आत्मा ही है। यह भाव भी हममें नहीं कि यह जीव अज्ञानी है, किसी प्रकार मोक्ष हो। न हमको ज्ञान से प्रयोजन है, न मोक्ष होने से प्रयोजन है, क्योंकि हमको सब आत्मा ही दिखता है।

हे राम! जबतक चेतन है तबतक मरना और जन्म भी पाता है। जब जड़ या निर्वाण होता है, तब शान्ति को पाकर मुक्त होता है। चेतन दृश्य की ओर वासना को कहते हैं, इसी से जीव जन्म-मरण के बन्धन में पड़ता है। जब दृश्य के स्फुरण की ओर से जड़ सा हो जाता है, तब मुक्त होता है। इसका होना ही दुःख और न होना ही मुक्ति है। अहंकार का होना बन्धन है और अहंकार का न होना मुक्ति। इसमें पुरुष-प्रयत्न यही है कि अहंकार का त्याग करे और चैतन्य ब्रह्मघन अपने रूप में स्थित होओ। जिनको संसार के सत होने की भावना है, उनको संसार ही होता है, ब्रह्म नहीं मिलता और जिनको ब्रह्मभावना हुई है, उनको ब्रह्म ही भासित होता है। हे राम! चाहे पाताल में जाय अथवा सम्पूर्ण पृथ्वी दसों दिशा, आकाश, देवताओं के स्थान में फिरे तो भी सुख न पावेगा और आत्मा का दर्शन न होगा; क्योंकि अनात्म का अहंकार करने से सुख नहीं मिलता। जब आत्मदर्शी होकर देखोगे तो सब आत्मा ही भासित होगा।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे विश्वविजयो नाम सप्तदशाधिकशततमसर्गः ॥ ११७ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम! यह संसार संकल्पमात्र और तुच्छ है।

✽ निर्वाण प्रकरण ✽ ३५७

पर्वत, नदियाँ, देश और काल सब भ्रम से सिद्ध होते हैं। जैसे निद्रादोष से स्वप्न में पर्वत, नदियाँ, देश, काल भासित होते हैं, वैसे ही अज्ञाननिद्रा में यह संसार दिखता है। हे राम! जागकर देखो तो संसार है ही नहीं। इसका तरना महासुगम है। और सुमेरु पर्वतादिक जो भासित होते हैं, वे कमल की तरह कोमल हैं। जैसे कमल के मँदने में कुछ यत्न नहीं होता वैसे ही ये निवृत्त होते हैं। अज्ञानियों की दृष्टि स्थूल है और उससे आकार को सब देख रहे हैं। जैसे पवन का चलना जाना जाता है, और जब वह नहीं चलता तब मूर्ख उसके अस्तित्व को नहीं जानता, वैसे ही ये प्राणी आकार को जानते हैं, और इसमें जो निराकार स्थित है, उसको नहीं जानते। जैसे पवन चलता है तो भी पवन है और ठहरता है तो भी पवन है, वैसे ही विश्व प्रकट होने पर भी आत्मा है और न फुरने में भी वही है। इससे विश्व भी आत्मरूप है, कुछ भिन्न नहीं। जो सम्यक्दर्शी हैं, उनको विश्व के फुरने न फुरने में आत्मा ही भासित होता है। जैसे स्पन्द व निःस्पन्दरूप पवन ही है, वैसे ही ज्ञानी को सर्वदा सब एकरस है, और अज्ञानी को द्वैत दिखता है। जैसे ठूँठ में बालक पिशाचबुद्धि करता है, वैसे ही अज्ञानी आत्मा में जगद्बुद्धि करता है। जैसे नेत्रदोष से आकाश में वृक्ष दिखते हैं, वैसे ही मन के स्फुरण में जगत् भासित होता है।

हे राम! जैसे वायु का रूप कभी नहीं होता, वैसे ही जगत् का अत्यन्त अभाव है। जैसे मरुस्थल में जल का अभाव है, वैसे ही आत्मा में जगत् का अभाव है। हे राम! सुमेरु पर्वत, आकाश, पाताल, देवता, यक्ष, राक्षस इत्यादि सहित ऐसे अनेक ब्रह्माण्ड इकट्ठे करके विचार-रूपी काँटे में रक्खे और पीछे आधी रत्ती डालें तो भी वे बराबर नहीं होते; क्योंकि हैं ही नहीं, अविचारसिद्ध हैं। स्वप्न के पर्वत जागने पर चावल भर भी नहीं रहते, क्योंकि हैं नहीं, भ्रममात्र हैं। हे राम! इस संसार की भावना मूर्ख करते हैं। ऐसे जो अनात्मदर्शी पुरुष हैं, उनको ऐसे जानो, जैसे लुहार की धौंकनी से हवा निकलती है, वैसे ही उन पुरुषों की साँसें वृथा आती जाती हैं। जैसे आकाश में अँधेरा

