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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1132, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1132

३२४ ॠ योगवाशिष्ठ ॠ

संकल्प-जाल है और उससे मनरूप इन्द्रियों में रागद्वेष होता है । तुरीय स्वप्न-अवस्था भी नहीं; क्योंकि स्वप्न भ्रमरूप होता है—जैसे रज्जू में सर्प भासित होता है, जो और का और होता है । तुरीय सुषुप्ति भी नहीं; क्योंकि उसमें अत्यन्त जड़ता है । तुरीयावस्था चेतनरूप, उदासीन, शुद्ध और जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति से रहित है । जीवन्मुक्त तुरीयपद में स्थित रहता है ।

हे राम ! जो तुरीयपद में स्थित है, वह जगत में स्थित हुआ भी शान्त है । अज्ञानी को जगत् वज्रमयवत् दृढ़ है । ज्ञानी सदा शान्तरूप है; क्योंकि वह तीनों अवस्थाओं का साक्षी है । उसको न उनमें राग है, न द्वेष । वह उदासीन की तरह है । तुरीयातीतपद में वाणी की गति नहीं । जीवन्मुक्त पुरुष जब विदेहमुक्त होता है, तब इसी पद को प्राप्त होता है, जहाँ वाणी की भी गति नहीं । जब तक जीवन्मुक्त है, तब तक तुरीयपद में स्थित रहकर रागद्वेष से रहित होता है, और इन्द्रियाँ भी अपने विषय में राग-द्वेष से रहित होकर स्वाभाविक वरतीं हैं । जिस पुरुष को राग-द्वेष उत्पन्न होता है, वह तुरीयपद को नहीं प्राप्त हुआ और चित्त-मलिन है । जिस पुरुष को राग-द्वेष नहीं उत्पन्न होता, उसका चित्त सत्पद को प्राप्त हुआ है । जिसका चित्त सत्पद को प्राप्त हुआ है, उसको संसार की सत्यता नहीं प्रतीत होती । वह स्वप्नवत् जगत् को देखता है । इससे तुम भी सत्पद में स्थित होकर साक्षीरूप रहो ।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे तुरीयापदविचारो नाम पञ्चाधिकशततमस्सर्गः ॥ १०५ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! कर्त्ता, कारण और कर्म, ये तीनों हों, पर तुम इनके साक्षी होओ । इनका कर्तृत्व-अभिमान तुम्हें न हो कि मैं यह करता हूँ, अथवा मैंने इसका त्याग किया है । इनमें उदासीन होकर तटस्थ रहो । इसी पर एक आख्यान कहता हूँ, उसे सुनो । तुम प्रबुद्ध हो तो भी दृढ़ बोध के निमित्त सुनो । हे राम ! एक बन में काष्ठमौन-नामक एक मुनि रहता था । एक दिन एक बधिक किसी