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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1133, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1133

❊ निर्वाण प्रकरण ❊ ۳۲۵

मृग पर बाण चलाता हुआ उसके पीछे दौड़ता जाता था। जब वह आगे गया तो मृग बधिक की दृष्टि से ओझल हो गया। बधिक ने देखा कि एक तपस्वी बैठा है तो उसने पूछा, हे मुनीश्वर ! यहाँ एक मृग आया था, वह किस ओर गया ? तुमने देखा हो तो मुझसे कहो। काष्ठमौन बोले, हे बधिक ! हमको कुछ सुध नहीं, क्योंकि हम निरहंकार हैं। हमारे साथ चित्त और अहंकार, दोनों नहीं। जो तुम कहो कि इन्द्रियों की चेष्टा कैसे होती है तो जैसे सूर्य के आश्रय से लोगों की चेष्टा होती है या दीपक के आश्रय से चेष्टा होती है और सूर्य व दीपक केवल साक्षी है, वैसे ही हम इन्द्रियों के साक्षी हैं और इनकी चेष्टा स्वाभाविक होती है। हमको इनसे कुछ प्रयोजन नहीं।

हे बधिक ! अहंभाव करनेवाला अहंकार है। जैसे माला के भिन्न-भिन्न दाने तागे के आश्रित होते हैं और सब में एक तागा होता है, तब माला होती है, पर जब तागा टूट जाता है, तब दाने अलग-अलग हो जाते हैं, वैसे ही इन्द्रियाँ दाने हैं और अहंकार तागा है। उस अहंकाररूपी तागे के टूटने से इन्द्रियाँ भिन्न-भिन्न हो जाती हैं। जैसे राजा का नाश होने पर सेना और गोपाल के नष्ट होने पर गौवें बिखर जाती हैं और पिता के नष्ट होने पर बालक व्याकुल होते हैं, वैसे ही अहंकार के बिना इन्द्रियाँ विकल होती हैं। इनका अभिमान मुझमें कुछ नहीं। इनका अभिमानी अहंकार था, वह मेरा अभिमान नष्ट हो गया है। इन्द्रियाँ अपने अपने विषय में विचरती हैं। मुझको इनका न राग है, न द्वेष। हे साधो ! मुझे न जाग्रत, न स्वप्न, न सुषुप्ति है। इन तीनों से रहित मैं तुरीयपद में स्थित हूँ। मेरा अहं-त्व मिट गया है। मैं नहीं जानता कि मृग बायें गया या दाहिने; क्योंकि चक्षु इन्द्रिय देखनेवाली है, उसमें बोलने की शक्ति नहीं। ये इन्द्रियाँ अपने-अपने विषय को ग्रहण करती हैं। एक इन्द्रिय को दूसरी की शक्ति नहीं; फिर तुमसे कौन कहे ? इन सबको रखनेवाला अहंकार था, जो सबको अपना जानता था। जैसे शरत्काल में मेघ नष्ट होते हैं, वैसे ही अहंकार के नष्ट होने से मैं स्वच्छ, निर्मल, शान्त तुरीयपद में स्थित हूँ। इन्द्रियों