३५ = * योगवाशिष्ठ *

व्यर्थ उठती है वैसे ही उन पुरुषों का जीना और अब सब चेष्टाएँ व्यर्थ हैं। ये आत्मघाती हैं अर्थात् अपना नाश आप करते हैं। उनकी चेष्टाएँ दुःख का निमित्त हैं। हे राम! यह मन अपने अधीन है। जो दृश्य की ओर होता है तो संसार होता है और जो अन्तर्मुख होता है तो सब आत्मा ही होता है। यह संसार मिथ्या है। न सत् कहिये, न असत् कहिये। यह संसार भ्रम से हुआ है। ये जीव भूत, भविष्य और वर्तमान काल में विपरीत देखते हैं। जैसे अग्नि शीतल होती है, आकाश पाताल में पाताल आकाश में तारे पृथ्वी पर पृथ्वी आकाश के ऊपर भी होती है; बादल बिना वर्षा होती है और आकाश में हल फिरते हैं—ऐसे कौतुक में देखता हूँ।

हे राम! इसमें कुछ आश्चर्य नहीं; मन ही में सब कुछ होता है। जैसे मनोराज्य में होता है, वैसा ही आगे स्थित होता है और उसकी सिद्धि होती है। पर्वत पुर में भिक्षुक के समान भिक्षा माँगने फिरते हैं, ब्रह्माण्ड उड़ते फिरते हैं, बालू से तेल निकलता है, मृतक युद्ध करते हैं, मृग गाते हैं और वन नृत्य करते हैं। हे राम! मनोराज्य में सब कुछ बनता है। चन्द्रमा की किरणों में पर्वत भस्म होते हैं, इसमें क्या आश्चर्य है? ऐसे ही यह संसार भी मनोराज्य है और शीघ्र संवेग है। इस कारण जीव उसको सत् मानता है, और आगे जो बालू में तेल आदि का निकलना कहा है उसको सत् नहीं जानता; क्योंकि उसमें मृदु संवेग है; पर हैं दोनों तुल्य। हे राम! जिनको सत् और असत् कहते हो, आत्मा में वे दोनों नहीं हैं। ये जो तुमको सत् पदार्थ भासित होते हैं तो अग्नि आदिक शीतल भी सत् हैं और जो ये मिथ्या भासित होते हैं तो वे भी मिथ्या हैं, केवल तीव्र और मृदु संवेग है। जब तीव्र संवेग दूर होता है, तब सब मिथ्या माने जाते हैं। जैसे स्वप्ने से जागा हुआ स्वप्न को मिथ्या और जाग्रत् को सत्य कहता है, पर दोनों मनोराज्य हैं। हे राम! जितने आकार देख पड़ते हैं, उन सबको मिथ्या जानो। न तुम हो, न मैं हूँ और न यह जगत् है। परमार्थ सत्ता ज्यों की त्यों है, उसमें अहं-त्व की भावना नहीं

निर्वाण प्रकरण३५६

उठती। वह केवल शान्तरूप, आकाशरूप और निराकाररूप है। उसमें कुछ भी द्वैत नहीं—केवल अपने रूप में स्थित है। जैसे बालक मृत्तिका के हाथी, घोड़े और मनुष्य बनाकर उनके नाम रखता है कि यह राजा है, यह हाथी है, यह घोड़ा है, सो वे सब मृत्तिका से भिन्न नहीं हैं, पर बालक के मन में उनके नाम भिन्न-भिन्न दृढ़ होते हैं; वैसे ही मनरूपी बालक नाना प्रकार की संज्ञाओं की कल्पना करता है, पर आत्मा से भिन्न कुछ नहीं है। इससे हे राम ! तुम किसका भय करते हो ? निर्भय रहो। तुम्हारा स्वरूप शुद्ध, निर्भय और अविद्या के कारण-कार्य से रहित है। उसी में स्थित रहो। यह संसार तुम्हारे स्फुरण में हुआ है। आत्मा न सत्य है, न असत्य, न जड़ है, न चेतन; न प्रकाश है न तम; न शून्य है, न अशून्य। शास्त्र ने जो विभाग कहे हैं कि यह जड़ है, यह चेतन है, सो इस जीव के जगाने के निमित्त कहे हैं। आत्मा में कोई वास्तव संज्ञा नहीं, केवल आत्मत्वमात्र है। इससे दृश्य की कलना त्यागकर आत्मा में स्थित हो। ब्रह्मा से स्थावर तक सब कल्पनामात्र हैं, इसमें क्या आस्था करना है ? संसार के दोनों भाव तुल्य हैं। स्फुरण जैसा भाव का है, वैसा ही अभाव का—स्वरूप में दोनों की तुल्यता है; और व्यवहारकाल में जैसा है; वैसा ही है।

इति श्रीयोगवाशिष्टे निर्वाणप्रकरणे विश्वप्रमाणवर्णनं नामाष्टदशाधिकशततमस्सर्गः ॥ ११८ ॥

राम ने पूछा, हे भगवन् ! भूमिका प्रसङ्ग यहाँ चला था। उसमें जो सार आपने कहा, वह मैं समझ गया। अब भूमिकाओं का विस्तार कहिये। योगी का शरीर जब छूटता है और स्वर्ग के भोगों को भोगकर वह नीचे गिरता है तब फिर उसको क्या अवस्था होती है, यह भी कहिये। वशिष्ठजी बोले, हे राम ! जिस योगी को भोग की वाञ्छा होती है, वह स्वर्ग में जाकर भोग भोगता है। पर यदि उसको और भी भोगने की इच्छा होती है तो वह मध्यममण्डल मनुष्यलोक में पवित्रस्थान और धनवानों के गृह में जन्म लेता है। और जो उसको भोग की वाञ्छा और नहीं होती तो ज्ञानवानों के गृह में जन्म लेता