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भारतकोश
योगवाशिष्ठ महारामायण

योगवाशिष्ठ महारामायण

Yog Vashishta Maha Ramayan

महर्षि वाल्मीकि द्वारा

स्रोत: योगवाशिष्ठ महारामायण (हिन्दी भाषा टीका) · Archive.org (उद्गम)

DevanagariHindipublished1,734 पृष्ठ

पृष्ठ 1134, कुल 1734 में से

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पृष्ठ 1134

३२६ ✼ योगवाशिष्ठ ✼

का बीज अहंकार मृतक हो जाने से इन्द्रियाँ भी मृतक हो गई हैं, देखने भर को देख पड़ती हैं। जैसे भीत पर लिखी पुतलियों से कार्य कुछ नहीं होता, वैसे ही मेरी इन्द्रियों से कुछ कार्य नहीं होता । तब तुझसे कौन कहे।

वशिष्ठजी बोले, हे रामचन्द्र ! जब इस प्रकार मुनीश्वर ने कहा, तब वधिक समझकर उठ गया। हे राम ! तुरीयपद शान्तरूप है। वहाँ जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति तीनों का अभाव है। वह केवल अद्वैतपद है। ये जो ब्रह्म, आत्मा, चिदानन्द आदि संज्ञाएँ हैं, सो तुरीयपद में हैं। तुरीयातीतपद में शब्द की गति नहीं। वह अशब्द पद है। विदेह पुरुष उसी पद को प्राप्त होते हैं और जीवन्मुक्त साक्षात् करके तुरीयावस्था में विचरते हैं। वहाँ जाग्रत, जो दीर्घ दुःख-सुख का भान है, सो नहीं; स्वप्न जो राग-द्वेष के लिए अल्पकाल है, वह भी नहीं; जड़ता या नामरूप अवस्था भी नहीं। तुरीयपद इन तीनों से रहित और शान्त है। उसमें कोई क्षोभ नहीं। यह जगत् उसका आभास है। जैसे समुद्र में तरङ्ग वास्तव में कुछ नहीं, जल ही है, वैसे ही केवल तुरीयस्वरूप सत्तासामान्य तुम्हारा स्वरूप है। उसमें स्थित होओ। उसमें ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, सिद्ध, ज्ञानी इत्यादिक स्थित हैं और काष्ठमौन वधिक का उपदेश करनेवाला मुनि भी तुरीयपद में स्थित था। उसकी विशेषकल्पना, जो भिन्न-भिन्न नामरूप को देखनेवाली थी, निवृत्त हुई थी। वह केवल सत्तासामान्य में स्थित था। इससे कलना को त्यागकर तुम भी तुरीयपद में स्थित हो रहो।

इति श्रीयोगवाशिष्ठे निर्वाणप्रकरणे काष्ठमौनवृत्तान्तवर्णनं नाम षडधिकशततमस्सर्गः ॥ १०६ ॥

वशिष्ठजी बोले, हे राम ! यह विश्व केवल आकाशरूप है। यह आत्मा से भिन्न नहीं; आत्मा का ही चमत्कार है। जैसे मेघ में बिजली का चमत्कार होता है, वैसे ही यह विश्वरूप चित्कला आत्मा का चमत्कार है। हे राम ! वास्तव में सब ब्रह्म ही है, भिन्न कुछ नहीं। राम ने पूछा, हे भगवन् ! यह विश्व आपने ब्रह्मरूप कहा है—मेघ में